सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

ऋभुक्षाः (१०) । उक्षाः (११) । विहायाः (१२) ।
यह्वः (१३) । ववक्षियः (१४) । विवक्षसे (१५) ।
ऋम्भृणः (१६) । माहितः (१७) । गभीरः (१८) ।
ककुहः (१८) । रभसः (२०) । ब्राधन् (२१) ।
विरप्शी (२२) । अद्भुतम् (२३) । वंहिष्ठः (२४) ।
बर्हिषत् (२५) । इति पञ्चविंशतिर्महन्नामानि ॥३॥
[निघ०-] गयः (१) । कृदरः (२) । नर्तः
(३) । हर्म्यम् (४) । अस्तम् (५) । पस्त्यम् (६) ।
दुरोणे (७) । नीलयम् (८) । दुर्य्याः (६) खसराणि (१०) ।
अमा (११) । दमे (१२) । कृत्तिः (१३) । योनिः
(१४) । सद्म (१५) । शरणम् (१६) । वरूथम्
(१७) । छर्दिः (१८) । छदि (१९) । छाया (२०) ।
शर्म (२१) । अञ्म (२२) । इति द्वाविंशतिर्गृह-
नामानि ॥ ४ ॥
[निघ०-] इरज्यति (१) । विधेम (२) ।
सपयति (३) । नमस्यति (४) । दुवस्यति (१५) ।
ऋप्नोति (६) । ऋशद्धि (७) । ऋच्छति (८) ।
सपति (६) । विवासति (१०) । इति दश परि-
चरणकर्माणः ॥ ५ ॥

६४ ३ अ० ३ पा० १ ख० ।
[निघ०-] शम्बाता (१) । शतरा (२) ।
शातपन्ता (३) । शर्म (४) स्यूमकम् (५) ।
शेवृधम् (६) । मयः (७) । सुग्म्यम् (८) । सुदि-
नम (९) । शूषम् (१०) । शुनम् (११) । शग्मम्
(१२) । भेषजम् (१३) । जुलाषम् (१४) । स्योमम्
(१५) । सुम्नम् (१६) । शवसे (१७) । शिवम्
(१८) । शम् (१९) । कम् (२०) । इति विंशतिः
सुख नामानि ॥ ६ ॥
[ निघ० ] निर्णिंक् (१) । वत्रिः (२) । वर्षः
(३) । वपुः (४) । अमतिः (५) । पप्सः (६) ।
प्मुः (७) । रूप्रः (८) । पिष्टम् (६) । पेशः
(१०) । कृशनम् (११) । प्क्षारः (१२) । अर्जु-
नम् (१३) । ताम्रम् (१४) । चरुषम् (१५) ।
शिल्पम् (१६) । इति षोडश रूपनामानि ॥ ७ ॥
( निघ० ) असेमाः (१) । अनेसः (२) ।
अनेघः (३) । अनवद्यः (४) । अनभिशस्ताः (५) ।
उक्थ्यः (६) । सुनोथः (७) । पाकः (८) । वामः
(६) । वयुनम् (१०) । इति दश प्रशस्यस्य ॥ ८ ॥
[ निघ० ] कतः (१) । केतुः (२) । चेतः
(३) । चिवम् (४) । क्रतुः (५) । पमुः (६) ।

हिन्दी निरुक्त । ६५
धीः ( ७ ) । शचीः ( ८ ) । माया ( ६ ) । वयुनम्
( १० ) । अभिख्या ( ११ ) । इति एकादश प्रज्ञा
नामानि ॥ ६ ॥
[ निघ० ] बट् ( १ ) । श्रत् ( २ ) । सत्रा ( ३ ) ।
अद्धा ( ४ ) । इत्था ( ५ ) । ऋतम् ( ६ ) । इति षट्
सत्यनामानि ॥ १०॥
[ निघ० ] चिक्षत् ( १ ) । चाकनत् ( २ ) ।
आचष्ट ( ३ ) । चष्टे ( ४ ) । विष्टे ( ५ ) । विच-
र्षणिः ( ६ ) । विश्वचर्षणिः ( ७ ) । अच्योशुकत्
( ८ ) इति अष्टौ पश्यतिकर्माणः ॥ ११ ॥
[ निघ० ] हिकम् ( १ ) । नुकम् ( २ ) ।
सुकम् ( ३ ) । घषिकम् ( ४ ) । चाकीम् ( ५ ) ।
नकिः ( ६ ) । माकिः ( ७ ) । नकाम् ( ८ ) । आ-
क्तम् ( ६ ) । इति नव उत्तराणि सर्व-पद-समा-
म्नानाय ॥ १२ ॥
[ निघ० ] इदमिव ( १ ) । इदं यथा ( २ ) ।
अग्निनये ( ३ ) । · चतुरश्चिद् ददमानात् ( ४ ) ।
ब्राह्मणा व्रतचारिणः ( ५ ) । वृक्षस्य नु ते पुरुहूत-
वयाः ( ६ ) । जार आभगम् ( ७ ) । मेषोभूतो ३
६

