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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त ( ३६० ) ११ अ० १ पा० ५ खं०
वा “वायुः सोमस्य रक्षिता”, वायुम्-अस्य रक्षि-
तारम्-आह साहचर्याद् रसाहरणाद्वा । 'समानां'
संवत्सराणां “मास आकृतिः” सोमो रूपविशेषः
ओषधिः, चन्द्रमा वा ।
‘चन्द्रमाः’ चायन् द्रमति । चन्द्रो माता, चान्द्रं
मानम्, अस्य-इति वा ।
‘चन्द्रः’ चन्दतेः कान्तिकर्मणः ।
‘चन्दम्’ इत्यपि अस्य भवति । चारु द्रमति ।
चिरं द्रमति । चमेर्वा पूर्वम् ।
‘चारु’ रुचेर्विपरीतस्य ।
तस्य एषा भवति—॥५॥
अर्थ :-“यत्त्वा देव ! प्रपिबन्ति तत आप्या-
यसे पुनः०” हे देव ! सोम ! जो तुझे तीनों मुख्य २ सबनों
में ऋत्विज् और यजमान पान करते हैं-पीना आरम्भ करते
हैं, तब फिर तू बढ़ता है । ( यह व्याख्या नाराशंसों के
अभिप्राय से है-इस में सोम को मनुष्य पीते हैं और वह
बढ़ता है, इस लिये मनुष्यों के संबन्ध से यह व्याख्या है । )
अथवा ये पूर्वपक्ष [ शुक्लपक्ष ] और अपरपक्ष (कृष्णपक्ष) हैं-
हे देव ! सोम ! ( चन्द्र ! ) जब अपरपक्ष या कृष्णपक्ष में तुझे
रश्मिएं पान कर जाती हैं, तो फिर तू पूर्वपक्षमें [शुक्लपक्षमें]
कलाओं से बढ़ जाता है । [ यह अधिदैवत पक्ष है । ]
“वायुः सोमस्य रक्षिता” वायु सोमका रक्षा करनेवाला

हिन्दी निरुक्त ( ३६१ ) ११ अ० १ पा० ५ खं०
है। [ इस वाक्य में मन्त्र का द्रष्टा ऋषि वायुको सोमका रक्षक
कहता है। क्योंकि—वायु के साथ ही वह विचरता है, वायुके
विना कभी नहीं रहता । अथवा रस के हरण से वायु सोमका
रक्षक है। क्योंकि—वह सब रसों का शोषण करने वाला है,
वह सोम को सुखा देने में समर्थ होकर भी उसे नहीं सुखाता;
इस से उसका रक्षक है ॥ ] [ यह पाद दोनों पक्षों में समान है ]
“समानां मास आकृतिः” सोम ओषधि अथवा चन्द्रमा
अपने रूप विशेषों से, अपने रूपों के भेदों से समाओं का
(संवत्सरों का) मास रूप होकर करने वाला है। (चन्द्रमा
शुक्लपक्ष में एक २ दिन में एक २ कला से बढता हुआ पन्द-
रह दिन में पूर्ण कलावान् होजाता है और कृष्णपक्ष में एक २
कला से घटता हुआ पन्दरह दिन में सब कला शून्य होजाता
है, इस प्रकार दो पक्षों के द्वारा एक मास और बारह मासों
से एक संवत्सर को बना देता है। उसी प्रकार सोम ओषधि
के भी पन्दरह (१५) पत्ते होते हैं, और चन्द्रमा की कलाओं
के साथ २ एक २ दिन में एक २ पत्ता उगता है और उसी
क्रम से पन्दरह दिन में पन्दरह पत्ते होजाते हैं, तथा कृष्णपक्ष
में एक२ पत्ता घटकर पन्दरह दिन में सोम पत्ररहित होजाता
है और चन्द्रमा के समान ही दो पक्षों के द्वारा मासको और
बारह मासों के द्वारा संवत्सर को बना देता है इस रीति के
अनुसार दोनों ही (ओषधि और चन्द्रमा) संवत्सर रूप काल के
निर्माता हैं। ]
' चन्द्रमाः ' क्यों ? ' चायन्द्रमति ' देखता हुआ चलता
है- सब प्राणियों के ऊपर स्थित हुआ हुआ देखता हुआ
जाता है। 'चायन्' से पूर्व भाग और 'द्रमति' से उत्तर भाग

