निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 1155, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३९२ ) ११ अ० १पा० ६खं०
है । अथवा 'चन्द्रो माता' चन्द्र जो माता = सबका निर्माता,
सो 'चन्द्रमा' है । यहां 'चन्द्र' से पूर्व भाग और 'माता' से
दूसरा भाग है । अथवा 'चान्द्रं मानम् अस्य' इसका चान्द्रमान
है, इससे चन्द्रमा है । वही पूर्व और वही उत्तर पद है ।
पहिले में कर्मधारय और इसमें बहुव्रीहिसमासका भेद है ।
'चन्द्र' किस धातुसे है ? कान्ति अर्थ में 'चन्द'(स्वा०प०)
धातु से ।
'चन्दन' यह शब्द भी इसी धातु का है । अथवा 'चारु
द्रमति' सुन्दर द्र्मण ( गमन ) करता है, इससे चन्दन है ।
अथवा 'चिरं द्रमति' चिर काल तक द्रमण करता है, अथवा
'भक्ष्यमानोद्रमति' देवताओं से भक्षण किया जाता हुआ द्रमण
करता है, इससे 'चन्दन' है । इस पक्ष में 'चम' (भ्वा० प०)
धातु से पूर्व पद और उसी 'द्रम' धातु से उत्तर पद है ।
'चारु' कैसे ? 'रुचि' शब्द को उलटा देने से है ।
“तस्य” उस (चन्द्रमा) की यह ऋचा है ॥५॥
( खं० ६ )
निरु०- “नवो नवो भवति जायमानोऽन्हां
केतुरुषसामेत्यग्रम् । भागं देवेभ्यो विदधात्या-
यन् प्रचन्द्रमा स्तिरते दीर्घमायुः ॥” [ ऋ० सं०
६, ३, २४, ४ ] ॥
“नवो नवो भवति जायमानः”इति पूर्वपक्षादिम्-
अभिप्रेत्य । “अन्हां केतुरुषसामेत्यग्रम्” इति
अपरपक्षान्तम्- अभिप्रेत्य । 'आदित्यदैवतो