निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
१२४ २ अ० ९ पा० २ खं० ।
उदकनामानि उत्तराणि एकशतम् ( १०१ ) ।
'उदकं' कस्मात् ? 'उनत्ति-इति' सतः ।
नदी-नामानि उत्तराणि सप्तत्रिंशत् ( ३७ ) ।
नद्यः कस्मात् ? नदना भवन्ति, शब्दवत्यः । बहुल-
मासां नैघण्टुकं वृत्तम् । आश्चर्यमिव प्रधान्येन ।
तत्र-इतिहासमाचक्षते ।—
विश्वामित्र ऋषिः सुदासः पैजवनस्य पुरोहितो
बभूव । 'विश्वामित्रः' सर्वमित्रः । 'सर्वम्' संसृ-
तम् । 'सुदाः' कल्याणदानः । 'पैजवनः' पिज-
वनस्य पुत्रः । 'पिजवनः' पुनः स्पर्द्धनीयजवो वा ।
मिश्रीभावगति र्वा । स वित्तं गृहीत्वा विपाट्
शुतुद्र्योः सम्भेदम्-आययौ । अनुययुः-इतरे । स
विश्वामित्रो नदीस्तुष्टाव ।—'गाधा भवत'-इति ।
अपिद्विवत्, अपि बहुवत् । तद्-यद्-द्विवद्-उपरि-
ष्टात् तद् व्याख्यास्यामः । अथ एतद्-बहुवत्-॥ २ ॥
अर्थ ।
( खण्ड विषय-) 'सरस्वती' शब्दके नदी वाचकतामें उदाहरण
मन्त्र । मन्त्रगत-शुष्म, बिस, सानु, पारावतघ्नो, ( व्याख्या प्रसक्त-)
पार, अवार शब्दोंका निर्वचन । उदक-नामोंकी संख्या । 'उदक'
शब्दका निर्वचन । नदी नामोंकी संख्या । 'नदी' शब्दका निर्व-
चन। नदियोंके नैघण्टुक वृत्तके बाहुल्य, और प्राधान्य वृत्तके
आश्चर्य्यरूपताका उल्लेख। नदियोंकी स्तुति यहाँ॥-
“भारद्वाजस्य आर्षम्। जगती।”
“इयं” सरस्वती “शुष्मेभिः” 'शोषकैः' बलिष्ठैः
“तविषेभिः” 'महद्भिः' “ऊर्मिभिः” “गिरीणाम्”
पर्वतानाम् “सानु” शिखरम् “बिसखाः” बिसखा-
नकः “इव” “अरुजत्” अनादरेणैव भनक्तीत्यर्थः।
वयं “पारावतघ्नीम्” 'पारावारघातिनीम्' • तां “सर-
स्वतीम्” “अवसे” रक्षणाय “सुवृक्ताभिः” 'सुप्रवृत्ताभिः
“धीतिभिः” “स्तुतिभिः” “ओविवासेम” 'परिचरेम'-
इत्यर्थः॥
यह सरस्वती बलिष्ठ बड़ी बड़ी लहरियोंसे पर्वतोंके ऊँचे ऊँचे
शिखरोंको बिस (कमलके नाल) को खोदनेवालेके समान अनादर-
से ही भङ्ग कर देती है। हम इधर उधरके किनारोँको भेदन करने
वाली उस सरस्वतीको अपनी रक्षाके अर्थ सुन्दर स्तुतियोंसे
आराधन करें॥
“इयम्” यह शुष्मों शोषणों या बलिष्ठोसे। 'शुष्म' यह बल-
का नाम है, शोषण करता है, इस कर्त्तृवाच्य 'शुष्' (चु० उ०)
धातुसे है। 'बिस' यह भेदनार्थक 'बिस्' (दि० प०) धातुसे है।
अथवा वृद्ध्यर्थकसे। 'सानु' जो बहुत ऊँचा हो। अथवा भले
प्रकार प्रेरित होता है। महत् (बड़ी) ऊर्मियों (लहरियों) से।
पारावतघ्नी नाम पार अवारको घात करने वाली को। 'पार' नाम
पर उधरवाला है। 'अवार' नाम अवर इधरवाला। अवन
१२६ , अ० ३ पा० २ ख० ।
(रक्षा) के लिये। सुप्रवृत्त स्वर आदिकी उत्तमतासे युक्त
स्तुतियोंसे सरस्वतीको 'परिचरेम' आराधन करें ।
वाक्के नामोंके अनन्तर एक सौ एक (१०१) जलके नाम हैं।
'उदक' शब्द किस धातुसे है? 'उनत्ति' गीला करता है, इस
