निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४०४ ) ११ अ० १पा० १२खं०
'कलशः' कस्मात् । कला अस्मिन् शेरते मात्राः ।
'कलि'श्च 'कला'श्च किरतेः विकीर्णमात्राः ।१२।
इति एकादशाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥११,१॥
अर्थ ः—"सोमस्य राज्ञः०" इस ऋचा का विश्वा-
मित्र ऋषि है ।
“सोमस्य राज्ञः धर्मणि (कर्मणि) सोम राजा के
कर्म में प्रवृत्त होता हुआ, “वरुणस्य, बृहस्पतेः, अनु-
मत्याः उ (च) शरणे (आश्रये)” वरुण, बृहस्पति और
अनुमति के आश्रय में वर्त्तमान “ हे मघवन् ! तव, हे
धातः ! विधातः ! युवयोश्च उपस्तुतौ (वर्त्तमानः)
अहम् कलशान् अभक्षयम्” हे मघवन् ! इन्द्र ! तेरी
और हे धातुदेव ! और हे विधातृदेव ! तुम दोनों की उप-
स्तुति में वर्त्तमान रहकर मैंने ( तुम्हारी सबकी प्रेरणासे प्रेरित
होकर ) सोम के कलश पान किये हैं ।
'कलश' क्यों ? 'कलाः अस्मिन् शेरते' इस में सोमकी कुछ
कला या मात्राएं सोम निकाल लेने पर भी बनी रहती हैं ।
'कल' शब्दसे पूर्व भाग और शयन अर्थमें 'शीङ्' (अदा०आ०)
धातु से उत्तर भाग है ।
'कलि' और 'कला' दोनों शब्द विक्षेप अर्थ में 'कॄ'
[तु०प०] धातु से हैं । क्योंकि—'कलि' या कलह में परस्पर
में वचनों का विक्षेप होता है, और कला (मात्रा) भी किसी
समुदाय से विक्षिप्त (फेंकी हुई) जैसी होती है ।
इति हिन्दीनिरुक्ते एकादशाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥११, १॥