निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 880, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त (१११) ७ अ० ७ पा० ६ सं०
शक्तिभिः कर्मभिः द्यावापृथिव्योः पूरणं तम् अ-
कुर्वन्, त्रेधा भावाय । 'पृथिव्याम्, अन्तरिक्षे,
दिवि',—इति शाकपूणिः ।
“यदस्य दिवि तृतीयं तदसावादित्यः” इति हि
ब्राह्मणम् ।
तद् अग्नीकृत्य स्तौति ।
अथ एनम् एतया आदित्यीकृत्य स्तौति-॥६।२८॥
अर्थः- “स्तोमेन हि०” । 'देवामः' (देवाः देवताओँ
ने 'स्तोमेन' स्तुतिभिः) स्तुतियों से 'दिवि' द्युलोक में 'अग्नि
म्, अग्नि को 'अजीजनन्' (अजनयन्) उत्पन्न किया । 'शक्ति-
भिः' (कर्मभिः) और कर्मों से 'रोदसिप्राम्' (द्यावापृथिव्योः
पूरणम् ) द्युलोक और पृथिवी लोक में पूर्ण (कर दिया) । 'तम्'
(एव) उसी (अग्नि) को “त्रेधा भुवे” (भावाय) तीन भागों में
बांटने के अर्थ 'अकृण्वन्' (अकुर्वन् ) किया । ( पृथिव्याम्,
अन्तरिक्षे, दिवि, इति शाकपूणिः ) पृथिवी में (अग्नि के रूप में)
अन्तरिक्ष में (विद्युत् के रूप में) द्युलोक में (आदित्य के रूप में)
[कर दिया] - यह शाकपूणि आचार्य मानते हैं ।
“यदस्य०” 'जो इसका तीसरा (भाग) है, सो वोह आदि-
त्य है'- यह ब्राह्मण है ।
“तद् अग्नी०” सो यह [उक्त ब्राह्मण] अग्नि मान कर
स्तुति करता है- इस ऋचा में देवताओं ने इस पार्थिव
अग्नि को ही द्युलोक में स्थापन किया और उसी को अन्य दो