निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 385, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ें७८ ३ अ० ३ पा० ४ ख० ।
निपातोंकी व्याख्या की है और वहां पर “न” निपातका उपमा
अर्थमें “दुर्मदासो न सुरायाम्” मदिराके पानसे दुष्ट मदवालोंके
समान, यह उदाहरण भी दिया है, इससे यहाँ पर उसी निपातका
उक्त उदाहरण फिर देना न चाहिये था ? इस पर भगवद्दुर्गेन दो
मत दिखाये हैं:—
(क) कोई आचार्य इस खण्डमे “अग्निर्नये” इस उदाहरणको
नहीं पढ़ते ।
(ख) कोई आचार्य मानते है कि-पहले भाष्यकारने निपातोकी
व्याख्या भूमिकाके अवसरमें की है, और इस समय निघण्टुशास्त्रके
क्रमानुसार की है इसलिये यह उदाहरण यहाँ पर उचित है ॥ ३ ॥
( खण्ड ४ )
[निरु०-] “चतुरश्चिद् ददमानात् विभीयादानिधातोः।
न दुरुक्ताय स्पृहयेत् ।” [ऋ० सं० १, ३, २३, ४]
चतुरोऽक्षान् धारयत इति तद् यथा कितवाद्
बिभीयात्, एव मेव दुरुक्ताद् बिभीयात्, न दुरुक्ताय
स्पृहयेत् कदाचित् । ‘आ’ इत्याकार उपसर्गः ।
पुरस्तादेव व्याख्यातः । अथापि उपमार्थे दृश्यते ।—
“जार आभगम्” [ ऋ० सं० ७, ६, १०, १]
जार इव भगम् । आदित्योऽत्र जार उच्यते ।
रात्रेर्जरयिता स एव भासाम् । तथापि निगमो
भवति ।—
“स्वसु जारः शृणोतु नः” [ऋ० सं० ४, ८, २१, ५]