निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 1166, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४०३ ) ११ अ० १ पा० १२ खं०
'विधाता' धात्रा व्याख्यातः ।
तस्य एष निपातो भवति बहुदेवतायाम्
ऋचि ॥ ११ ॥
अर्थ :- "धाता ददातु०" इस ऋचाका वामदेव ऋषि
है। देविकाओं में धाता के हविः में विनियोग है ।
'धाता' धाता देव 'दाशुषे' जिसने अपने अर्थ हविः दी
है, उसके लिये 'प्राचीम्' (प्रवृद्धाम् ) बढी हुई 'अक्षितम्'
(अनुपक्षीणाम् ) नहीं घटने वाली 'जीवातुम्' (जीविकाम् )
जीविका को 'ददातु' (ददाति) देता है। 'वयम्' हम (तस्य)
उस 'सत्यधर्म्मणः' सत्य धर्म वाले 'देवस्य' देव की 'सुमतिम्'
(कल्याणीं मतिम् ) शुभ मति (बुद्धि ) को 'धीमहि' ध्यान
करते हैं ।
'विधातृ' (६) शब्द की 'धातृ' शब्द से व्याख्या होगई ।
“तस्य” उस 'विधाता' का यह बहुत देवताओं की
ऋचा में निपात है-॥११॥
( खं० १२ )
निरु०- "सोमस्य राज्ञो वरुणस्य धर्मणि बृह-
स्पतेरनुमत्या उ शर्मणि । तवाह्मद्य मघवन्नुप-
ऽस्तुतौ धातर्विधातः कलशान् अभक्षयम् ॥"
[ ऋ० सं० ८, ८, २५, ३ ]
इति-एताभि र्देवताभिः-अभिप्रसूतः सोमकल-
शान् अभक्षयम्-इति ।