निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । १३१
नीचेको ओर चले, उन्हींके किये हुए खातोंसे हम जाती हैं।]
इसो प्रकार कामोके देनेवाले सुन्दर-ह थवाले इन्द्र देव ने हमे समुद्र
में पहुँचाया । अतः हम पृथ्वीको ढाँपती हुई उसकी आज्ञामें
चलती हैं। हमारा वही ईश्वर है, वही हमें आज्ञा दे सकता है,
किन्तु तुम नहीं, यह अभिप्राय है ॥
वज्रबाहु इन्द्रने हमको रदन किया । 'रद्' ( भ्वा० प०) धातु
का खोदना अर्थ है। नदियोंके परिधि (रोकनेवाले) वृत्रको
मारा । "नदी" शब्दका व्याख्यान [नदना या शब्दवती ] [ अ०
२ पा० ७ खं० २] [ नद्यः कस्मात् ? नदना भवन्ति शब्दवत्यः ]
किया जा चुका । 'सविता" कार्योंके दाता सुपाणि इन्द्रदेवने
हमे पहुँचाया । 'सुपाणि' नाम कल्याण या मङ्गलकारी हाथवाले-
का है । 'पाणि' शब्द पूजा अर्थमें 'पण' (भ्वादि आ०) धातुसे
है । [ क्योकि ] पाणि ( हाथ ) जोड़ कर ही देवताओंको पूजते
हैं। हम उर्वी या ढाँपनेवाली, उसके प्रसव ( आदेश ) में चलती
हैं। 'उर्वी' शब्द 'ऊर्णुञ्' आच्छादने ( अदा० उ०) धातुसे है।
'वृञ्' वरणे ( स्वा० उ०) धातुसे है—यह और्णवाभ आचार्य
मानते हैं । अस्वीकार कर अन्तमें नदियों ने स्वीकार किया ॥ ४ ॥
व्याख्या ।
नदियोंने जो विश्वामित्रकी प्रार्थनाका "इन्द्रो अस्मान्" इस
मन्त्रमें प्रत्याख्यान किया है, उसमें नदियाँ अपने साथ शत्रुके मारने
रूप इन्द्रके उपकारके बदलेमें उसके प्रति पूरी कृतज्ञता और वश्यता
दिखा रही हैं। यह मनुष्योंके लिये उपादेय धर्म है ॥ ४ ॥
(खण्ड ५)
[ निघ०] अत्यः ( १ )। हयः ( २ । अर्वा
( ३ )। वाजी ( ४ )। सप्तिः ( ५ )। वह्निः (६) ।