निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 387, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ें८० ३ अ० ३ पा० ४ खं० ।
'चित्' निपातका उदाहरण —
मन्त्रार्थ—जिस प्रकार चार अक्षों (पासों) को धारण किये
हुए जुवारियेसे उसके पासोंको फेंकनेसे पहले, दूसरा कितव
(जुवारिया) जो उसके साथ जुआ कर रहा है, डरता है, [ क्या
मेरी इच्छानुसार पासे गिरेंगे या विपरीत, जिससे कि मुझ यह
जीत लेगा ? ] उसी प्रकार दुरुक्त (गाली) से डरना चाहिये, तथा
दुरुक्तकी कभी भी इच्छा न करे ।
नि० अ०—चार अक्षोंको धारण करनेवाले कितवसे जिस
प्रकार डरे, ऐसे ही दुरुक्त (दुर्वचन) से डरे, किन्तु कदाचित्
दुरुक्त (गाली) खानेकी इच्छा न करे । 'आ' यह आकार उप-
सर्ग (रूपसे) पहले ही (अ० १ पा० १ खं० ५ में) व्याख्यान
किया जा चुका है। अब उपमा अर्थमें (निपातके रूपसे) देखा
जाता है। [जैसे-]
“जार आ भगम्” [ ऋ० सं० ७,६,१०,१ ]
'जार भग (रस) को जैसे।' यहाँ 'जार' आदित्य (सूर्य)
कहा गया है। [क्योंकि] वह रात्रिका जरण (नाश) करने
वाला है। वही भासों (ज्योतियों) का। वैसा भी निगम
(जनानेवाला) मन्त्र है। 'स्वसुर्जारः शृणोतु नः' [ऋ० सं०
४, ८, २१, ५]
स्वसा (भगिनी) का जार हमारी सुनाई करे। उषाको ही
इसकी बहिन कहता है [किस कारण] साथ रहनेसे या रस
(जलके) हरनेसे। इसके अतिरिक्त [मन्त्र] में यह मनुष्य
जार ही माना जा सकता है। [ऐसा होनेसे भग शब्दसे] स्त्री
भग (योनि) हो सकता है। 'भज' (भ्वा० उ०) धातुसे। 'मेषो
भूत:' मेष (मोढे) के समान' यह 'भूत' शब्दसे उपमा अर्थ है।
[जैसे] “मेषो भूतो ३ भियन्नयः” [ऋ० सं० ५, ७, २५, ५]