निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३६४ ) ११ अ० १ पा० ६ खं०
आचार्य कहते हैं कि—यह दूसरा पाद आदित्य देवता का है
“ भागं देवेभ्यो विदधाति आयन् ” आता हुआ
चन्द्रमा देवताओं के लिए उनके भागको देता है । यह तीसरा
पाद आधे मास के यज्ञके अभिप्राय से है । क्योंकि—पूर्वोक्त
रीतिके अनुसार क्रमसे पश्चिम और पूर्व दिशामें आता हुआ
शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष को जुदा २ करदेता है तथा दर्शपौर्ण-
मास यज्ञों के द्वारा देवताओं को उनका भाग देता है या
देने का हेतु होता है । “ प्र चन्द्रमास्तिरते दीर्घमायुः ”
सो ऐसा चन्द्रमा यज्ञकरने वालों को लम्बी आयु ( उमर )
देता है । [ हम भी हविः से उसका यजन करते हैं, इस कारण
हमारे लिये भी ऐसा करे, यह हम चाहते हैं । ] ॥
'मृत्यु' ( ४ ) किस धातुसे है ? “ मारयति” 'मारता
है' कर्त्ता अर्थमें 'मृङ् ' प्राणत्यागे [ तु०आ० णिच् ] धातुसे
है । क्योंकि-मध्यम लोक का प्राण वायु ही मृत्यु है, वही
निकलता हुआ अन्य प्राणों को भी शरीर से अलग कर देता
है । अथवा “मृत ( मरेहुए या जिसकी आयु पूरी
होचुकी हो ) को यह अपने अलग होने से इस
लोक से प्रच्युत करदेता या लोकान्तर में चला
देता है । ” ऐसा शतबलाक्ष मुद्गल का पुत्र मानता है ।
“तस्य० ”उस मृत्यु की यह ऋचा है-॥ ६ ॥
व्याख्या ।
शतबलाक्ष के मत का अभिप्राय,— वे समझते हैं कि-