प्रकार कर्त्तृवाच्य 'उन्ही' क्लेदने (रुधा० उ०) धातुसे है।
जल नामोंके पश्चात् सैंतीस (३७) नदीके नाम हैं।
'नदी' क्यों हैं? जिससे कि-नदना या शब्दवाली हैं।
इसका नैघण्टुक गौण वृत्तान्त बहुत है। प्रधानता या मुख्यतासे
आश्चर्य जैसा है। तहाँ इतिहास कहते हैं--विश्वामित्र ऋषि-
सुदस् पैजवनका पुरोहित हुआ था। 'विश्वामित्र' जो सबका
मित्र हो, अथवा जिसका सर्व मित्र हो। 'सर्व' नाम फैला हुआ।
'सुदस्' नाम कल्याण या शुभदानवाले का है। 'पैजवन' पिजवन-
का पुत्र । 'पिजवन' नाम फिर स्पर्द्धा करने योग्य बेगवाला ।
अथवा मिलित गति अथवा अनेक प्रकारकी गतिवाला; वह
विश्वामित्र धन लेकर विपाशा और शुतुद्रुके सङ्गममें आया।
दूसरे (और) पीछे आये। उस विश्वामित्र ने नदियोंकी स्तुति
की कि-तुम अल्प-जल हो जाओ। दोके समान भी और बहुतके
समान भी नदियोंकी स्तुतिऐं हैं)। सो जो दोओकी जैसी हैं,
आगे उसको व्याख्या करेंगे। और जो बहुतोंकी जैसी है वह
यह है—॥ २ ॥
व्याख्या ।
प्रथम खण्डमें कहा गया था कि-मन्त्रोंमें 'सरस्वती' यह नाम
नदीके लिये और देवताके लिये दोनों प्रकारसे आता है। यहाँ पर
नदी सरस्वतीकी स्तुतिमें “इयं शुष्मेभिः” यह मन्त्र दिया है।
बड़ी और बलवाली ऊर्मिभी-(लहरियों) से गिरि-शिखरोंको
नदी ही भेदन कर सकती हैं। इससे इस मन्त्रमें सरस्वती पद
हिन्दी निरुक्त । १२७
नदीके लिये ही है, किन्तु देवताके लिये नहीं ।। यह यास्काचार्य-
का अभिप्राय है। निगमोंके द्वारा शब्दोंके अर्थ इसी प्रकार-
निर्धारित होते हैं। ॥ २ ॥
( खण्ड ३ )
[ निरु० ] “रमध्वं मे वचसे सोम्याय ऋतावरी
रुपमुहूर्त्त मेवैः । प्र सिन्धुमच्छा बृहती मनीषा
वस्युरह्वे कुशिकस्य सूनुः ॥” [ ऋ० सं० ३, २, १२५ ]
“उप” “रमध्वम्” “मे” “वचसे” “सोम्याय”
सोमसम्पादिने । “ऋतावरीः” ऋतवत्यः । ‘ऋतम्’-
इति उदक-नाम । प्रत्यृतं भवति । “मुहूर्त्तम्”
“एवैः” । अयनैः, अवनैर्वा । “मुहूर्त्तः” मुहूर्त्तुः ।
‘ऋतुः’ ऋतेर्गतिकर्मणः । ‘मुहुः’ मूढ इव कालः ।
यावत्-अभीक्ष्णञ्च-इति । ‘अभीक्ष्णम्’ अभिक्षणाद्-
भवति । ‘क्षणः’ क्षणोतेः । प्रक्ष्णुतः कालः । ‘कालः’
कलयतेर्गतिकर्मणः । “प्र” अवगाहयामि “सिन्धुम्” ।
‘बृहत्या’ महत्या । ‘मनीषया’ मनस ईषया । ‘स्तुत्या’
‘प्रज्ञया वा’ । अवनाय “कुशिकस्य सूनुः” ।
कुशिको राजा बभूव । क्रोशतेः शब्दकर्मणः । क्रंशते
र्वा स्यात् प्रकाशयतिकर्मणः । साधु विक्क्रोशयिता
अर्थानाम् इति वा । नद्यः प्रत्यूचुः ॥ ३ ॥
१२८ २ अ० ७ प० ३ ख० ।
अर्थ ।
[ खण्ड विषय ] विश्वामित्र कृत मिलित नदियोंकी स्तुति,
पुनः एक नदीकी स्तुति और अपने पिताके परिचय देनेका जनाने-
वाला उदाहरण मन्त्र ! मन्त्रका भाष्य और तहाँ मन्त्रगत-सोम्य,
ऋतावरी, मुहूर्त्त, मनीषा, कुशिक, और विग्रहप्रसक्त-ऋत, मुहुः,
