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लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

क्षेत्रव्यवहारः ।
( १२६ )
ऊना ७० युता ७४ वर्द्धितो
जातौ कोटिकर्णौ ३५ । ३७॥
चतुष्टयेन वा
कोटिः १६ कर्णः २०
षट्केन वा
कोटिः ९ कर्णः १५
फैलाव-इष्ट कल्पना किया २ इष्टभुज कल्पना किया १२ कल्पित भुजका वर्ग
किया तो हुए १४४ इसमें इष्ट २ का भाग लिया तो लब्धि हुए ७२ इसको दो
स्थानमें लिखकर एक स्थानमें इष्टको घटा दिया तो हुए ७० दूसरे स्थानमें इष्ट
जोड दिया तो हुए ७४ इन दोनों स्थानके अंकों ७० । ७४ को आधा किया तो
३५ । ३७ हुए; यही कोटि कर्णका प्रमाण है; अर्थात् कोटिका
प्रमाण ३५ और कर्णका प्रमाण, सैंतीस ३७ हुआ तब क्षेत्रका
आकार ऐसा हुआ है ॥
जब चार ४ को इष्ट माना तब ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार इष्ट भुज १२
का वर्ग किया तब १४४ हुए; इसमें इष्ट ४ का भाग दिया तब ३६ लब्धि हुए
इनको दो स्थानमें लिखकर एक स्थानमें इष्ट ४ घटाया और
एक स्थानमें जोडा तब ३२ । ४० हुए; इनको आधा किया तब
१६ । २० हुए यही कोटिकर्णका प्रमाण है ॥
जब छ ६ को इष्ट माना तब भुज १२ बारहके वर्ग १४४
में इष्ट ६ का भाग दिया तब २४ लब्धि हुए इनको दो स्थानोंमें
लिखकर एक स्थानमें इष्टको घटा दिया और एक स्थानमें
जोड दिया तब १८ । ३० हुए; इनको आधा किया तब ९ ।
१५ हुए; यही कोटि और कर्णका प्रमाण है ॥

( १२६ ) लीलावती ।
इसी रीतिसे कोटिका प्रमाण कल्पना करके अनेक प्रकारके भुज कर्ण; इष्टके
अनेक प्रकार होनेसे हो सकते हैं ॥
अथेष्टकर्णात्कोटिभुजानयने करणसूत्रं वृत्तम्-
कल्पित कर्णसे कोटि और भुज लानेकी रीति एक श्लोकमें-
इष्टेन निघ्नाद्द्विगुणाच्च कर्णादिष्टस्य कृत्यैकयुजा यदाप्तम् ॥
कोटिर्भवेत्सा पृथगिष्टनिघ्नी तत्कर्णयोरन्तरमत्र बाहुः ॥ ६ ॥
अन्वयः-इष्टेन निघ्नात् द्विगुणात् कर्णात् एकयुजा इष्टस्य कृत्या यत् आप्तं सा कोटिः
भवेत् । सा पृथक् इष्टनिघ्नी तत्कर्णयोः अन्तरम् बाहुः स्यात् ॥ ६ ॥
अर्थः-कर्णको दूना कर इष्टसे गुणा करे जो अंक हों उनमें एक युक्त इष्टके वर्गका
भाग दे; जो लब्धि हो वही कोटि है उसी क्षेत्रमें कोटिको इष्टसे गुणा कर जो अंक
हो उनका और कर्णका अन्तर करनेसे जो शेष रहे वही भुजका प्रमाण होता है ॥६॥
उदाहरणम्-
पञ्चाशीतिमिते कर्णे यौ यावकरणीगतौ ॥
स्यातां कोटिभुजौ तौ तौ वद कोविद् सत्वरम् ॥ ४ ॥
अन्वयः-हे कोविद् ! पञ्चाशीतिमिते कर्णे यौ यौ कोटिभुजौ स्याताम् अकरणी
गतौ तौ तौ सत्वरं वद ॥ ४ ॥
अर्थः- हे गणक ! जिस क्षेत्रमें ८५ पचासी कर्ण हैं; उस क्षेत्रमें कोटि और
भुजकी जो जो संख्या हो वह वह अकरणीगत शीघ्र कहो ॥ ४ ॥
न्यासः-कर्णः८५ अयं द्विगुणः १७० द्विके-
नेष्टेन हतः ३४० इष्ट २ कृत्या ४ सैकया ५
भक्ते जाता कोटिः ६८ इयमिष्टगुणा १३६ कर्णो
८५ निता जातो भुजः ॥ ५१ ॥
चतुष्केनेष्टेन वा । कोटिः४० भुजः ७५

