निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३९८ ) ११अ० १पा० ८ खं०
इस कारण देवयान में चलने वालों को मृत्यु का भय नहीं
होता, वह दूसरों को ही होता है ।
‘परं मृत्यो०’ इत्यादि भाष्य की पंक्ति लेखक भ्रम आदि
से असम्बद्ध होगई है । भगवद्दुर्गाचार्य की टीका में इसकी
व्याख्या नहीं है । मन्त्र के शब्द जो इस भाष्य में मिले हुये
हैं, उनकी टीका की जाचुकी है । अतः इसकी यथाक्रम
व्याख्या नहीं की जा सकती ।
‘तेषामेषा भवति’ यह अवतरणिका अपने से आगे आने
वाली ऋचा से सम्बन्ध नहीं करती । कारण, यह अवतर-
णिका बहु देवताओं की ऋचा को आवाहन करती है, और
जो इसके साम्हने ऋचा आती है, वह इन्द्राविष्णु दो देव-
ताओं की है । अतः यह भी पाठ किसी अनभिज्ञ लेखक के
द्वारा यहां असंबद्ध ही प्रक्षिप्त हुआ है । यहां से कुछही आगे
चलकर ८वें शब्द से “मरुतः” आदि आठ गण देवता आते
हैं, उनमें ५ देवताओं के अवतरण सर्वथा ऐसे ही हैं । उनके
सम्पर्क से यह दोष हुआ प्रतीत होता है ।
“त्वेष मित्था समरणम्०” इस ऋचा के उपन्यास का
यहां पर गम्भीर या दुरधिगम कारण प्रतीत होता है । क्यों
कि—प्रथम तो जिन इन्द्राविष्णु देवताओं की यह ऋचा है,
उनका देवता पदों में पाठ ही नहीं है । दूसरे कोई अवान्तर
प्रसंग भी नहीं और न इसका आगे पीछे कहीं प्रयोजन ही
है । इसके अतिरिक्त “त्वेष गित्था०” यह अध्याय के
अन्त में खण्डसूत्र में प्रतीक भी दिया है । इस लिये यह ऋचा
कब से और क्यों यहां प्रविष्ट हुई इसका निर्णय हम नहीं कर