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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1177

हिन्दी निरुक्त ( ४१४ ) ११ अ० २पा० ५ खं०
( खं० ५ )
निरु०-“विरूपास इदृषयस्तं इद् गम्भीरवेपसः'
ते अङ्गिरसः सूनवस्ते अग्नेः परिजज्ञिरे ॥”
( ऋ० सं० ६, २, १, ५ ) ॥
बहुरूपा ऋषयः, ते गम्भीरकर्मणो वा, गम्भीर-
प्रज्ञा वा । ते अङ्गिरसः पुत्राः । ते अग्नेः अधि-
जज्ञिरे,-इति अग्निजन्म ।
'पितरो' व्याख्याताः ।
तेषाम् एषा भवति ॥५[१७]॥
अर्थ :-“‘विरूपासः’” इस ऋचाका नाभानेदिष्ट ऋषि
है अनुष्टुप् छन्द और पाष्ठिक षष्ठ (छठे) अहन् में विनि-
योग है ।
'विरूपास:' ( विरूपाः = नानारूपाः ) अनेक रूप वाले
( इत् ) 'ऋषयः' कभी निष्फल न होने वाले ब्रह्म ( वेद ) के
देखने वाले ( न केवल देखने वाले ही अपितु ) 'गम्भीरवेपसः'
( गम्भीरकर्मणो वा ) अथवा गम्भीर कर्म वाले ( गम्भीर-
प्रज्ञा वा ) अथवा गम्भीर बुद्धि वाले 'ते' वे ' अङ्गिरसः '
अङ्गिरा के 'सूनवः' (पुत्राः) पुत्र 'ते' वे 'अग्नेः' अग्नि के रूप
को प्राप्त हुए अङ्गिरा से 'परिजज्ञिरे' ( अधिजज्ञिरे ) उत्पन्न
हुए । वे नानारूप वाले और गम्भीर कर्म वाले मेरा यह इष्ट
करें । यह इनका अग्नि-जन्म है ।
'पितरः' (१२) (पितृ) व्याख्या किये जा चुके हैं [ ४, ३, ५ ]
उनकी यह ऋचा है-॥५(१७)॥