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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1181

हिन्दी निरुक्त ( ४१८ ) ११ अ० २पा० ७ खं०
मन की गति होती है कि-‘यह हमारा है’ ( क्योंकि-ऐसी
श्रुति है-‘‘ स्वयं विलीनं पितॄणाम् ’’ अर्थात्- अपने
आप पिंघलने वाला या शरीर में रमजाने वाला ( घृत )
पितरों का होता है । ) और ‘अथर्वाणः’ अथर्वा, और ‘भृगव ’
भृगु, जो ये-सोम के साधन करने वाले हैं-हमारी कल्याण
मति में रहते हैं, ‘वयम्’ हम भी ‘तेषाम्’ उन ‘यज्ञियानाम्’
यज्ञके सम्पादन करने वालो’ की ‘सुमतौ’ (कल्याणयां मतौ)
कल्याण मति में ‘स्याम’ हों । ‘अपिच’ और भी उनके ‘भद्रे’
( भन्दनीये भाजनवति वा कल्याणे ) स्तुति करने योग्य या
भक्तों को वाञ्छित अर्थों से संतुष्ट कराने वाले ‘सौमनसे’
( कल्याणे मनसि ) शुभ मन में ‘स्याम’ हो ।
‘‘ये-ऋभु, अङ्गिरस्, भृगु और अथर्वा मध्यम
लोक के देव समूह हैं।’’ ऐसा निरुक्त के आचार्य
मानते हैं- देवता पदों के मध्य में इनका पाठ होने से इनका
एक २ ( स्वतन्त्र २ ) देवगण है, ऐसा नैरुक्त मानते हैं।
‘‘ये सब पितर हैं’’ ऐसा आख्यान है-मन्त्रों में
देवताधर्म-से-देवताओं के प्रकार से पितरों की भी स्तुति
आती है,-अग्नि आदि देवताओं से विलक्षण ऐसे भी देवता
मन्त्रों में देखने चाहिए-ऋभु, सनत्कुमार आदि पितरों के
रूप में ये देवता ही हैं, ऐसा आख्यान (इतिहास) के विद्वान्
मानते हैं। [ ऐसा विचार इस लिये है कि-इन में ऋभु,
अङ्गिरस् और भृगु आदि नाम ऋषियों में भी प्रसिद्ध हैं
और मन्त्रों में देवता के स्थान में भी आते हैं। )
और भी ऋषियों की स्तुतिएं हैं- यह दूसरा कारण है