६६ ३ अ० ३ पा० १ खं० ।
भियन्नयः (८) । तद्रूपः (६) । तद्वर्णां (१०) ।
तद्वत् (११) । तथा (१२) । इति उपमाः ॥१३॥
[ निरु० ] बहुनामानि उत्तराणि द्वादश । बहु
कस्मात् ? प्रभवति इति सतः ।
ह्रस्वनामानि उत्तराणि एकादश । ह्रस्वो
ह्रसतेः ।
महन्नामानि उत्तराणि पञ्च विंशतिः । महान्
कस्मात् ? मानेन अन्यान् जहाति इति शाकपूणिः ।
संहनीयो भवति-इति वा । तत्र 'अवक्ष्य' 'विव-
क्षसे' इति-एते वक्तेर्वा वहतेर्वा साभ्यासात् ।
गृहनानानि उत्तराणि द्वाविंशतिः । गृहाः कस्मात्?
गृह्णन्ति इति सताम् ।
परिचरण-कर्माणः उत्तरे धातवो दश ।
सुखनामानि उत्तराणि विंशतिः । 'सुखं'
कस्मात् ? सुहितं खेभ्यः । 'खं' पुनः खनतेः ।
रूपनामानि उत्तराणि षोडश । रूपं' रोचतेः ।
प्रशस्य-नामानि उत्तराणि दश ।
प्रज्ञानामानि उत्तराणि एकादश ।

हिन्दी निरुक्त । ६७
सत्यनामानि उत्तराणि षट् । ‘सत्यं’ कस्मात् ?
सत्सु तायते । सत्प्रभवं भवति इति वा ।
अष्टौ उत्तराणि पदानि । पश्यति-कर्माणः
उत्तरे धातवः । धायति-प्रभृतीनि च नामानि
आमिम्राणि ।
नव उत्तराणि पदानि सर्वपदसमाम्नानाय ।
अथात उपमाः । ‘यदतत्तत्सदृशम्’ इति
गार्ग्यः तदासाम् कर्म । ज्यायसा वा गुणेन प्रख्यात
तमेन वा कनीयांसं वा अप्रख्यातं वा उपमिमीते ।
अथापि कनीयसा ज्यायांसम् ।
अर्थ ।
निरुक्तार्थ—ईश्वर नामोंके अनन्तर बारह (१२) बहु (बहुत)
के नाम हैं। ‘बहु’ किस अर्थसे है ? ‘प्रभवति’ अर्थात् समर्थ होता
है, इस कर्तृवाच्य (प्र० उप० भू० धा०) से। अनन्तर ‘ह्रस्व’ के
ग्यारह (११) नाम हैं। ‘ह्रस्व’ अल्पोभाव अर्थमें ‘ह्रस्व’ (भ्वा०
प०) धातुसे है। [क्योंकि—वह महत्‌को अपेक्षा छोटा हुआ
प्रतीत होता है।]
‘महत्’ के नाम पच्चीस हैं। ‘महान्’ क्यों है ? मान या परि-
माणसे अन्योंको छोडता है। यह शाकपूणि आचार्य मानते हैं।
अथवा महनीय या पूजनीय होता है। उन महत् नामोंमें ‘ववक्षिथ’
‘विवक्षसे’ ये दोनों दोहराये हुए ‘वच्’ (अ० प०) धातुसे अथवा
वह (भ्वा० उ०) धातुसे हैं।

६८ ३ अ० ३ पा० १ ख० ।
अनन्तर बाईस ( २२ ) गृह "( घर ) के नाम हैं. 'गृह' क्यों हैं ?
ग्रहण करते हैं । ( धान्य आदिको ) इस प्रकार कर्तृवाच्य 'ग्रह'
उपादाने ( क्र्या० उ० ) धातुसे हैं ।
अनन्तर दश ( १० ) परिचरण अर्थमें धातु हैं ।
अनन्तर बीस ( २० ) सुखके नाम हैं। 'सुख' क्यों ? 'ख'
नाम इन्द्रियोंके लिये सुहित होता है। फिर 'ख' शब्द 'खन' खनने
( भ्वा० उ० ) धातुमे है। [ क्योंकि कर्ण आदि इन्द्रियोंके स्थान
खोदे हुए जैसे होते हैं । ]
अनन्तर सोलह ( १६ ) रूपके नाम हैं। 'रूप' शब्द दीप्ति
अर्थवाले ( भ्वा० आ० ) 'रुच' धातुसे है। [ क्योंकि वह दीप्त
होता है ।
अनन्तर दश ( १० ) प्रशस्य ( प्रशंसा योग्य ) के हैं ।
अनन्तर ग्यारह ( ११ ) प्रज्ञाके नाम हैं ।
अनन्तर छः ( ६ ) सत्यके नाम हैं । 'सत्य' क्यों ? सत्पुरुषोंमें
ही फैलता है। [ क्योंकि-सत्पुरुषोंके समीप मिथ्या नहीं बोला
जा सकता । ] अथवा सत्पुरुषोंसे ही उत्पन्न होता है । [ क्योंकि-
सत्पुरुष ही सत्य बोलते हैं । ]
अनन्तर आठ (८) उत्तरे पद हैं । अनन्तर आठ (८) नेत्रसे देखने
अर्थ वाले धातु हैं । और चायति' आदि नाम हैं । अतः ये आमिश्र
( मिले हुए ) हैं ।
अनन्तर नव ( ६ ) उत्तर पद हैं सब ( नाम आख्यात, उपसर्ग
और निपात ) चारों प्रकारके पदोंके समाम्नानके अथ हैं । [ अर्थात्
इन्हीं नव ( ६ ) पदोंके आम्नान करनेमें सब निपात और उपसर्ग
दिखाये गये समझे जावेंगे। चारोंमें इन्हींके दिखानेकी त्रुटि थी
सो सब पूरी की जाती है । ]