हिन्दी निरुक्त ( ३९२ ) ११ अ० १पा० ६खं०
है । अथवा 'चन्द्रो माता' चन्द्र जो माता = सबका निर्माता,
सो 'चन्द्रमा' है । यहां 'चन्द्र' से पूर्व भाग और 'माता' से
दूसरा भाग है । अथवा 'चान्द्रं मानम् अस्य' इसका चान्द्रमान
है, इससे चन्द्रमा है । वही पूर्व और वही उत्तर पद है ।
पहिले में कर्मधारय और इसमें बहुव्रीहिसमासका भेद है ।
'चन्द्र' किस धातुसे है ? कान्ति अर्थ में 'चन्द'(स्वा०प०)
धातु से ।
'चन्दन' यह शब्द भी इसी धातु का है । अथवा 'चारु
द्रमति' सुन्दर द्र्मण ( गमन ) करता है, इससे चन्दन है ।
अथवा 'चिरं द्रमति' चिर काल तक द्रमण करता है, अथवा
'भक्ष्यमानोद्रमति' देवताओं से भक्षण किया जाता हुआ द्रमण
करता है, इससे 'चन्दन' है । इस पक्ष में 'चम' (भ्वा० प०)
धातु से पूर्व पद और उसी 'द्रम' धातु से उत्तर पद है ।
'चारु' कैसे ? 'रुचि' शब्द को उलटा देने से है ।
“तस्य” उस (चन्द्रमा) की यह ऋचा है ॥५॥
( खं० ६ )
निरु०- “नवो नवो भवति जायमानोऽन्हां
केतुरुषसामेत्यग्रम् । भागं देवेभ्यो विदधात्या-
यन् प्रचन्द्रमा स्तिरते दीर्घमायुः ॥” [ ऋ० सं०
६, ३, २४, ४ ] ॥
“नवो नवो भवति जायमानः”इति पूर्वपक्षादिम्-
अभिप्रेत्य । “अन्हां केतुरुषसामेत्यग्रम्” इति
अपरपक्षान्तम्- अभिप्रेत्य । 'आदित्यदैवतो

हिन्दी निरुक्त ( ३६३ ) ११अ० १पा० ६खं०
द्वितीयः पादः, इत्येके। “भागं देवेभ्यो विदधात्या-
यन्”- इति अर्द्धमासेज्याम्-अभिप्रेत्य । प्रवर्द्धयते
चन्द्रमा दीर्घमायुः ॥
‘मृत्युः’ मारयति- इति सतः “मतं ़यावति
इति वा शतबलाक्षो मौद्गल्यः ।
तस्य एषा भवति ॥६॥
अर्थः-“ नवोनवो भवति०” इस ऋचा का सूर्या
( सूर्य पत्नी ) ऋषि है द्व्यक्ष चान्द्रमस चरुमें और राजयक्ष्म-
गृहीतेष्टि में विनियोग है ।
“नवो नवो भवति जायमानः” (चन्द्रमा उत्प-
न्न होता हुआ नया नया होता है' यह पाद् पूर्वपक्ष (शुक्ल-
पक्ष ) के आरम्भ के अभिप्राय से है। क्योंकि— शुक्लपक्ष के
आदि में सदा ही प्रतिमास सूर्य के अस्त होने के पीछे
पश्चिम दिशा में अपनी वृद्धि को आरम्भ करता हुआ उदय
होता हुआ नया नया होता है ।
“अन्हां केतुः-उषसाम्-एति अग्रम्” 'दिनोंका
केतु = लक्षण या करने वाला चन्द्रमा उषाओं के आगे आता
है, यह द्वितीय पाद् अपरपक्ष या कृष्णपक्ष के अन्त (समाप्ति)
के अभिप्राय से है। क्योंकि- कृष्णपक्ष के अन्त में क्षीण
हुआ चन्द्रमा जो अपनी कलाओं के घटाव बढ़ाव से
अथवा गतियों के भेद से प्रतिपदा आदि तिथियों
को बता देता है, उषा के प्रकाश के समीप में अर्थात्
सूर्य के उदय से पहिले पूर्व दिशामें दिखाई देता है। कोई

हिन्दी निरुक्त ( ३६४ ) ११ अ० १ पा० ६ खं०
आचार्य कहते हैं कि—यह दूसरा पाद आदित्य देवता का है
“ भागं देवेभ्यो विदधाति आयन् ” आता हुआ
चन्द्रमा देवताओं के लिए उनके भागको देता है । यह तीसरा
पाद आधे मास के यज्ञके अभिप्राय से है । क्योंकि—पूर्वोक्त
रीतिके अनुसार क्रमसे पश्चिम और पूर्व दिशामें आता हुआ
शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष को जुदा २ करदेता है तथा दर्शपौर्ण-
मास यज्ञों के द्वारा देवताओं को उनका भाग देता है या
देने का हेतु होता है । “ प्र चन्द्रमास्तिरते दीर्घमायुः ”
सो ऐसा चन्द्रमा यज्ञकरने वालों को लम्बी आयु ( उमर )
देता है । [ हम भी हविः से उसका यजन करते हैं, इस कारण
हमारे लिये भी ऐसा करे, यह हम चाहते हैं । ] ॥
'मृत्यु' ( ४ ) किस धातुसे है ? “ मारयति” 'मारता
है' कर्त्ता अर्थमें 'मृङ् ' प्राणत्यागे [ तु०आ० णिच् ] धातुसे
है । क्योंकि-मध्यम लोक का प्राण वायु ही मृत्यु है, वही
निकलता हुआ अन्य प्राणों को भी शरीर से अलग कर देता
है । अथवा “मृत ( मरेहुए या जिसकी आयु पूरी
होचुकी हो ) को यह अपने अलग होने से इस
लोक से प्रच्युत करदेता या लोकान्तर में चला
देता है । ” ऐसा शतबलाक्ष मुद्गल का पुत्र मानता है ।
“तस्य० ”उस मृत्यु की यह ऋचा है-॥ ६ ॥
व्याख्या ।
शतबलाक्ष के मत का अभिप्राय,— वे समझते हैं कि-