ऋतु, अभीक्ष्ण, क्षण, काल, शब्दोंका निर्वचन । नदियोंके
प्रत्युत्तरका प्रस्ताव ।
“रमध्वं मे वचसः” इति त्रिष्टुभः एताः ।
हे “ऋतावरीः” । उदकवत्यो नद्यः । “मे” मम
“सोम्याय” सोम सम्पादिने “वचसे” वचनाय;“एवैः”
एभिः (उदकैः) “मुहूर्त्तम्” “उपरमध्वम्” मन्दवेगाः
अल्पोदकाश्च भवत-इत्यभिप्रायः । [ एकां प्रति ]
“कुशिकस्य सूनुः” पुत्रः अह विश्वामित्रः “अवस्युः”
अवनम्-इच्छन् “सिन्धुम्” “अच्छा” अच्छ अच्छ
“बृहती, मनीषा” बृहत्या मनः पूर्विकया स्तुत्या “प्र-
अह्वे” प्राभिह्वयामि इत्यर्थः ॥
हे जलवाली नदिओं ! मेरे देवताओंको सोम दिलानेवाले वचन-
के लिये (उसे सत्य करनेके अर्थ) इन अपने जलोंसे थोड़ी देर तक
मन्दवेग और थोड़े-जलवाली हो जाओ । [ एक नदीके प्रति ]
मैं कुशिकका पुत्र विश्वामित्र अपनी रक्षाकी इच्छा करता हुआ
सिन्धु नदीको अच्छी और बड़ी स्तुतिसे आह्वान करता हूं ॥
मेरे वचनके लिये अनुकूल हो । “सोम्य” सोमके तैयार कराने
वालेके लिये । “ऋतावरी” नाम ऋतवालीं । 'ऋत' यह जलका
१३० । २ अ० ७ पा० ४ ख० ।
“इन्द्र ऽअस्मान्-अरदद्-वज्र॒बाहुः”। ‘रदतिः’
खनतिकर्मा । “अपा॒हन्-वृ॒त्रं-परि॒धिं” “न॒दीनाम्”
इति व्याख्यातम् । “देवोऽनयत् सविता सुपाणिः’ ।
कल्याणपाणिः । ‘पाणिः’ पणायतेः पूजाकर्मणः ।
प्रगृह्य पाणी देवान् पूजयन्ति । “तस्य वयं प्रसवे
याम उर्वीः”। ‘उर्वीः’ ऊर्णोतेः । वृणोतेः-इति
और्णवाभः । प्रत्याख्याय अनन्ततः आश्रुश्रुवुः ॥४॥
अर्थ ।
[खण्ड विषय-] नदियोंका प्रतिवचन, कि हम तुम्हारी प्रार्थना
के स्वीकारमें स्वतन्त्र नहीं। पाणि, उर्वी शब्दोंका निर्वचन।
सूक्तके अन्तमें ऋषिके वाञ्छितको पूरा करनेकी प्रतिज्ञाका उल्लेख।
हे विश्वामित्र ! “वज्रबाहुः इन्द्रः अस्मान्
अरदत्” अखनत् । “नदीनां परिधिं” निरोधकं
“वृत्रं” मेघम् “अपाहन्” अपावधीत् । स एव
“सविता” वर्षद्वारेण सर्वार्थ-प्रसविता “सुपाणिः”
‘कल्याणपाणिः’ समुद्रम् “अनयत्” “तस्य” इन्द्रस्य
“प्रसवे” आदेशे वर्त्तमानाः ‘“उर्वीः” ऊर्णुवत्यः
वयं “यामः” गच्छामः इत्यर्थः ।
हे विश्वामित्र ! वज्रको हाथमें रखनेवाले इन्द्रने हमें खोदा
है। [क्योंकि-] नदियोंके रोकनेवाले मेघको उसने मारा, [जिसके
हत होनेसे पानी पृथ्वी पर गिरे, और वे पृथ्वीको खोदते हुए नीचे
हिन्दी निरुक्त । १३१
नीचेको ओर चले, उन्हींके किये हुए खातोंसे हम जाती हैं।]
इसो प्रकार कामोके देनेवाले सुन्दर-ह थवाले इन्द्र देव ने हमे समुद्र
में पहुँचाया । अतः हम पृथ्वीको ढाँपती हुई उसकी आज्ञामें
चलती हैं। हमारा वही ईश्वर है, वही हमें आज्ञा दे सकता है,
किन्तु तुम नहीं, यह अभिप्राय है ॥
वज्रबाहु इन्द्रने हमको रदन किया । 'रद्' ( भ्वा० प०) धातु
का खोदना अर्थ है। नदियोंके परिधि (रोकनेवाले) वृत्रको
मारा । "नदी" शब्दका व्याख्यान [नदना या शब्दवती ] [ अ०