हिन्द निरुक्त । ६६
अनन्तर उपमा हैं। [लक्षण] जो उस (उपमेय) से मिश्र
और उसके समान हो सो उपमा होती है—यह गार्ग्य आचार्य
मानते हैं। सो इन उपमाओंका कर्म या अर्थ है। क्या ? जो-
अथवा उत्कृष्ट-गुणसे अल्पगुण या छोटेको अथवा अधिक प्रसिद्धसे
अप्रसिद्धका उपमा करता है। और छोटे या निकृष्टसे बड़े या
श्रेष्ठको (उपमा करता है।) ॥ १ ॥
व्याख्या !
इस खण्डमें निघण्टु के तेरह (१३) खण्डोंकी
व्याख्या है।
जिनमें बहु (१) ह्रस्व (२) महत् (३) गृह (४) परिचरण
(५) सुख (६) रूप (७) प्रशस्य (८) प्रज्ञा (९) सत्य (१०)
पश्यति (११) सर्वपद (१२) उपमा (१३) इन अर्थोंके वाचक
शब्द हैं। इनका संगतियां भी योग्यतानुसार कल्पित कर लेना
चाहिये। जैसे कि-- ईश्वर ही बहु होते हैं। बहु सम्बन्धसे ह्रस्व,
ह्रस्व सम्बन्धसे महत्, जो महत् होते हैं वे ही गृही (गृहस्थ) होते
हैं, गृहोंमें ही परिचर्या (सेवा) होती है परिचर्यासे ही सुख होता
है, सुखी ही रूपवाले होते हैं रूपवाले ही प्रशंसनीय होते हैं, जो
प्रज्ञा (बुद्धि) वाले होते हैं वे ही प्रशंसनीय होते हैं जो प्रज्ञावान्
होते हैं, वे ही सत्य बोलते हैं, जो सत्य बोलते हैं, वे ही देखते
हैं—इत्यादि ।
चिक्यत् आदि। इस खण्डके भगवद्दुर्गाचार्यने तीन व्याख्यान
दिखाये हैं, जो भिन्न भिन्न पूर्वाचार्योंके हैं और यास्काचार्यके
अनुमत हैं।
१—चिक्यत् आदि दर्शनार्थक धातु हैं, और वे ही चायत आदि
रूपमें नाम हैं। इसलिये ये मिलित या संसर्गी हैं। कहाँ धातु

७० ३ अ० २ पा० १ ख० ।
और कहाँ पर नाम इस प्रकारका ज्ञान प्रकरण और समीपस्थ
पदसे होगा।
२—उनमें कोई नाम और कोई आख्यात हैं।
३—विचक्षण् ( १ ) विचर्षणः ( २ ) विश्वचर्षणः ( ३ ) ये
तीन नाम हैं और ८ जो शेष हैं वे सब धातु हैं। और वे पूर्वाचार्यों के
प्रामाण्यवश मिलित पढ़े जाते हैं।
उपमा—जिस प्रकार अन्य पृथिवी आदि पदार्थोंके नाम केवल
अपने स्वरूपसे ही निघण्टुमें पढ़े गये हैं और उनके उदाहरण वेदमें
ढूंढ़ लिये जाते हैं उसी प्रकार उपमा शब्दोंको वहाँ ही पढ़ा है, किन्तु
उनके उदाहरण ही आम्नात किये हैं जिनमें उपमा वाचक शब्द
और वे जिस प्रकारसे जिसकी उपमा जिसमें कह रहे हैं वह सब
हैं। जैसे "इदमिव" इसके समान। यहां 'इव' उपमा वाचक
और 'इदम्' उपमेयवाचक पद हैं।
उपमा दो पदार्थों के बीचका एक सम्बन्ध है इसीसे वह दूसरेके
साथमें हो आता है, किन्तु कहीं एक पदार्थ अपना आप ही उपमान
हो जाता है, जैसे "वायोरात्मोपमा गतिः" अर्थात् वायुकी
गति या वेग अपनी ही उपमा रखता है।
अधिकसे अल्पकी उपमा। "सिंहो माणवकः"माणवक। सिंह
है। यहाँ सिंहके अधिक शूरत्वसे माणवक (बालकके) के शौर्यको
उपमा है।
अधिक प्रसिद्धसे अप्रसिद्धकी उपमा। "चन्द्र इव कान्तो
माणवकः" चन्द्रमाके समान सुन्दर माणवक है यहाँ प्रसिद्ध चन्द्रसे
अप्रसिद्ध माणवककी उपमा है।
कहीं छोटे या अल्पगुणसे बड़े या अधिक गुणकी उपमा।
किन्तु यह वेदमें ही मिलती है, लोकमें इसका अधिक उपयोग
नहीं है ॥ १ ॥

