निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधीयमानमित् कृशानोरस्तु रक्षनासुरुरुष्यथः ॥”
(ऋ० सं० २, २, २५, २, ) इति सा निगद-
व्याख्याता ॥
‘विश्वानरो' व्याख्यातः ।
तस्य-एषा भवति ॥८॥
अर्थ :-“परं मृत्यो०” इत्यस्याः संकुसुको नाम ऋषिः
आज्य होमे पुत्रकामके कर्मणि स्थालीपाकविधाने षडाहुतिः ।
‘मृत्यो !' हे मृत्यु देव (त्वम्) तू ‘परम्' अन्य ‘पन्थाम्'
(पन्थानम्) मार्ग को ‘अनुपरेहि' दूर जा । कौन से मार्ग को
‘यः’ जो ‘ते’ तेरा ‘स्वः’ निजका है। वह कौन ? 'देवयानात्'
देवमार्ग से ‘इतरः’ । भिन्न । [ क्योंकि—हम देवयान में स्थित
हैं, इस से तुझ से धमकाने योग्य नहीं हैं, तेरा पितृयान है,
उसी को तू जा । ] ‘ते' तुझ ‘चक्षुष्मते' नेत्र वाले के लिये
‘शृण्वते’ सुनने वाले के लिये ‘ब्रवीमि' कहता हूं कि –‘मा’
मत ‘नः' हमारी ‘प्रजाम्' प्रजा ( पुत्र पौत्र आदि ) को 'रीरि-
षः' मार ‘उत’ और ‘मा’ मत ‘वीरान्' हमारे आश्रित पुरुषों
को ( मार ) अर्थात् अन्धे को दिखाना और बहरे को सुनाना
दोनों व्यर्थ होते हैं, तुझ में दोनों दोष नहीं, इससे जो
हमारी देवयान में स्थिति है उसे तू आंखों से देखता है और
कानों से सुनता है, अतः हमारी प्रार्थना के निष्फल होने की
तुझसे कभी संभावना नहीं है । हमारे पुत्र पौत्र आदिसे सदा
तू दूर ही रहेगा । अथवा देवयान में चलने वाले क्रम से मुक्त
होजाते हैं और अन्य मार्ग वाले संसार ही में घूमते रहते हैं,