२ पा० ७ खं० २] [ नद्यः कस्मात् ? नदना भवन्ति शब्दवत्यः ]
किया जा चुका । 'सविता" कार्योंके दाता सुपाणि इन्द्रदेवने
हमे पहुँचाया । 'सुपाणि' नाम कल्याण या मङ्गलकारी हाथवाले-
का है । 'पाणि' शब्द पूजा अर्थमें 'पण' (भ्वादि आ०) धातुसे
है । [ क्योकि ] पाणि ( हाथ ) जोड़ कर ही देवताओंको पूजते
हैं। हम उर्वी या ढाँपनेवाली, उसके प्रसव ( आदेश ) में चलती
हैं। 'उर्वी' शब्द 'ऊर्णुञ्' आच्छादने ( अदा० उ०) धातुसे है।
'वृञ्' वरणे ( स्वा० उ०) धातुसे है—यह और्णवाभ आचार्य
मानते हैं । अस्वीकार कर अन्तमें नदियों ने स्वीकार किया ॥ ४ ॥
व्याख्या ।
नदियोंने जो विश्वामित्रकी प्रार्थनाका "इन्द्रो अस्मान्" इस
मन्त्रमें प्रत्याख्यान किया है, उसमें नदियाँ अपने साथ शत्रुके मारने
रूप इन्द्रके उपकारके बदलेमें उसके प्रति पूरी कृतज्ञता और वश्यता
दिखा रही हैं। यह मनुष्योंके लिये उपादेय धर्म है ॥ ४ ॥
(खण्ड ५)
[ निघ०] अत्यः ( १ )। हयः ( २ । अर्वा
( ३ )। वाजी ( ४ )। सप्तिः ( ५ )। वह्निः (६) ।
१३२ ¦ २ अ० ३ पा० ५ ख० ।
दधिक्राः (७) । दधिक्रावा (८) । एतग्वा (९) ।
एतेशः (१०) । पैद्वः (११) । दौर्गहः (१२) ।
औच्चैः श्रवसः (१३) । तार्क्ष्यः (१४) । आशुः
(१५) । ब्रध्नः (१६) । अरुणः (१७) । सांश्वत्वः
(१८) । अव्यथयः (१९) । श्येनासः (२०) ।
सुपर्णाः (२१) । पतङ्गाः (२२) । नरः (२३) ।
ह्दार्याणाम् (२४) । हंसासः (२५) । अश्वाः
(२६) । इति षड् विंशतिरश्वनामानि ॥ १४ ॥
[ निरु० ] "आ ते कारो शृणवामा वचांसि
ययाथ दूरादन सार्थेन । निते नंसै पीप्यिानावयोषा
मर्यायेव कन्या शश्वचैते ॥”
[ ऋ० सं० ३. २. १३. ५ ]
“आ शृणवाम" "ते कारो !” वचनानि ।
याहि दूराद्-अनसा च “रथेन” च । “नि” नमाम
“ते” पाय यमाना “इव-योषा" पुत्रम् । "मर्याय-
इव कन्या" परिष्वजनाय निनंसै-इति वा । अश्व-
नामानि-उत्तराणि षड् विंशतिः ।
तेषामष्टौ-उत्तराणि बहुवत् । 'अश्व' कस्मात् ?
अश्नुते अध्वानम् । महाशनो भवति-इति वा ।
तत्र 'दधिक्रा'-इत्येतद्-'दधत् क्रामति'-इति वा ।
‘दधत्-क्रन्दति’-इति वा । दधत् आकारी भवति-
इति वा । तस्य अश्ववद्-देवतावच्च निगमा भवन्ति ।
तद् यद् देवतावद्-उपरिष्टात् तद् व्याख्यास्यामः ।
अथ एतद् अश्ववत् ॥ ५ ॥
अर्थ ।
[ खण्ड विषय-] विश्वामित्रका प्रार्थनाके स्वीकार करनेमें नदि-
योंका वचन = ‘आतेकारा” मन्त्र । अश्वना गोंका सख्या । अश्व,
दधिक्राः, इन दो शब्दोंका निर्वचन । दधिक्रा शब्दके अश्व और
देवता दोनोंके लिये मन्त्रोंमें आनेका उल्लेख । देवतार्थकके आगे
व्याख्यान करनेका प्रतिज्ञा । अश्व अर्थमें यहीं उदाहरण देनेका
प्रस्ताव” ।
हे “कारो !” स्तोत्राणां कर्त्तः ! “ते” तव
“वचांसि” “आ” आभिमुख्येन वयं “शृणवाम”
[ अतो ब्रूमः ] त्वं “ययाथ” याहि । कथम् ?
