निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 382, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ७५
होने वाले गर्भ ! तू अपनी इस माताको दुःख न देता हुआ जरायु
( जेर ) के साथ बाहर निकल । ]"
[ यहाँ 'यथा' पदसे वायु, वन और समुद्रकी कम्पन क्रियासे
गर्भकी क्रियाको उपमा दी गई है । ] अन्य उदाहरण--
'भ्राजन्तो अग्नयो यथा" अर्थात् ' [ भगवान् सूर्यके किरण ]
अग्नियोंके समान प्रदीप्त होते हुए [ अन्धकारको दूर करने या अन्य
उपकारोंके करने या ओषधियोंके पाक आदि करनेके लिये मनुष्योंके
प्रति जाते हैं । ]"
[ यहाँ 'यथा' पदसे अग्निकी प्रदीपन क्रियाका सादृश्य किरणों
के प्रदीपनमे बताया गया है । ] अन्य उदाहरण--
“आत्मा यक्ष्मस्य नश्यति पुरा जीवगृभो यथा ।” अर्थात्
[ मैं आथर्वण भिषक् (वैद्य) जिस समय इन ओषधियोंको प्रशंसा
करता हुआ हाथमें धारण करता हूँ, और हस्तमे लेकर रोगोंके
पास पहुचता ही हूं कि उस समय ओषधियोंके प्रयोगसे ] पहले
ही यक्ष्म रोगका आत्मा नष्ट हो जाता है जिस प्रकार 'जीवगृभ्'
(जीवका लेने हारा) या यमदूतके प्रहारसे पहले ही अहत या
बिना मारे प्राणियोंका जीव नष्ट हो जाता है ।
[ एक पद नि० ] 'आत्मा' क्यों ? 'अत, सातत्यगमने (भ्वा०
प०) धातुसे है । [ अर्थात् सब स्थानोंमे गया हुआ रहता है । ]
अथवा व्याप्ति अर्थमें 'आप्' (स्वा० प०) धातुसे है । क्योंकि-
सभी वस्तु मात्र उससे व्याप्त रहता है, जिससे कि वह सर्वगत
है । अथवा वह कार्य और कारणमें स्थित हुआ संघात (देह) मे
आत्त (पाया हुआ) जैसा होता है, जितनेसे कि-वह व्यापन
किया हुआ है । या सर्वव्यापक होने पर भी जितने शरीरसे
व्यापन किया हुआ होता है उतना ही प्रतीत होता है । क्योंकि