हिन्दी निरुक्त ( ३६५ ) ११ अ० १ पा० ६ खं०
इस ऋचा से पहिले “पूर्वापरं चरतो मायैतैतो”
( ऋ० सं० ८, ३, २३, ३ ) अर्थात्—'ये दोनो [ सूर्य और
चन्द्रमा ) माया से पूर्व और पश्चिम विचरते हैं' यह ऋचा है
जो मित्रावरुण देवताओं के एक हविः में विनियोग की गई
है। इसी की अपेक्षा से यह ऋचा भी सूर्य चन्द्रमा दोनों
देवताओं की है। क्योंकि—इस में भी ,, अन्हां केतुः”
दिनों का करने वाला यह विशेष लिङ्ग है इस पक्ष में केवल
दूसरा पाद् सूर्य की स्तुति और शेष तीन पाद् चन्द्रमा की
स्तुति हैं। जैसे— ( जो चन्द्रमा उत्पन्न होता हुआ नया २
होता है, जो देवताओं को भाग देता है, और जो दीर्घ आयु
को देता है, सो हमारे लिये यह करे। और जो सूर्य अपने
उदय अस्त के द्वारा दिनों को करने वाला है, तथा उषाओं
के आगे चलता है, वह हमारे लिये ऐसा करे।' ( यह हम
चाहते हैं ) ॥
चन्द्रमा मध्यमस्थान है। यद्यपि पौराणिक आचार्य
चन्द्रमा को सूर्य से भी हजारों लाखों योजन ऊंचा कहते हैं
तथापि “सभी देवता द्युस्थान हैं और उनका विशेष २
कर्मों के संयोग से स्थान का भेद हो जाता है” इस नियम
के अनुसार मध्यमस्थान के वृष्टि, वृत्र का वध और बलकृति ये
विशेष कर्म हैं, और वे इन्दु के “वधैरजेत दुर्मतिम्”
( नि० अ० १० पा० ४ खं० मन्त्र ) में देखे जाते हैं, इन्दु
और चन्द्रमा एक ही देवता प्रसिद्ध है, तथा इन्द्रके सूक्तों में
बहुतायत से चन्द्रमा आता है, इस कारण से चन्द्रमा मध्य
स्थान है द्युस्थान होने पर भी कर्म संयोग से मध्यमस्थान हो

हिन्दी निरुक्त ( ३६६ ) ११ अ० १ पा० ८ खंड
आता है । इस के अतिरिक्त यह भी है कि-चन्द्रमा औषधि
सोम के रूप में यज्ञ में आता है, और वह सोम इन्द्र मध्यम
देव का अन्न है, अन्न अन्नके खाने वाले का आत्मा ही होता
होता है, इस से भक्ष्य भक्षक के अभेद के द्वारा भी चन्द्रमा
मध्यम होता है । इस प्रकार चन्द्रमा के मध्यम होने में कोई
दोष नहीं ॥
“नवो न॑वो भवति” इस मन्त्र में प्रतिमास नये
उगने वाले चन्द्रमा में दीर्घ आयु देने का गुण वर्णन किया
है, इसी मन्त्र के मूलपर लोग अब भी नए चन्द्रमा का दर्शन
अपनी मङ्गल कामना से करते हैं ॥ ६ ॥
( खं० ७ )
निरु०-“परं मृत्यो अनुपरेहि पन्थां यस्ते स्व
इतरो देवयानात् । चक्षुष्मते शृण्वते ते ब्रवीमि
मानः प्रजां रीरिषो मोत वीरान् ॥” (ऋ०सं०७,६
२६, १ । य०वा०सं० ३५, ७ । आ०गृ० ४,६)
परं मृत्यो ध्रुवं मृत्यो ध्रुवं परेहि मृत्यो कथितं
तेन मृत्यो मृतं च्यावयते भवति मृत्यो मदेर्वा ।
मुदेर्वा ।
तेषामेषा भवति ॥७॥
( खं० ८ )
निरु०- “त्वेषमित्था समरणं शिमीवत्तोरिन्द्रा-
विष्णू सुतपा वा मुरुष्यति या मर्त्याय प्रति