“अनसा” शकटेन “रथेन” च सह । यतस्त्वं
“दूरात्” आयातः परिश्रान्तश्च । तेन वयम्-एताः
“ते” तुभ्यं पुत्रं “पीप्याना” पाययमाना” योषा-
इव” “निनंसै” निनमाम । पुनश्च “मर्याय” मनु-
ष्याय “शश्वचै” परिष्वजनाय “कन्या” नवोढा
“इव” “ते” तुभ्यं निनमाम ।
१३६ | २ अ० ९ पा० ५ ख० ।
हे मन्त्र नम्रोंके करनेवाले ! तेरे वचनोंको हम सामनेसे
सुनती हैं। इससे हम कहती हैं, कि तुम गाड़ी ओर रथ सहित
चले आओ। क्योंकि तुम दूरसे आये और थके हुए हो। इसलिये
ये हम तेरे लिये पुत्रको पिलानेवाली माताके समान और आलि-
ङ्गन या लिपटानेके लिये पुरुषके अर्थ बौंदनीके समान झुकती हैं।
हे कारो ! तेरे वचनोको आभिमुख्यसे सुनती हैं। जा।
दूरसे गाड़ी से और रथसे। तेरे लिये झुकती हैं। पुत्रको पिलाने
वाली स्त्रीके समान। अथवा लिपटानेके अर्थ पुरुषके लिये कन्या
नयो ब्याही स्त्रीके समान हम झुकती हैं।
प्रकृत नदीके नामोंके अनन्तर छब्बीस (२६) अश्वके नाम हैं।
उनमें पिछले आठ (८) नाम बहु वचनान्त हैं। 'अश्व' क्यों? वह
मागको अश्रुते या व्याप्त करता है। अथवा बहुत अशन या भोजन
करनेवाला है। तहाँ 'दधिक्रा' यह नाम है। अश्वारोहको धारण
करता हुआ चलना है। अथवा अश्वारोहको धारण करता हुआ
क्रन्दन या शब्द करता है। अथवा अश्वारोहको धारण करता हुआ
आकारवाला होता है। उसके अश्वके समान ओर देवताके समान
निगम (मन्त्र) हैं। सो जो देवतामे समान है उसे आगे (दैव-
तकाण्ड अ० १० में) व्याख्यान करेंगे। ओर यह अश्वके समान
है।—॥ ५ ॥
व्याख्या ।
मनुष्यस्वभाव-जब मनुष्यको किसीकी प्रार्थना पूरी करना होता
है, तो वह उसके सामने देख कर सुनता है, और जब उसे उसका
कार्य नहीं करना है, तो सामने नही देखता, तथा सुनी अनसुनी
कर देता है। जब कोई कहता है, मैंने सुना ! तो समझना चाहिये
कि मेरी प्रार्थनाको पूरी करना चाहता है। ऐसा ही नदियोंने अब
“आते” मन्त्रमे विश्वामित्रसे कहा है।
हिन्दी निरुक्त । | १३५
भर्म-दूरसे अपने पास आये हुआका अनुरोध (लिहाज) और
शरणागतकी रक्षा। मन्त्रमे नदियोने विश्वामित्रसे ऐसा ही बर्त्ताव
किया है।
दधिक्राः । 'दधत्' शब्दके साथ पर्यायसे 'क्रम्'। (भ्वा० प०)
'क्रन्दू' (भ्वा० प०] धातु और आकार शब्दके मेलसे बनाया है।
सवारके चढ़ जाने पर ही अश्वकी उदासीनता हटती है, और वह
यथेष्ट गति, शब्द, और आकारको धारण करता है ॥ ५ ॥
(खण्ड ६)
[ निघ० ] हरी इन्द्रस्य ( १ ) । रोहितः-अग्नेः
( २ ) । हरितः-आदित्यस्य ( ३ ) । रासभौ-अश्विनोः
( ४ ) । अजाः पूष्णः ( ५ ) । पृषत्यो मरुताम् ( ६ ) ।
अरुण्योगावः-उषसः ( ७ ) । श्यावाः सवितुः ( ८ ) ।
विश्वरूपाः बृहस्पतेः ( ६ ) । नियुतो वायोः ( १० ) ।
इति दश आदिष्टोपयोजनानि ॥ १५ ॥