हिन्दी निरुक्त । ७१
(खण्ड २)
[ निरु० ] “तनूत्यजेव तस्करा वनर्गू रशनाभि
दशभिरभ्यधीताम् ।”
[ ऋ० सं० ७, ५, ६२, ६ ]
'तनूत्यक्' तनूत्यक्ता 'वनर्गू' वनगामिनौ चाग्नि-
मन्थनौ बाहू तस्कराभ्यामुपमिमीते । 'तस्करः' तत्
करोति, यत् पापकम्–इति नैरूक्ताः । तनोतेर्वा
स्यात् । सन्ततकर्मा भवति । अहोरात्रकर्मा वा ।
“रशनाभिर्दशभिरभ्यधीताम्” अभ्यधाताम् । ज्यायां
स्तव गुणोऽभिप्रेतः ॥ २ ॥
अर्थ ।
“तनूत्यजेव” मन्त्रका त्रित ऋषि । त्रिष्टुप् छन्दः । प्रातर-
नुवाक और आश्विनमें शस्त्र ।
वनमें रहनेवाले, मार्गमें लूटनेवाले दो चोर 'हरेंगे, या भागेगें'
ऐसे अभिप्रायसे चले, उन्हींसे दो बाहुओं (भुजों) को उपमा
इस मन्त्रमे है ।
मन्त्रार्थ—हे अग्निदेव ! शरीरको त्यागनेवाले, वनमें विचरने
वाले दो चोरोंके समान हमारे दो बाहू दश अङ्गुलियोंसे दोनों
अरणियोंके द्वारा तुम्हें बाँध लें । यहाँ श्रेष्ठ भुजोंकी निकृष्ट
तस्करोंसे उपमा है ।
नि० अ०—'तनूत्यज्' नाम तनू (शरीर) का त्यागने वाला ।
'वनर्गू' वनगामी या वनमें रहने वाले । अग्निके मथने वाले बाहु-
ओंको दो तस्करों (चोरों) से उपमा करता है । 'तस्कर' क्यों ?
'वह कर्म करता है जो पाप रूप है'—यह नैरुक्त आचार्य मानते हैं ।

७२ ३ अ० ३ पा० २ खं० ।
अथवा सन्तत ( निरन्तर ) कर्मवाला होता है। अथवा रात्रि दिन
कर्म करता है [दिनमे वनमे चोरी करता है और रात्रिमे ग्राममे ।]
दश रशनाओं ( अङ्गुलियों ) से 'अभ्यधीताम्' बाँध लें ॥ २ ॥
व्याख्या
"तनूत्यजेव" मन्त्र 'अथापि कनीयसा ज्यायांसम्' छोटेसे भी
बड़ेको उपमा दी जाती है, इस पूर्व खण्डके वाक्यके अनुसार निकृष्ट
पदार्थ से उत्तम पदार्थकी उपमामें उदाहरण है।
तस्करके दो विशेषण मन्त्रमें हैं--"तनूत्यज्या" देहत्यागी
"वनेर्गू" वनचारी। ये दोनों ही विशेषण यह बता रहे हैं कि
ग्राम-वासी और अपने प्राणोंको बचानेकी इच्छा रखने वाला चोर
असली चोर नहीं है। इससे बाँधने और पकड़नेकी उपमाको
पुष्ट करनेके लिये मन्त्रमें तस्करके ये दो विशेषण भी दिये
हैं॥ २॥
( खण्ड ३)
[निरु०-] "कुहस्विद् दोषा कुहवस्तोरश्विना कुहा-
भिपित्वं करतः कुहोषतुः । को वां शयुत्रा
विधवेव देवरं मर्यं न योषा कृणुते सधस्थ-
आ ॥” [ ऋ० सं० ७, ८, १, ८२ ]
कस्विद् रात्रौ भवथः, क्व दिवा, क्वाभिप्राप्तिं
कुरुथः, क्व वसथः, को वां शयने विधवेव देवरम् ।
[एकपदनि०-] (देवरः कस्माद् ? द्वितीयो वर
उच्यते ) 'विधवा' विधातृका भवति । विधवनाद्
वा । विधावनाद् वा इति चमशिराः । अपि वा

'धव' इति मनुष्य नाम । तद् वियोगाद् विधवा ।
'देवगो' दीव्यतिकर्मा । 'मर्यो' मनुष्यः । मरणधर्मा
'योषा' यौतेः । [ ४ र्थ पादः ] आकुरुते सहस्थने ॥
अथ निपाताः पुरस्तादेव व्याख्याताः । 'यथा'
इति कर्मोपमा ।
“यथा वातो यथा वनं यथा समुद्र एजति” ॥
[ ऋ० सं० ५, ५, २, ५ ]
“भ्राजन्तो अग्नयो यथा” ॥ [ ऋ० सं० १, ४,
७, ३ ]
‘आत्मा यक्ष्मस्य नश्यति पुरा जीवगृभो
यथा' । [ ऋ० सं० ८, ५, १०, १, ]
[एक पद निरु-] 'आत्मा' अतते र्वा । आप्तेर्वा ।
अपि वा आप्त इव स्याद्, यावद् व्याप्तिभूत इति ।
“अग्नि र्न ये भ्राजसा रुक्मवक्षसः” [ऋ० सं०
८, ३, १२, २]
अग्निरिव ये (मारुतो भ्राजमाना रोचिष्
पूरस्काः ) भ्राजस्वन्तो रुक्मवक्षसः ॥ ३ ॥
अर्थ ।
“कुहस्विद्दोषा” मन्त्रका कक्षोवान्‌की पुत्री घोषा ऋषि अश्विन्
देवता । जगती छन्दः । प्रातरनुवाक और आश्विनमें शस्त्र है ।”
१०