धीयमानमित् कृशानोरस्तु रक्षनासुरुरुष्यथः ॥”
(ऋ० सं० २, २, २५, २, ) इति सा निगद-
व्याख्याता ॥
‘विश्वानरो' व्याख्यातः ।
तस्य-एषा भवति ॥८॥
अर्थ :-“परं मृत्यो०” इत्यस्याः संकुसुको नाम ऋषिः
आज्य होमे पुत्रकामके कर्मणि स्थालीपाकविधाने षडाहुतिः ।
‘मृत्यो !' हे मृत्यु देव (त्वम्) तू ‘परम्' अन्य ‘पन्थाम्'
(पन्थानम्) मार्ग को ‘अनुपरेहि' दूर जा । कौन से मार्ग को
‘यः’ जो ‘ते’ तेरा ‘स्वः’ निजका है। वह कौन ? 'देवयानात्'
देवमार्ग से ‘इतरः’ । भिन्न । [ क्योंकि—हम देवयान में स्थित
हैं, इस से तुझ से धमकाने योग्य नहीं हैं, तेरा पितृयान है,
उसी को तू जा । ] ‘ते' तुझ ‘चक्षुष्मते' नेत्र वाले के लिये
‘शृण्वते’ सुनने वाले के लिये ‘ब्रवीमि' कहता हूं कि –‘मा’
मत ‘नः' हमारी ‘प्रजाम्' प्रजा ( पुत्र पौत्र आदि ) को 'रीरि-
षः' मार ‘उत’ और ‘मा’ मत ‘वीरान्' हमारे आश्रित पुरुषों
को ( मार ) अर्थात् अन्धे को दिखाना और बहरे को सुनाना
दोनों व्यर्थ होते हैं, तुझ में दोनों दोष नहीं, इससे जो
हमारी देवयान में स्थिति है उसे तू आंखों से देखता है और
कानों से सुनता है, अतः हमारी प्रार्थना के निष्फल होने की
तुझसे कभी संभावना नहीं है । हमारे पुत्र पौत्र आदिसे सदा
तू दूर ही रहेगा । अथवा देवयान में चलने वाले क्रम से मुक्त
होजाते हैं और अन्य मार्ग वाले संसार ही में घूमते रहते हैं,

हिन्दी निरुक्त ( ३९८ ) ११अ० १पा० ८ खं०
इस कारण देवयान में चलने वालों को मृत्यु का भय नहीं
होता, वह दूसरों को ही होता है ।
‘परं मृत्यो०’ इत्यादि भाष्य की पंक्ति लेखक भ्रम आदि
से असम्बद्ध होगई है । भगवद्दुर्गाचार्य की टीका में इसकी
व्याख्या नहीं है । मन्त्र के शब्द जो इस भाष्य में मिले हुये
हैं, उनकी टीका की जाचुकी है । अतः इसकी यथाक्रम
व्याख्या नहीं की जा सकती ।
‘तेषामेषा भवति’ यह अवतरणिका अपने से आगे आने
वाली ऋचा से सम्बन्ध नहीं करती । कारण, यह अवतर-
णिका बहु देवताओं की ऋचा को आवाहन करती है, और
जो इसके साम्हने ऋचा आती है, वह इन्द्राविष्णु दो देव-
ताओं की है । अतः यह भी पाठ किसी अनभिज्ञ लेखक के
द्वारा यहां असंबद्ध ही प्रक्षिप्त हुआ है । यहां से कुछही आगे
चलकर ८वें शब्द से “मरुतः” आदि आठ गण देवता आते
हैं, उनमें ५ देवताओं के अवतरण सर्वथा ऐसे ही हैं । उनके
सम्पर्क से यह दोष हुआ प्रतीत होता है ।
“त्वेष मित्था समरणम्०” इस ऋचा के उपन्यास का
यहां पर गम्भीर या दुरधिगम कारण प्रतीत होता है । क्यों
कि—प्रथम तो जिन इन्द्राविष्णु देवताओं की यह ऋचा है,
उनका देवता पदों में पाठ ही नहीं है । दूसरे कोई अवान्तर
प्रसंग भी नहीं और न इसका आगे पीछे कहीं प्रयोजन ही
है । इसके अतिरिक्त “त्वेष गित्था०” यह अध्याय के
अन्त में खण्डसूत्र में प्रतीक भी दिया है । इस लिये यह ऋचा
कब से और क्यों यहां प्रविष्ट हुई इसका निर्णय हम नहीं कर

हिन्दी निरुक्त ( ३६६ ) ११ अ० १ पा० ८ ख०
सकते। हां यह ऋचा ऋक्संहिता में है और सायणाचार्य का
इस पर व्याख्यान है। इस लिये इसकी व्याख्या हम भी
कर देते हैं।
"त्वेषं मिथ्या०" यह ऋचा सोमातिरेक में तृतीय सवन
में वैकल्पिक याज्या है , जैसा कि-सूत्र में कहा है--
"त्वेषं मिथ्या समरणं शिमीवतोरिति वा
याज्येति" ।
"त्वेषमिथ्या०" हे इन्द्राविष्णू ! इन्द्र विष्णु देवताओ !
'शिमीवतोः' वाञ्छित फल के देने वालो' 'वाम्' (युवयोः) तुम
दोनोंके 'इत्था' (इत्थम्) इस प्रकारके 'त्वेषम्' (प्रदीप्तम्) प्रज्व-
लित जगमगाते हुये 'समरणम्' यज्ञ देशमें शुभागमनको 'सुमपाः'
होम से बचे हुये सोम को पीये हुये यजमान 'उरुष्यति' (रक्षति)
रक्षा करता है- याग से पूजता है = संस्था करता है। तुम
में बड़ाई या गुण क्या है ? 'या' (यौ ) जो [इन्द्राविष्णू !
तुम दोनों इन्द्र और विष्णु 'सत्याय' हविः के देने वाले यज-
मान मनुष्य के लिये 'प्रतिधीयमानम्-इत्' (प्रतिघातव्यम्) देने
योग्य 'असनाम्' अन्न आदिको 'अस्तुः' शत्रुओं के हटाने वाले
'कृशानेः, [अग्नेः] अग्नि से 'उरुष्यथः' प्रवृत्ति कराते
हो। अर्थात्- अग्नि मे होम किये हुये हविः को स्वीकार
करके उसी के द्वारा अभिमत फलको देते हो ।(सा०भा०).
यह यहां पर बड़े आश्चर्य की बात है कि- एक ही
स्थान में मूल में तीन विलक्षण २ विभ्रम होगये हैं ॥
'विश्वानर' (५) शब्द की व्याख्या (अ०७ पा०६, खं० १.)
की जाचुकी है ॥