वैदिक देवताओंके वाहन ।
अर्थः-हरे दो घोडे,-इन्द्रके (१) लाल घोडा,-अग्निका (२)
हरे बहुत घोड़े, आदित्यके (३) । दो गधे,-दोनों अश्विनी-
कुमारोंके (४) । बहुत बकरे पूषाके (५) । बहुत पृषती (गो
या मृग-विशेष )-मरुतोंके (६) । लाल गौएं-उषाके (७)।
श्याव या काले रङ्गको सविताके (८)। सब रङ्गवालीं बृहस्पतिके
(६)। मिलीजुली गौएँ वायुके बाहन हैं। (१०) । दश 'हरी'
आदि नाम विशेष विशेष देवताओंसे सम्बन्ध रखनेवाले हैं ॥ १५ ॥
५३६ २ अ० ७ पा० ६ ख० ।
[ निघ० ] भ्राजते ( १ ) । भाशते ( २ ) ।
भाश्यति ( ३ ) । दीदयति (४) । शोचयति ( ५ ) ।
मन्दते ( ६ ) । भन्दते ( ७ ) । रोचते ( ८ ) ।
द्योतते ( ९ ) । ज्योतते ( १० ) । द्युमत् ( ११ ) ।
इति एकादश ज्वलति कर्म्माणः ॥ १६ ॥
[ निघ० ] जमत् ( १ ) । कल्पलौकिनम् (२) ।
जञ्जणाभवन् ( ३ ) । मल्मलाभवन् ( ४ ) । अर्चिः
( ५ ) । शोचिः ( ६ ) । तपः ( ७ ) । तेजः ( ८ ) ।
हरः ( ९ ) । घृणिः ( १० ) । शृङ्गाणि ( ११ ) ।
शृङ्गाणि इति एकादश ज्वलतो नामधेयानि नाम-
धेयानि ॥ १७ ॥
निघण्टुका खण्डसूत्र—
“गौः ( १ ) हेम ( २ ) अम्बरम् ( ३ ) स्वः (४)
खेद्यः ( ५ ) ज्ञाताः ( ६ ) । श्यावी ( ७ ) । विभा-
वरी ( ८ ) वस्तोः ( ६ ) अद्भिः ( १० ) श्लोकः ( ११ )
अर्णः ( १२ ) अवनयः ( १३ ) अत्यः ( १४ ) हरौ
इन्द्रस्य ( १५ ) भ्राजते ( १६ ) जमत् ( १७ ) इति
सप्तदश ( १७ ) ॥”
इति निघण्टौ प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
हिन्दी निरुक्त । १३७
[ निरु० ] "उतस्य वाजी क्षिपणिं तुर्र्यति ।
ग्रीवायां बद्धो अपिकक्ष आसनि ।
क्रतुं दधिक्रा अनुसन्तवीत्वत्
पथामङ्कांस्यन्वापनीफणत् ॥"
[ ऋ० सं० ३, ७, ४, ४ ]
"अपि" स "वाजी" वेजनवान् क्षेपणमनु तूर्ण म-
श्नुते अध्वानम्, “ग्रीवायां बद्धः ।” 'ग्रीवा' गिरते
र्वा । गृणाते र्वा । गृह्णते र्वा । "अपिकक्ष-आसनि"
इति व्याख्यातम् । "क्रतुं दधिक्राः" कर्म वा प्रज्ञां
वा । "अनुसन्तवीत्वत् ।” तनोतेः पूर्वया प्रकृत्या
निगमः । "पथामङ्कांसि ।” पथां कुटिलानि । 'पन्थाः'
पतते र्वा । पद्यते र्वा । पन्थते र्वा । 'अङ्कः'-अञ्चतेः ।
"अपनी फणत्"-इति फणतेः-चर्करीतवृत्तम् । दशं-
उत्तराण्यादिष्टोपयोजनानि-इति-आचक्षते-साहचर्य-
ज्ञानाय । ज्वलतिकर्माणः उत्तरे-धातवः-एकादश ।
तावन्ति- एव उत्तराणि ज्वलतो नामधेयानि नाम-
धेयानि ॥ ६ ॥
( इति षष्ठः खण्डः )
सप्तमः पादः ।
द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः ॥ २ ॥
१८
१३८ २ अ० ३ पा० ६ खं० ।
अर्थ ।
[ खण्ड विषय-] 'दधिक्रा' शब्दकी अश्ववाचकतामें उदाहरण
मन्त्र । 'ग्रीवा' शब्दका निर्वचन । 'आसन्' शब्दके पूर्व किये हुए
निर्वचनका स्मरण । 'अनुसन्तवीत्वत्' पदकी प्रकृति । 'पथिन्'
