निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४०१ ) ११अ० १पा० ६ खं०
विभूक्तियों से युक्त 'विश्वानराय' विश्वानर देव के लिये
(स्तुतिम्) स्तुति को 'प्र-अर्च' (प्रार्चत) उच्चारण करो या
दूसरों की कीहुई स्तुति को सराहो । 'यस्य' जिस 'इन्द्रस्य'
ईश्वर (विश्वानर) का 'सुमहम्' (सुमहत्) सुन्दर बड़ा 'सहः'
(बलम्) बलको 'महि-च' (महच्च) और बड़े 'श्रवः' (श्रवणीयं
यशः) श्रवण करने योग्य यश को 'नृम्णं-च' और बल को
(नॄन् नतम्) जो मनुष्यों के प्रति विशेष रूप से झुका हुआ है
'वः' और तुम्हारी इस स्तुति को 'रोदसी' (द्यावापृथिव्यौ)
द्यावा पृथिवी 'सपर्य्यन्तः' (परिचरन्तः) अनुमोदन करते हैं या
सराहते हैं ॥ इस प्रकार किस मध्यम से अन्य को ( मन्त्र का
द्रष्टा ऋषि) कहता ।
“तस्य एषा” (उस विश्वानर)की यह और ऋचाहै॥६॥
( खं० १० )
निरु०-“उदु ज्योतिरमृतं विश्वजन्यं विश्वा-
नरः सविता देवो अश्रेत् ॥”(ऋ०सं० ५,५,२३,१]
उदशिश्रिय ज्ज्योति रमृतं सर्वजन्यं विश्वानरःसविता
देवः- इति ॥
‘धाता’ सर्वस्य विधाता ॥
तस्य एषा भवति—॥१०॥
अर्थः-“उदुज्योतिः०” इस ऋचा का वसिष्ठ ऋषिहै।
प्रातरनुवाक में विनियोग है ।
सविता सब लोको को कर्म में प्रेरणा करनेवाले 'विश्वा-