हिन्दी निरुक्त ( ४०० ) ११ अ० १पा० ९खं०
“तस्य०” उस (विश्वानर की यह ऋचा है ॥८॥
( खं० ९ )
निरु०- “प्र वो महे मन्दमानायान्धसोऽर्चा
विश्वानराय विश्वाभुवे । इन्द्रस्य यस्य सुमहं
सहो महि श्रवो नृम्णञ्च रोदसी सपर्थतः ॥”
[ऋ० सं० ८, १, ९,१] ॥(य० वा० सं० ३३,३५]॥
प्रार्चत यूयं स्तुति महते 'अन्धसः' अन्नस्य दात्रे
'मन्दमानाय' मोदमानाय स्तूयमानाय शब्दाय-
मानाय- इति वा विश्वानराय सर्व विभूताय
इन्द्रस्य यस्य प्रीतौ सुमहद् बलं महच्च श्रवणीयं
यशोनृम्णं च बलं नृनतं द्यावापृथिव्यौ वः
परिचरत- इति कम्- अन्यं मध्यमाद्- एवम्
अवक्ष्यत् ।
तस्य एषा अपरा भवति ॥९॥
अर्थः-“प्रवोमहे०” इस ऋचा का वैकुण्ठ ऋषि है।
जगती छन्द और महाव्रत में विनियोग है ॥
(हे स्तोतारः !) हे स्तुति करने वालो '(यूयम्) तुम 'महे'
(महते) बड़े 'मन्दमानाय' (मोदमानाय) हर्ष करते हुये (स्तू-
यमानाय) अथवा स्तुति किये जाते हुये ( शब्दायमानाय
इति वा) अथवा शब्द (गर्जना) करते हुये 'अन्धसः' (अन्नस्य)
(दात्रे) अन्न के देने वाले 'विश्वाभुवे' (सर्व विभूताय) सब

हिन्दी निरुक्त ( ४०१ ) ११अ० १पा० ६ खं०
विभूक्तियों से युक्त 'विश्वानराय' विश्वानर देव के लिये
(स्तुतिम्) स्तुति को 'प्र-अर्च' (प्रार्चत) उच्चारण करो या
दूसरों की कीहुई स्तुति को सराहो । 'यस्य' जिस 'इन्द्रस्य'
ईश्वर (विश्वानर) का 'सुमहम्' (सुमहत्) सुन्दर बड़ा 'सहः'
(बलम्) बलको 'महि-च' (महच्च) और बड़े 'श्रवः' (श्रवणीयं
यशः) श्रवण करने योग्य यश को 'नृम्णं-च' और बल को
(नॄन् नतम्) जो मनुष्यों के प्रति विशेष रूप से झुका हुआ है
'वः' और तुम्हारी इस स्तुति को 'रोदसी' (द्यावापृथिव्यौ)
द्यावा पृथिवी 'सपर्य्यन्तः' (परिचरन्तः) अनुमोदन करते हैं या
सराहते हैं ॥ इस प्रकार किस मध्यम से अन्य को ( मन्त्र का
द्रष्टा ऋषि) कहता ।
“तस्य एषा” (उस विश्वानर)की यह और ऋचाहै॥६॥
( खं० १० )
निरु०-“उदु ज्योतिरमृतं विश्वजन्यं विश्वा-
नरः सविता देवो अश्रेत् ॥”(ऋ०सं० ५,५,२३,१]
उदशिश्रिय ज्ज्योति रमृतं सर्वजन्यं विश्वानरःसविता
देवः- इति ॥
‘धाता’ सर्वस्य विधाता ॥
तस्य एषा भवति—॥१०॥
अर्थः-“उदुज्योतिः०” इस ऋचा का वसिष्ठ ऋषिहै।
प्रातरनुवाक में विनियोग है ।
सविता सब लोको को कर्म में प्रेरणा करनेवाले 'विश्वा-