७४ ३ अ० ३ पा० ३ ख० ।
मन्त्रार्थ-हे अश्विनौ ! तुम दोनों रात्रिमें कहाँ रहते हो ?
तुम दोनों दिनमें कहाँ रहते हो ? कहाँ तुम दोनों स्नान भोजन
आदिके अर्थ अपनी उपस्थिति करते हो ? कहाँ वसते हो ? विधवा
शयनमें देवरको जैसे ( या ) ( कोई ) स्त्री ( किस्सो ) पुरुषको जैसे,
कौन तुम्हें अपने पासमे करता है ? [ जिससे कि-तुम न रात्रि और
न दिन होमें हमारे देखनेमें आते । ] दुःख ! [ इस ऋचामें नीच
देवरसे उत्कृष्ट ( बड़े ) अश्विनोंकी उपमा है । ]
नि० अ०-कहाँ रात्रिमें होते हो ? कहाँ दिनमें ? कहाँ आना
जाना करते हो ? कहाँ वसते हो ? कौन तुम दोनोंको शयनमें
विधवा देवरको जैसे ॥
[ एक पद नि०-] [ देवर क्यों ? द्वितीय (दूसरा) वर कहाता है ]
'विधवा' क्यों ? विधातृका है या उसका धाता ( वर ) मर गया ।
अथवा भर्त्ताके मर जानेसे वह कम्पित जैसी हो जाती है। अथवा
'पतिके अभावसे उसे कोई रुकावट नहीं रहती और वह जहाँ तहाँ
धावन करतो है, इसीसे विधवा है ।"-यह चर्मशिराः ( चमड़ेका
टोप पहनने वाले ) आचार्य मानते हैं । अथवा 'धव' यह मनुष्यका
नाम है, उसके वियोगसे यह विधवा है। 'देवर' क्यों ? क्रीड़ा
करता है। 'मर्य' नाम मनुष्य । ( क्योंकि-) वह मरण धर्मवाला
है। 'योषा' 'यु' मिश्रणे ( अदा० प० ) धातुसे है। [ क्योंकि-)
वह अपनेको पुरुषके साथ मिला लेती है ! ] [ अर्थ पाद-] समान
स्थानमें बुला लेता है, या करता है ।
यहाँसे निपात हैं, सो [ सामान्यरूपसे-] पहले ही व्याख्यान
किये जा चुके हैं। [ अब विशेषरूपसे कहे जाते हैं-] 'यथा' यह
कर्म या क्रियाकी उपमामें है। जैसे-
"जिस प्रकार वायु कम्पित होता है, जिस प्रकार वन,
तथा जिस प्रकार समुद्र कम्पित होता है। [ वैसे ही हे दश मासमें

हिन्दी निरुक्त । ७५
होने वाले गर्भ ! तू अपनी इस माताको दुःख न देता हुआ जरायु
( जेर ) के साथ बाहर निकल । ]"
[ यहाँ 'यथा' पदसे वायु, वन और समुद्रकी कम्पन क्रियासे
गर्भकी क्रियाको उपमा दी गई है । ] अन्य उदाहरण--
'भ्राजन्तो अग्नयो यथा" अर्थात् ' [ भगवान् सूर्यके किरण ]
अग्नियोंके समान प्रदीप्त होते हुए [ अन्धकारको दूर करने या अन्य
उपकारोंके करने या ओषधियोंके पाक आदि करनेके लिये मनुष्योंके
प्रति जाते हैं । ]"
[ यहाँ 'यथा' पदसे अग्निकी प्रदीपन क्रियाका सादृश्य किरणों
के प्रदीपनमे बताया गया है । ] अन्य उदाहरण--
“आत्मा यक्ष्मस्य नश्यति पुरा जीवगृभो यथा ।” अर्थात्
[ मैं आथर्वण भिषक् (वैद्य) जिस समय इन ओषधियोंको प्रशंसा
करता हुआ हाथमें धारण करता हूँ, और हस्तमे लेकर रोगोंके
पास पहुचता ही हूं कि उस समय ओषधियोंके प्रयोगसे ] पहले
ही यक्ष्म रोगका आत्मा नष्ट हो जाता है जिस प्रकार 'जीवगृभ्'
(जीवका लेने हारा) या यमदूतके प्रहारसे पहले ही अहत या
बिना मारे प्राणियोंका जीव नष्ट हो जाता है ।
[ एक पद नि० ] 'आत्मा' क्यों ? 'अत, सातत्यगमने (भ्वा०
प०) धातुसे है । [ अर्थात् सब स्थानोंमे गया हुआ रहता है । ]
अथवा व्याप्ति अर्थमें 'आप्' (स्वा० प०) धातुसे है । क्योंकि-
सभी वस्तु मात्र उससे व्याप्त रहता है, जिससे कि वह सर्वगत
है । अथवा वह कार्य और कारणमें स्थित हुआ संघात (देह) मे
आत्त (पाया हुआ) जैसा होता है, जितनेसे कि-वह व्यापन
किया हुआ है । या सर्वव्यापक होने पर भी जितने शरीरसे
व्यापन किया हुआ होता है उतना ही प्रतीत होता है । क्योंकि

