निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १०६ ) ७ अ० ७ पा० ५ खं०
मेतामपोयत्तूर्णिश्चरति प्रजानन् ॥” [ ऋ० सं०
८, ४, ११, १ ]
'मूर्द्धा' मूर्त्तम् अस्मिन् धीयते । मूर्द्धा यः सर्वेषां
भूतानाम् भवति नक्तम् अग्निः, ततः सूर्य्यो जायते
प्रातरुद्यन्, स एव, प्रज्ञां तु एतां मन्यन्ते य-
ज्ञियानां देवानां यज्ञसम्पादिनाम्, अपो यत्
कर्म चरति प्रजानन्- सर्वाणि स्थानानि अनुसं-
चरते त्वरमाणः ।
तस्य उत्तरा भूयसे निर्वचनाय ॥५[२७]॥
अर्थ :- “मूर्द्धा भुवः” । 'अग्निः' अग्निदेव 'भुवः'
पृथिवी का ( सर्वेषां भूतानाम् ) सब प्राणियों का 'मूर्द्धा'
शिर 'भवति' है, 'नक्तम्' ( विशेष कर ) रात्रि में, जिस
प्रकार शिर के बिना प्राणी का जीवन नहीं हो सकता उसी
प्रकार अग्नि के बिना भी कोई प्राणी जी नहीं सकता, क्यों
कि- उसी के अधीन अन्न का पकाना ( रांधना ) आदि है,
इसी से यह अग्नि सब भूतों का मूर्द्धा (प्रधानसम) है । 'ततः'
फिर ( रात्रि के बीत जाने पर ) “प्रातः उद्यन्” प्रातःकाल
उदय होता हुआ ( सः एव ) वही अग्नि 'सूर्य्यः' सूर्य 'जायते'
हो जाता है । अर्थात्- जो अग्नि रात्रि के समय अग्नि के
रूप से जगत् का उपकार करता है, वही अग्नि सवेरे ही दिन
के उपकारों के करने के अर्थ सूर्य हो जाता है, [ यह उसकी
माया है । ] ( तत्वविदः ) देवता तत्व के जानने वाले पुरुष
'एताम्' इसे 'यज्ञियानाम्' ( यज्ञसम्पादिनां देवानाम् )