हिन्दी निरुक्त ( ४०२ ) ११ अ० १पा० ११खं०
नरः' 'देवः' विश्वानर देव ने 'विश्वजन्यम्' ( सर्वजन्यम् )
सब जनों के लिये हित 'अमृतम्' अमर सूर्यनाम 'ज्योतिः'
ज्योति को 'उद्-अश्रेत्' ( उदशिश्रियत् ) ऊपर को उठाया है
क्योंकि—सब चलने वाले पदार्थों की गति वायु से ही होती
है, इस कारण सूर्य का भी ऊपर को उठाना या चलाना
उसी का कार्य हो सकता है । इस प्रकार 'विश्वानर' ज्योति
को उठाता है । इस कथन से 'विश्वानर' मध्यम होता है ।
इसी अभिप्राय को लेकर कहा है—“कमन्यं मध्यमादेव-
मवक्ष्यत्” मध्यम के अतिरिक्त और किस को ऐसा कहा
जाता ।
इस ऋचाका आधा पिछला भाग उषा देवता का है,
इससे भाष्यकार ने उसे यहां छोड़ दिया है ।
'धाता' ( ६ ) क्यों ? 'सर्वस्य विधाता' सब का करने
वाला है । क्योंकि—सब की सृष्टि जलसे ही होती है, इससे
यह देवता मध्यम है ।
“तस्य०” उस धाता की यह ऋचा है ॥१०॥
( खं० ११ )
निरु०-“धाता ददातु दाशुषे प्राचीमूर्जीवातुम-
क्षिताम् । वयं देवस्य धीमहि सुमतिं सत्यधर्मणः”
( अ०सं० ७, १७, २ )
धाता ददातु दत्तवते प्रवृद्धां जीविकाम्-अनुप-
क्षीणां, वयं देवस्य धीमहि सुमतिं कल्याणीं मतिं
सत्यधर्मणः ।

हिन्दी निरुक्त ( ४०३ ) ११ अ० १ पा० १२ खं०
'विधाता' धात्रा व्याख्यातः ।
तस्य एष निपातो भवति बहुदेवतायाम्
ऋचि ॥ ११ ॥
अर्थ :- "धाता ददातु०" इस ऋचाका वामदेव ऋषि
है। देविकाओं में धाता के हविः में विनियोग है ।
'धाता' धाता देव 'दाशुषे' जिसने अपने अर्थ हविः दी
है, उसके लिये 'प्राचीम्' (प्रवृद्धाम् ) बढी हुई 'अक्षितम्'
(अनुपक्षीणाम् ) नहीं घटने वाली 'जीवातुम्' (जीविकाम् )
जीविका को 'ददातु' (ददाति) देता है। 'वयम्' हम (तस्य)
उस 'सत्यधर्म्मणः' सत्य धर्म वाले 'देवस्य' देव की 'सुमतिम्'
(कल्याणीं मतिम् ) शुभ मति (बुद्धि ) को 'धीमहि' ध्यान
करते हैं ।
'विधातृ' (६) शब्द की 'धातृ' शब्द से व्याख्या होगई ।
“तस्य” उस 'विधाता' का यह बहुत देवताओं की
ऋचा में निपात है-॥११॥
( खं० १२ )
निरु०- "सोमस्य राज्ञो वरुणस्य धर्मणि बृह-
स्पतेरनुमत्या उ शर्मणि । तवाह्मद्य मघवन्नुप-
ऽस्तुतौ धातर्विधातः कलशान् अभक्षयम् ॥"
[ ऋ० सं० ८, ८, २५, ३ ]
इति-एताभि र्देवताभिः-अभिप्रसूतः सोमकल-
शान् अभक्षयम्-इति ।

हिन्दी निरुक्त ( ४०४ ) ११ अ० १पा० १२खं०
'कलशः' कस्मात् । कला अस्मिन् शेरते मात्राः ।
'कलि'श्च 'कला'श्च किरतेः विकीर्णमात्राः ।१२।
इति एकादशाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥११,१॥
अर्थ ः—"सोमस्य राज्ञः०" इस ऋचा का विश्वा-
मित्र ऋषि है ।
“सोमस्य राज्ञः धर्मणि (कर्मणि) सोम राजा के
कर्म में प्रवृत्त होता हुआ, “वरुणस्य, बृहस्पतेः, अनु-
मत्याः उ (च) शरणे (आश्रये)” वरुण, बृहस्पति और
अनुमति के आश्रय में वर्त्तमान “ हे मघवन् ! तव, हे
धातः ! विधातः ! युवयोश्च उपस्तुतौ (वर्त्तमानः)
अहम् कलशान् अभक्षयम्” हे मघवन् ! इन्द्र ! तेरी
और हे धातुदेव ! और हे विधातृदेव ! तुम दोनों की उप-
स्तुति में वर्त्तमान रहकर मैंने ( तुम्हारी सबकी प्रेरणासे प्रेरित
होकर ) सोम के कलश पान किये हैं ।
'कलश' क्यों ? 'कलाः अस्मिन् शेरते' इस में सोमकी कुछ
कला या मात्राएं सोम निकाल लेने पर भी बनी रहती हैं ।
'कल' शब्दसे पूर्व भाग और शयन अर्थमें 'शीङ्' (अदा०आ०)
धातु से उत्तर भाग है ।
'कलि' और 'कला' दोनों शब्द विक्षेप अर्थ में 'कॄ'
[तु०प०] धातु से हैं । क्योंकि—'कलि' या कलह में परस्पर
में वचनों का विक्षेप होता है, और कला (मात्रा) भी किसी
समुदाय से विक्षिप्त (फेंकी हुई) जैसी होती है ।
इति हिन्दीनिरुक्ते एकादशाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥११, १॥