७६ ३ अ० २ पा० ३ खं० ।
उतने ही प्रदेशमें उसकी चैतन्यशक्ति प्रकट होतो है। जिस प्रकार
तप्त लोहे पर तृणको मुट्ठी छोड़ने पर 'तृण संयोग स्थलमें ही
अग्नि प्रकट होता है और अन्य तप्त लोह भागमें अग्नि रहता हुआ
भी प्रत्यक्ष नहीं होता। [नैरुक्तोंके मतमें भी आत्मा विभु है।]
“अग्निर्न ये भ्राजसा रुक्मवक्षसः” अर्थात् “अग्निके समान जा
मरुद् देव भ्राजमान (प्रकाशमान) सुवर्णयुक्त छातोवाले या चम-
कीलो छातो वाले हैं।”॥ ३॥
व्याख्या।
“कुहस्वित् दोषा” मन्त्र जो उपमाके उदाहरणमें दिया गया
है, कक्षोवानको पुत्री घोषा और अश्विनीकुमारोंके संवादसे
हिन्दुओंके घरकी पतिव्रता स्त्री और व्यभिचारकी शङ्कासे युक्त
पतिके संयोगमें स्त्रीका उस पतिके प्रति कैसा भाव हो जाता है
तथा हिन्दू पुरुषोंमें वह कैसा घृणास्पद अथवा त्याज्य हो जाता है
इसका एक उत्तम चित्र दिखाता है। हिन्दू स्त्री और पुरुषका
सहनिवास ही नियत है, पुरुषको चाहिये कि वह दिनमें बाह्य-
कृत्योंको करके रात्रिके समय अपने घरमें आवे। जब वह ऐसा
नहीं करता है तो स्त्रीको उस पर परस्त्री समागकी शङ्का हो जाती
है। इसी नियमके अनुसार घोषाको अश्विनों पर शङ्का हुई है,
उसने अश्विनोंसे कहा है कि जिस प्रकार विधवागामी देवर या
कोई पुरुष परस्त्रीगामी किसी सज्जनके पास नहीं बैठ सकता उसी
प्रकार तुम भी हो। जैसा कि कहा है कि—“कः वां सधस्थे
आकृणुते” कौन पुरुष तुम्हें पास बुला सकता है या बुलाता है”
अर्थात् कोई नहीं, प्रयोजन यह कि—तुम असदाचारके कारण
किसी पुरुषके पास बैठने योग्य नहीं हो। जैसे कि—और और
व्यभिचारी।

हिन्दी निरुक्त । ७७
“कः” पुल्लिङ्ग निर्देशका प्रयोजन यह है कि दूसरी स्त्रियोंने तो
उसे अपने पास बैठा कर व्यभिचारो बनाया हो है, तब पुरुष ही
उसका त्याग कर सकते हैं ।
भाष्यकारने भी “कनीयसा ज्यायांसम्” के उदाहरणमें इस
मन्त्रको देकर यही प्रयोजन लिया है कि व्यभिचारा या विधवा-
गामी देवर त्याज्य है ।
“यथा वातो यथा वनं यथा समुद्र एजति ।
एवा त्वं दशमास्य सहावेहि जरायुणा ।”
इस मन्त्रका सप्तवध्रि आत्रेय ऋषि। अनुष्टुप् छन्दः।
गर्भका अनुमन्त्रण कर्म। जिस समय गर्भवती स्त्रीको दशवें
मासमे प्रसव शूल हो इस मन्त्रसे पिता गर्भको अभिमन्त्रित करता
है, जिससे सुखपूर्वक प्रसव हो जाता है।
“यदि मा वाजिन्नङ्गमोषधो र्हस्तमादधे । आत्मा
यक्ष्मस्य नश्यति पुरा जोवगृभो यथा ।”
ओषधिसूक्तमें ऋचा है। आथर्वण भिषक् ऋषि। अनुष्टुप्
छन्दः। इस मन्त्रसे दीक्षा किया हुआ यजमान आदि अग्निसे
उपतप्त (जला हुआ या दाझा हुआ) इक्कोस बार कुशजलसे मार्जन
किया जाता है। मन्त्रसामर्थ्यसे रोगीका मार्जन विशेष करके
यक्ष्म रोगीका मार्जन करनेसे उसका हित होता है।
“अग्निर्नये” मन्त्र उपमार्थक “न” निपातका उदाहरण है।
इस मन्त्रमें उपमार्थके लिये ‘न’ निपात चार बार आया है।—
'अग्निर्न' अग्निके समान (१) 'वातासो न' वायुयोंके समान (२)
'प्रज्ञातारः सुनोतयोन' बड़े समझदासों व शुभ नीतिवालोंके समान
(३) 'सुशर्माणोन' सुखकारो बन्धुओंके समान (४) मरुद् देवता
हैं। पहले भाष्यकारने निरुक्तके प्रथमाध्यायके द्वितीय पादमें