और 'अङ्क' शब्दका निर्वचन । 'अपनीफणत्' पदकी प्रकृति और
वृत्ति । प्रयोजन सहित आदिष्टोपयोजन नामोंकी संख्या । ज्वलति-
कर्मा धातुओं और ज्वलत्के नामोंकी संख्या ॥'
“उतस्य वाजी-इति गोतमपुत्रस्य वामदेवस्य
द्वयमार्षम् । जगती । वाजपेये वाजियुक्तं रथमारुह्य
यजमानोऽनुवाकं जपति, तवैषा ।”
“उतस्यः” अपि सः “वाजी” वेजनवान् ‘ओविजी’
भयचलनयोः ( रु० प० )-( तु० आ० ) भयवान्
परेभ्यो भयदाता, “ग्रीवायां बद्धे आसनि” मुखे च
“बद्धः अपि” “दधिक्राः” अश्वः “क्षिपणिं” कशा-
घातम् अनु [ अनाहतोऽपिवा ] “तुरण्यति” तूर्ण म-
श्नुते अध्वानम्, “ऋतुम्” आत्मीयं गमनं कर्म अथवा
अश्वारोहस्य प्रज्ञाम् “अनुसन्तवीत्वत्” अनुसन्तनोति,
“पथां” मार्गाणाम् “अङ्कांसि” कुटिलानि अनुलोमानि
इव कुर्वन् “आपनीफणत्” आभिमुख्येन पुनः पुनः
भृशं वा फणति गच्छति-इत्यर्थः ॥
हिन्दी निरुक्त । १३६
वह 'वाजी' शत्रुओंको डरानेवाला गर्दनमे बाघीसे, छातीमे
कक्ष्या या तङ्गसे और मुखमें खलीन या लगामसे बँधा हुआ होने
पर भी घोड़ा कोड़ेके लगते ही, या लगनेसे पहिले ही शीघ्र मार्गको
व्याप्त कर लेता है [ जब कि दूसरा प्राणी एक स्थानमें भी बँधा
हुआ चल भो नहीं सकता, शीघ्र चलना तो कहाँ । ] अपने गमन-
रूप कर्मको अथवा अपने सवारकी बुद्धिको विस्तृत [ क्योंकि-
शीघ्र चलनेके कारण स्वामीके वाञ्छितको सिद्ध करता है । ] ओर
मार्गकी जो कुटिलता या टेढ़ापन है, उसे अपनी शीघ्रगतिके
प्रभावसे सरल करता हुआ बार बार या अति गमन करता है ॥
इस मन्त्रमें दधिक्राके वर्णनमे जो विशेषण दिये हैं, वे सब
अश्वमें ही घटते है, इस लिये यह 'दधिक्रा' के अश्ववचनतामें
प्रमाण है ।
वेदके समयमे जो घोड़ेकी तैयारीमें सभ्यता थी, वह अब तक
भी उसी रूपमें है, कोई परिवर्त्तन नहीं हुआ है ।
वह वाजी वेजनवान् या भयवान् कोड़ेके साथ ही शीघ्र मार्गको
व्याप्त करता है । ग्रीवामें बँधा हुआ । 'ग्रीवा' शब्द निगलने
अर्थमें 'गृ' ( तु० प० ) धातुसे है । क्योंकि—उससे अन्नको
निगलता है । अथवा शब्द अर्थ में 'गृ' ( क्रया० प० ) धातुसे है ।
क्योंकि—उससे शब्द करता है । अथवा ग्रहण अर्थमे 'ग्रह' ( क्रया०
उ० ) धातुसे है । क्योंकि—उससे जल आदिको ग्रहण करता है ।
अथवा वह जत्रोऽसे बाँधी जाती है । कक्ष ( छाती ) में और
आसन् ( मुख ) में । 'आसन्' शब्दकी व्याख्या [ ] हो चुकी ।
“ऋतु' दधिक्राः” 'ऋतु' कर्म या प्रज्ञाको । 'दधिक्रा' अश्व ।
“अनु सन्तवीत्वत्” 'तनु' विस्तारे ( त० उ० ) धातुकी पहिली
प्रकृतिके निगम है ।
१४० २ अ० ६२ पा० ख० ।
“प्रकृत्यन्तः सनन्तश्च यङन्तो यङ्लुगेव च ।
रायन्तो रायन्तसनन्तश्च षड्विधो धातुरुच्यते ॥”
अर्थ:—प्रकृत्यन्त, सनन्त, यङन्त, यङ्लुक्, रायन्त, और रायन्त