हिन्दी निरुक्त ( ४०५ ) ११ अ० २ पा० १ खं०
द्वितीयः पादः ॥
( खं० १ )
निघण्टुः-मरुतः ॥ ८ ॥ रुद्राः ॥ ९ ॥
ऋभवः ॥ १०॥ अङ्गिरसः ॥११॥ पितरः
॥ १२॥ अथर्वाणः ॥१३॥ भृगवः ॥१४॥
आप्रयः ॥ १५ ॥
निरुक्तम्- अथातो मध्यस्थाना देवगणाः ।
तेषां मरुतः प्रथमागामिनो भवन्ति ।
‘मरुतो’ मितराविणो वा मितरोचिनो वा ।
महद् द्रवन्ति-इति वा ।
तेषाम्-एषा भवति ॥ १ ( १३ ) ॥
अर्थः- अब यहां से मध्यस्थान के देवगण हैं-दशम
अध्याय और ग्यारहवें अध्याय के प्रथम पाद् में मध्यस्थान
के 'वायुः' आदि ३२ और 'श्येनः' आदि ७ देवता कहेगए
वे सब एक २ देवता हैं, उन सब में एक वचन आता है।
जिससे कि-एक २ देवता कहे गए, इससे अब मध्यस्थान के
देवगण = देवताओं के समूहों के नाम-जिनमें सदा बहु-
वचन रहता है, कहे जाते हैं। ये सब एक २ नाम से बहुत २
देवता बाले जाते हैं- इनमें एक २ नाम से देवताओं की
अवान्तर जातिए बताई जाती हैं। इन्हीं की सूचना के लिये
'अथ' शब्द से यह अवान्तर अधिकार सूचित किया है।

हिन्दी निरुक्त ( ४०६ ) ११ अ० २ पा० १ खं०
'तेषाम्०" उन देवगणों में मरुत् पहिले आते हैं। [क्यों-
कि-वृष्टि कर्म में पहिला कार्य ये ही करते हैं।]
'मरुत्' (८) क्यों हैं ? वे मित रवण करते हैं-मन्द २
मिला हुआ शब्द करते हैं। किसी के मत में अमित रवण
करते हैं [भैष्यके पाठ में 'अकार की सन्धि भी निकल
सकती है, इसी पर यह दूसरा मत अवलम्बित है]। अथवा
मित रोचते हैं, थोड़ा२ प्रकाशते हैं। किसी के मतमें अमित
(बहुत) रोचते हैं इससे 'मरुत्' हैं। अथवा महत् द्रवण करते
हैं-बड़ी दौड़ करते हैं इस से 'मरुत्' हैं।
"तेषाम्०" उन मरुतों की यह ऋचा है ॥१ (१३) ॥
व्याख्या।
मरुतः। इस पद में 'मरुत्' शब्द से प्रथमा विभक्ति का
बहुवचन संयुक्त है। इससे बहुत मरुत् देवताओं की प्रतीति
होती है। जब वायु देवता ही भेद से देखा जाता है, तब वही
मरुत् नाम वाला तथा बहुवचन के योग्य हो जाता है। ये
कोई दूसरे देवता नहीं हैं। इसी से इन आठ गण देवताओं
में इनके प्रथम आने का कारण वही है, जो वायु का है।
अर्थात्- इनके प्राथम्य के जानने के लिये वायु देवता का
व्याख्यान पढना चाहिये। विशेष यही है कि-जब कोई कर्म
बहुत रूपों का ही साध्य होता है, तब वह मध्यम देव वायु
ही बहुधा (बहुरूप) हो जाता है। बहुवचन युक्त मरुत् नाम
वाले जो ४६ वायु के रूप हैं, उन में सात (७) सात (७) के
७ गण (समूह हैं', और उनके शुक्रज्योतिः, चित्रज्योतिः,-
इत्यादि पृथक् २ नाम भी हैं। इन सब का कारण भी कर्म
और बुद्धि का भेद ही है। ये सप्त गण मारुत गणों के श्रौत

कर्म में जहां सप्त कपाल पुरोडाश होते हैं, तथा पुराणों में
इसी प्रकार से प्रसिद्ध हैं। दिति ने अपने पुत्र वृत्रासुरके वध
का बदला लेने के लिये पुंसवन व्रत धारण करके मारीच
कश्यप से इन्द्र का वध करने वाला एक गर्भ धारण किया था
इन्द्र ने समय पाकर उस गर्भ के ७ टुकड़े किये और उन में
एक १ के फिर सात २ टुकड़े किये। दिति के तप के प्रभाव
से वे मरे नहीं, किन्तु ४६ मरुत् देवता होगये। (श्री० भा०
स्कं० ६ अ० १८)
नैरुक्तों के मतमें तो ये सभी मध्यम लोक के आठों गण
(८-१५) मरुत् [वायु] ही हैं। जैसा कि-वार्त्तिक में
कहा है-
“मध्यमा वाक् स्त्रियः सर्वाः पुमान् सर्वश्च मध्यमः।
गणाश्च सर्वे मरुतो गणभेदाः पृथक्कृतेः ॥”
अर्थात्-अदिति (१६) आदि मध्यम लोक की २८ स्त्रियें
मध्यमा वाक् देवता है। मध्यम लोक के वायु आदि, पुरुष
देवता मध्यम वायु या इन्द्र देवता है। और मध्यम लोक के
सब मरुतः (८) आदि आठ गण देवता मरुत् ही हैं। इन के
गण भेद भी कर्म के भेद से कल्पित हैं।
( खं० २ )
निरु०-“ आविधुन्मद्भिर्मरुतः स्वकैरथेभिर्याति
ऋष्टिमद्भिरिश्वपर्णैः। आवार्विष्ठया न इषा वयो न
पप्तता सुमायाः ॥ ” ( ऋ० सं० १, ६, १४, १ ) ॥
“ विधुन्मद्भि र्मरुतः स्वकैः” स्वञ्चनैः-इति वा,
स्वर्चनैः-इति वा, स्वर्चिर्भिः-इति वा, रथैः आयात