७८ ३ अ० ३ पा० ४ ख० ।
निपातोंकी व्याख्या की है और वहां पर “न” निपातका उपमा
अर्थमें “दुर्मदासो न सुरायाम्” मदिराके पानसे दुष्ट मदवालोंके
समान, यह उदाहरण भी दिया है, इससे यहाँ पर उसी निपातका
उक्त उदाहरण फिर देना न चाहिये था ? इस पर भगवद्दुर्गेन दो
मत दिखाये हैं:—
(क) कोई आचार्य इस खण्डमे “अग्निर्नये” इस उदाहरणको
नहीं पढ़ते ।
(ख) कोई आचार्य मानते है कि-पहले भाष्यकारने निपातोकी
व्याख्या भूमिकाके अवसरमें की है, और इस समय निघण्टुशास्त्रके
क्रमानुसार की है इसलिये यह उदाहरण यहाँ पर उचित है ॥ ३ ॥
( खण्ड ४ )
[निरु०-] “चतुरश्चिद् ददमानात् विभीयादानिधातोः।
न दुरुक्ताय स्पृहयेत् ।” [ऋ० सं० १, ३, २३, ४]
चतुरोऽक्षान् धारयत इति तद् यथा कितवाद्
बिभीयात्, एव मेव दुरुक्ताद् बिभीयात्, न दुरुक्ताय
स्पृहयेत् कदाचित् । ‘आ’ इत्याकार उपसर्गः ।
पुरस्तादेव व्याख्यातः । अथापि उपमार्थे दृश्यते ।—
“जार आभगम्” [ ऋ० सं० ७, ६, १०, १]
जार इव भगम् । आदित्योऽत्र जार उच्यते ।
रात्रेर्जरयिता स एव भासाम् । तथापि निगमो
भवति ।—
“स्वसु जारः शृणोतु नः” [ऋ० सं० ४, ८, २१, ५]

हिन्द' निरुक्त । ७१
इति उषसम् अस्य स्वसार माह । साहचर्याद्
रस हरणाद् वा । अपि तु अयं मनुष्यजार एव
अभिप्रेतः स्यात्, स्त्री भगम् यथा स्यात् । भजतेः ।
‘मेष’ इति भूतोपमा ।
“मेषो-भूतो ३ भियन्नयः” [ऋ० सं० ५, ७, २४, ५]
मेषो मिषते । तथा पशुः पश्यतेः ।
‘अग्निर्’ इति रूपोपमा ।
“हिरण्यरूपः स हिरण्य सं दृगपान्नपात्सेदु
हिरण्यवर्णः ।” [ऋ० सं २, ७, २३, ५ ]
हिरण्यवर्णस्येवास्य रूपम् । ‘था’ दूति च ।—
“तं प्रत्नथा पूर्वथा विश्वथे मथा ।” [ऋ० सं०
४, २, २३, १]
प्रत्न इव । पूर्व इव । विश्व इव इम इव इति ।
‘अयम्’ एततरः आमुष्मात् । ‘असौ’ अस्ततरः
अस्मात् । ‘अमुथा’ ‘यथा’ असौइति व्याख्यातम् ।
‘वत्’ इति सिद्धोपमा । ब्राह्मणवत् । वृषलवत् ।
ब्राह्मण इव । वृषला इव-इति । वृषलो वृषशीलो
भवति, वृषाशीलो वा ॥ ४ ॥ (१६)
अर्थ ।
“चतुरश्चित्” मन्त्रका घोरपुत्र ऋषि । मित्र, वरुण और
अर्यमा देवता । गायत्री छन्दः ।”

८० ३ अ० ३ पा० ४ खं० ।
'चित्' निपातका उदाहरण —
मन्त्रार्थ—जिस प्रकार चार अक्षों (पासों) को धारण किये
हुए जुवारियेसे उसके पासोंको फेंकनेसे पहले, दूसरा कितव
(जुवारिया) जो उसके साथ जुआ कर रहा है, डरता है, [ क्या
मेरी इच्छानुसार पासे गिरेंगे या विपरीत, जिससे कि मुझ यह
जीत लेगा ? ] उसी प्रकार दुरुक्त (गाली) से डरना चाहिये, तथा
दुरुक्तकी कभी भी इच्छा न करे ।
नि० अ०—चार अक्षोंको धारण करनेवाले कितवसे जिस
प्रकार डरे, ऐसे ही दुरुक्त (दुर्वचन) से डरे, किन्तु कदाचित्
दुरुक्त (गाली) खानेकी इच्छा न करे । 'आ' यह आकार उप-
सर्ग (रूपसे) पहले ही (अ० १ पा० १ खं० ५ में) व्याख्यान
किया जा चुका है। अब उपमा अर्थमें (निपातके रूपसे) देखा
जाता है। [जैसे-]
“जार आ भगम्” [ ऋ० सं० ७,६,१०,१ ]
'जार भग (रस) को जैसे।' यहाँ 'जार' आदित्य (सूर्य)
कहा गया है। [क्योंकि] वह रात्रिका जरण (नाश) करने
वाला है। वही भासों (ज्योतियों) का। वैसा भी निगम
(जनानेवाला) मन्त्र है। 'स्वसुर्जारः शृणोतु नः' [ऋ० सं०
४, ८, २१, ५]
स्वसा (भगिनी) का जार हमारी सुनाई करे। उषाको ही
इसकी बहिन कहता है [किस कारण] साथ रहनेसे या रस
(जलके) हरनेसे। इसके अतिरिक्त [मन्त्र] में यह मनुष्य
जार ही माना जा सकता है। [ऐसा होनेसे भग शब्दसे] स्त्री
भग (योनि) हो सकता है। 'भज' (भ्वा० उ०) धातुसे। 'मेषो
भूत:' मेष (मोढे) के समान' यह 'भूत' शब्दसे उपमा अर्थ है।
[जैसे] “मेषो भूतो ३ भियन्नयः” [ऋ० सं० ५, ७, २५, ५]