सनन्त छः प्रकारका धातु होता है ।
‘पथित्’ शब्द ‘पत्लृ’ पतने (भ्वा० प०), ‘पद’ गतौ (दि०
आ०) और ‘पथि’ गतौ (चु० प०) धातुसे है । ‘अङ्क’ शब्द ‘अञ्चु’
गतिपूजनयोः (भ्वा० प०) धातुसे है । ‘अपनीफणत्’ यह क्रिया
पद ‘फण’ गतौ (भ्वा० प०) यङ्लुगन्त धातुसे है । अश्वोंके
नामोंके अनन्तर दश (१०) आदिष्टोपयोजन हैं ऐसा आचार्य कहते
हैं । यद्यपि ये अश्वोंके ही नाम हैं, इससे इन्हें पूर्वोक्त अश्व नामोंके
साथ मिला कर ही कहना चाहिये था, तथापि ये नाम विशेष
विशेष देवताओंके सम्बन्धसे ही मन्त्रोंमें आते हैं, इस लिये उन
देवताओंके साहचर्य या सम्बन्धके दिखानेके लिये अलग पढ़े
गये हैं ।
आदिष्टोपयोजन नामोंके पश्चात् ‘ज्वलति’ (जलता है) के
अर्थमे ग्यारह (११) धातु हैं । उतने ही उनके आगे ज्वलत् पर
जलता हुआके नाम है ॥ ६ ॥
व्याख्या ।
ज्वलितकर्मा । क्योकि-जो ही अश्ववाले होते हैं, वे ही तेजसे
जलते हुए जैसे होते हैं, इसीसे अश्वनामोंके अनन्तर ज्वलित अर्थ-
वाले धातु कहे हैं ॥ ६ ॥
निरुक्तके द्वितीय-अध्यायका खण्डसूत्र—
हिन्दी निरुक्त । १४१
[ १म पाद् ] ' अथ निर्वचनम् (अर्थाप्यस्तैः ) (१)
ओघः (शवभिः) (कक्ष्या-सामान्यादश्वस्य) (विष्व-
कद्राकर्षः ) ( २ ) राज्ञः ( ३ ) विद्याह वै ( ४ )
[ द्वि० पा० ] अथातोऽनुक्रमिष्यामः ( ५ ) वृक्षे वृक्षे
( ६ ) ता वां वास्तूनि ( ७ ) य ईं चकार ( ८ )
अयं स शिङ्क्ते ( ८ ) [ तृ० पा० ] हिरण्यनामानि
( १० ) आर्ष्टिषेणः ( ११ ) [४र्थ पा०] यद्देवापिः (१२)
साधारणानि ( १३ ) स्वरादित्यः (१४ ) [ ५म पा० ]
रश्मिनामानि ( १५ ) अतिष्ठन्तीनां ( १६ ) दासपत्नीः
( १७ ) [ ६ष्ठ पा० ] रात्रिनामानि ( १८ ) इदं श्रेष्ठं
( १८ ) रुशद्वत्सा ( २० ) अहश्च कृष्णम् ( २१ )
देवानां माने ( २२ ) [ ७म पा०] वाङ्नामानि ( २३ )
इयं शुष्मेभिः ( २४ ) रमध्वं मे ( २५ ) इन्द्रो अ-
स्मान् ( २६ ) आ ते कारो ( २७ ) उतस्यः ( २८ )
अष्टाविंशतिः ( २८ ) ॥
इति निरुक्ते पूर्वषट्के
द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः ॥ २, ७॥
१४२ २ अ० ७ पा० ६ खं० ।
ऊपर दिये हुए खण्डसूत्रके अनुसार इस द्वितीय अध्यायमें
आरम्भसे अन्त तक निरुक्तके पाठमें खण्ड आये हैं। उन्हींके
स्मरणार्थ यह खण्डसूत्र है। जहां आदर्श पुस्तकमें एक खण्डमें
दो खण्ड या अन्यथा किया गया है, वहां मूल खण्ड प्रतीकके साथ
द्वयर्धचन्द्र-( ) चिन्हके भीतर नवीन पाठ-विभाग दे दिया
गया है। पादोंका आरम्भ और खण्डोंकी संख्या भी यथास्थान
उक्त चिन्हमें दी गई है।
इति हिन्दीनिरुक्ते पूर्वषट्के द्वितीयोऽध्यायः
समाप्तः ॥ २, ७ ॥
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