निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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अर्थ ।
[ खण्ड विषय ] विश्वामित्र कृत मिलित नदियोंकी स्तुति,
पुनः एक नदीकी स्तुति और अपने पिताके परिचय देनेका जनाने-
वाला उदाहरण मन्त्र ! मन्त्रका भाष्य और तहाँ मन्त्रगत-सोम्य,
ऋतावरी, मुहूर्त्त, मनीषा, कुशिक, और विग्रहप्रसक्त-ऋत, मुहुः,
ऋतु, अभीक्ष्ण, क्षण, काल, शब्दोंका निर्वचन । नदियोंके
प्रत्युत्तरका प्रस्ताव ।
“रमध्वं मे वचसः” इति त्रिष्टुभः एताः ।
हे “ऋतावरीः” । उदकवत्यो नद्यः । “मे” मम
“सोम्याय” सोम सम्पादिने “वचसे” वचनाय;“एवैः”
एभिः (उदकैः) “मुहूर्त्तम्” “उपरमध्वम्” मन्दवेगाः
अल्पोदकाश्च भवत-इत्यभिप्रायः । [ एकां प्रति ]
“कुशिकस्य सूनुः” पुत्रः अह विश्वामित्रः “अवस्युः”
अवनम्-इच्छन् “सिन्धुम्” “अच्छा” अच्छ अच्छ
“बृहती, मनीषा” बृहत्या मनः पूर्विकया स्तुत्या “प्र-
अह्वे” प्राभिह्वयामि इत्यर्थः ॥
हे जलवाली नदिओं ! मेरे देवताओंको सोम दिलानेवाले वचन-
के लिये (उसे सत्य करनेके अर्थ) इन अपने जलोंसे थोड़ी देर तक
मन्दवेग और थोड़े-जलवाली हो जाओ । [ एक नदीके प्रति ]
मैं कुशिकका पुत्र विश्वामित्र अपनी रक्षाकी इच्छा करता हुआ
सिन्धु नदीको अच्छी और बड़ी स्तुतिसे आह्वान करता हूं ॥
मेरे वचनके लिये अनुकूल हो । “सोम्य” सोमके तैयार कराने
वालेके लिये । “ऋतावरी” नाम ऋतवालीं । 'ऋत' यह जलका