हिन्दी निरुक्त । ८१
हे इन्द्र ! जो तू मेंढेके समान मेधातिथिके यज्ञमें आया,
'मेष' 'मिष' ( तु० प० ) धातुसे है। वैसे ही 'पशु' पश्यति या
'दृश' ( भ्वा० पा० ) धातुसे है ।
अग्निको रूप शब्दसे उपमा। जैसे—
“हिरण्य रूपः०” इत्यादि
'हिरण्य (सुवर्ण) के रूपके समान रूप वाला, वह हिरण्य
जैसा दिखाई देनेवाला हिरण्य जैसा अपांनपात् जलोंका पोता,
वैद्युत, अग्नि।' हिरण्य (सुवर्ण) वर्णका जैसा इसका रूप है।
और 'था' यह उपमार्थक है। [ जैसे—
“तं प्रत्नथा० [ ऋ० सं० ४, २, २३, १ ]
'हे सोम ! तू 'तम्' उस इन्द्रको अपने वीर्यसे तृप्त करके
( प्रत्नथा ) चिरन्तन भृगु आदि महर्षियोंके समान (पूर्वथा) ऋषि
पुत्रोंके समान (विश्वथा) सब प्राणियोंके समान ( इमथा ) इस
समयके यजमानोंके समान [ हमारे कामोंको दोहन करता है।]
[ प्रसङ्गसे ] 'अयम्' (इदम्) जो बहुत ही समीप हो, दूरस्थकी
अपेक्षा। “असौ” (अदस्) जो निकटसे दूर गिरा हुआ जैसा
हो । 'अमुथा' की व्याख्या “असौ” के समान है।
'वत्' यह लोकमें प्रसिद्ध उपमावाचक है। [कैसे] 'ब्राह्मणवत्'
ब्राह्मणोंके समान। 'वृषलवत्' वृषलों (शूद्रों) के समान।
'वृषल' क्यों ? वह 'वृष (बैल) कासा शीलवाला होता है।
अथवा वृष (धर्म) में अशील (अधर्म स्वभाव) वृषल होता है ॥४॥(१६)
व्याख्या ।
अपांनपात् । रूपोपमाके उदाहरण “हिरण्यरूपः...अपांनपात्”
मन्त्रमें 'अपांनपात्' देवताकी स्तुति है। अप् नाम जलका और
'नपात्' या नप्ता, पोते (नाती) का नाम है, दोनोंके मेलसे

.८२ ३ अ० ३ पा० ५ खं० ।
'अपांनपात्' नाम बना है, जिसका अर्थ है,-जलका पोता । इसको
मन्त्रोंसे प्रमाणित प्रक्रिया इस प्रकार है, कि-जलका बेटा सूर्य है
क्योंकि वह समुद्रसे निकलता है। "समुद्रादूर्मिर्मधुमाँ उदारत्"
[ ऋ० सं० ३, ८, १०, १ ] 'सूर्य समुद्रसे निकला।' और सूर्यका
बेटा मध्यम लोकका वैद्युत अग्नि है। "आदूतो अग्निमभरद्विव-
स्वतः" अर्थात् देवताओंका दूत वायु विवस्वान् (सूर्य) से अग्नि
लाया। इस परम्पराके साथ जलका नाती वैद्युत अग्नि हुआ, तथा
इसी कारण 'अपांनपात्' कहलाता है।
भूतोपमा । उपमार्थक 'भूत' शब्दसे उपमा ।
रूपमोपमा । उपमार्थक 'रूप' शब्दसे उपमा ।
सिद्धोपमा । लौकिक प्रयोगोंमें 'ब्राह्मणवत्' आदि ॥ ४ ॥(१६)
( खण्ड ५ )
[निरु०-] "प्रियमेधवदत्रिवज्जातवेदो विरूपवत् ।
अङ्गिरस्वन्महिव्रत प्रस्कण्वस्य शृधी हवम्" ।
[ ऋ० सं० १, ३, ३१, ३ ]
'प्रियमेधः' प्रिया अस्य मेधा । यथा एतेषाम्
ऋषीणाम्, एवं प्रस्कण्वस्य शृणु ह्वानम् । 'प्रस्कण्वः'
कण्वस्य पुत्रः । कण्वप्रभवो यथा प्राग्रम् । अर्चिषि
भृगुः सम्बभूव । भृगुभृज्यमानः, न देहे । अङ्गारेषु
अङ्गिराः । 'अङ्गाराः' अङ्कनाः ( अञ्चनाः ) । अत्रैव
'तृतीयम् अच्छत' इत्युचुस्तस्मात्-'अत्रिः' । न त्रयः
इति । विखननाद्—'वैखानसः' । भरणाद्—