हिन्दी निरुक्त ( ४०८ ) ११अ० २पा० ३ खं०
ऋष्टिमद्भिः अश्वपर्णैः अश्वपतनैः वर्षिष्ठेन च नः
अन्नेन वयः इव आपतत 'सुमायाः' कल्याणकर्मा-
णो वा, कल्याणप्रज्ञा वा ।
'रुद्रा' व्याख्याताः ।
तेषामे-एषा भवति- ॥ २ [ १४ ] ॥
अर्थ.-“आविद्युन्मद्भिः०” इस ऋचा का गोतमऋषि
है । आस्तार पंक्ति छन्द है ।
'मरुतः' हे मरुत् देवो! (यूयम्) तुम सब 'विद्युन्मद्भिः'नि-
राली चमक वाले (बिजली वाले ) 'स्वर्कैः' ( स्वञ्चनैः ) सुन्दर
गमन वाले ( स्वर्चनैः इति वा ) अथवा सुन्दर पूजन वाले
[पूजे जाने वाले](स्वर्चिभि इतिवा)अथवा सुन्दर किरणोंवाले
'ऋष्टिमद्भिः ' आयुधों वाले या अकाल के नाश करने वाले
'अश्वपर्णैः' अश्व (घोड़े) वाहनों वाले या वज्र के गिराने
वाले 'रथेभिः' रथों से या मेघों से 'आयात' आओ । 'सुमायाः'
(कल्याणकर्माणो वा ) हे सुन्दर कर्मों वाले ! (कल्याणप्रज्ञा
वा) या सुन्दर प्रज्ञा (बुद्धि)वाले ! मरुतों!'वर्षिष्ठया' (वर्षिष्ठेन)
बड़े श्रेष्ठ 'इषा' अन्नेन) अन्नके सहित 'वयः न' पक्षियों के
समान 'आपतत' [आपतत] आओ ।
'रुद्र' (९) व्याख्यान किये जाचुके [अ०१०पा०१खं०५ ] ।
“तेषाम्०” उन रुद्रों की यह ऋचा है ॥२(१४)॥
( सं० ३ )
निरु०-“आरुद्रास इन्द्रवन्तः सजोषसो हिरण्य-

हिन्दी निरुक्त (४०६) ११ अ० २पा० ३ ख०
रथाः सुविताय गन्तन । इयं वो अस्मत् प्रति
हर्यते मतिस्तृष्णजे न दिव उत्सा उदन्धवे ॥ ”
(ऋ०सं०५, ३, २१, १) ॥
आगच्छत रुद्रा इन्द्रेण सहजोषणः सुविताय
कर्मणे इयं वो अस्मदपि प्रति कामर्थते मति-
तृष्णजे इव दिव उत्सा उदन्यवे इति ।
'तृष्णक्' तृष्यतेः।
'उदन्युः' उदन्यतेः ॥
'ऋभवः' उरु भान्ति-इति वा । ऋतेन भान्ति-
इति वा । ऋतेन भवन्ति- इति वा ।
तेषाम्- एषा भवति ॥३ (१५)॥
अर्थः-“आरुद्रासः०” यह ऋचा श्यावाश्व ऋषि की
है । जगती छन्द और आग्निमारुत में शस्त्र है ।
'रुद्रासः' (रुद्राः!) हे रुद्र देवो! (यूयम्)तुम“ इन्द्रव-
न्तः-सजोषसः” (इन्द्रेण सह जोषणाः) इन्द्र के साथप्रीति
युक्तहोते हुये या इन्द्र नाम ऐश्वर्यसे युक्त होते हुए 'हिरण्य-
रथाः' सोने के रथ वाले या जल के हरण के अर्थ रंहण (सर-
कने) वाले 'सुविताय' (कर्मणे) सुन्दर सगुण कर्म के लिये
वा शास्त्र के अनुसार किए जाते हुए कर्म की प्राप्ति के लिए
'आगन्तन' (-आगच्छत) आओ । 'इयम्'यह 'अस्मत्' आप
हमारी भी 'मतिः'मति(बुद्धि)'वः'(युष्मान्)तुम्हारे पास'प्रति-