निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४०५ ) ११ अ० २ पा० १ खं०
द्वितीयः पादः ॥
( खं० १ )
निघण्टुः-मरुतः ॥ ८ ॥ रुद्राः ॥ ९ ॥
ऋभवः ॥ १०॥ अङ्गिरसः ॥११॥ पितरः
॥ १२॥ अथर्वाणः ॥१३॥ भृगवः ॥१४॥
आप्रयः ॥ १५ ॥
निरुक्तम्- अथातो मध्यस्थाना देवगणाः ।
तेषां मरुतः प्रथमागामिनो भवन्ति ।
‘मरुतो’ मितराविणो वा मितरोचिनो वा ।
महद् द्रवन्ति-इति वा ।
तेषाम्-एषा भवति ॥ १ ( १३ ) ॥
अर्थः- अब यहां से मध्यस्थान के देवगण हैं-दशम
अध्याय और ग्यारहवें अध्याय के प्रथम पाद् में मध्यस्थान
के 'वायुः' आदि ३२ और 'श्येनः' आदि ७ देवता कहेगए
वे सब एक २ देवता हैं, उन सब में एक वचन आता है।
जिससे कि-एक २ देवता कहे गए, इससे अब मध्यस्थान के
देवगण = देवताओं के समूहों के नाम-जिनमें सदा बहु-
वचन रहता है, कहे जाते हैं। ये सब एक २ नाम से बहुत २
देवता बाले जाते हैं- इनमें एक २ नाम से देवताओं की
अवान्तर जातिए बताई जाती हैं। इन्हीं की सूचना के लिये
'अथ' शब्द से यह अवान्तर अधिकार सूचित किया है।