क्षेत्रव्यवहारः। (१२७)
फैलाव-इस क्षेत्रमें कर्ण ८५ पचासी मालूम है; अब भुज और कोटि जाननेके
वास्ते उपरोक्त नियमानुसार कर्ण ८५ को २ दोसे गुणा किया तब १७० हुए;
इनको इष्ट २ दोसे गुणा किया तब ३४० हुए, इनमें इष्ट २ दोके वर्ग ४ में १
मिलाकर ५ का भाग दिया तब ६८ अडसठ लब्धि हुए; यही कोटिका
प्रमाण है. अब कोटि ६८ को इष्ट २ से गुणा किया तब
१३६ हुए इनमें कर्ण ८५ को घटाया तब ५१ शेष रहे; यही
भुजका प्रमाण है. जब चार ४ को इष्ट माना तब कर्ण ८५ को
दोसे गुणा करनेसे वही १७० हुए; इनको इष्ट ४ से
गुणा किया तब ६८० हुए; इनमें एक युक्त इष्ट ४ के
वर्ग १७ का भाग दिया तब ४० लब्धि हुए; यही कोटिका
प्रमाण है फिर इसी कोटि ४० को इष्ट ४ से गुणा किया तो १६० हुए; इसमें
कर्ण ८५ को घटाया तब ७५ शेष रहे; यही भुजका प्रमाण है; इस प्रकार जैसा
इष्ट कल्पना किया जायगा वैसा ही क्षेत्रका आकार बदल जायगा इस कारण इस
भेदसे क्षेत्र भी अनेक प्रकारका होगा॥
पुनः प्रकारान्तरेण तत्करणसूत्रं वृत्तम्--
फिर और रीतिसे कर्णप्रमाण जानकर कोटि और भुज जाननेकी रीति लिखते
हैं एक श्लोकमें-
इष्टवर्गेण सैकेन द्विघ्नः कर्णोऽथवा हतः॥
फलोनः श्रवणः कोटिः फलमिष्टगुणं भुजः॥ ७॥
अन्वयः-द्विघ्नः कर्णः सैकेन इष्टवर्गेण हतः कार्य्यः तदा फलोनः श्रवणः कोटिः
स्यात्। अथवा इष्टगुणम् फलम् भुजः स्यात् ॥ ७॥
अर्थः-कर्णका दो २से गुणा करे तो जो अङ्क हों उनमें एक युक्त इष्टके वर्गका
भाग दे जो लब्धि हो उसको कर्णम घटा दे जो शेष रहे वही कोटिका प्रमाण
होगा और कर्णको दोसे गुणाकर जो अंक हों उनमें एक युक्त इष्टके वर्गका भाग
देनेसे जो लब्धि हो उस इष्टसे गुणा करनेसे जो गुणनफल हो वही भुजका
प्रमाण होता है ॥ ७॥

( १२८ ) लीलावती ।
पूर्वोदाहरणे--इस रीतिको पहले उदाहरणमें ही समझना.
न्यासः--कर्णः ८५ अत्र द्विकेनेष्टेन जातौ किल
कोटिभुजौ ५१ । ६८
चतुष्केण वा । कोटिः ७५ भुजः ४० अत्र४० दोःकोट्यो-
नामभेद एवं केवलं न स्वरूपभेदः ॥
फैलाव-जिस क्षेत्रमें कर्णप्रमाण ८५ है, तहां भुज और कोटि जाननेको
द्वितीय प्रकारसे कर्ण ८५ को द्विगुण किया तो १७० हुए इसमें एक युक्त
इष्ट २ के वर्ग ५ का भाग दिया तब ३४ लब्धि हुए;
इनको कर्ण ८५ में घटाया तब ५१ शेष रहे यही
कोटिका प्रमाण है । उसी लब्धि ३४ को इष्ट २
से गुणा किया तब यह ६८ भुजका प्रमाण मालूम
हुआ तब यह क्षेत्रका आकार हुआ.
जब ४ चारको इष्ट माना तब पूर्वोक्त गणित करनेसे कोटि ७५ प्रमाण हुआ,
और ४० भुज प्रमाण हुआ; अब यहां यह शंका होती है कि, पहली रीतिके
अनुसार ४ चार इष्ट मानकरं कर्ण प्रमाण ८५ होनेपर कोटिप्रमाण ४० और
भुजप्रमाण ७५ होता था और इस रीतिसे कोटिप्रमाण ७५ और भुजप्रमाण ४०
हो गया; अर्थात् पहली रीतिसे अत्यन्त विरुद्ध हो गया; तहां यह उत्तर है कि,
कोटि और भुजमें नाममात्रका ही भेद है; स्वरूपका कुछ भेद है नहीं.
अथेष्टाभ्यां भुजकोटिकर्णानयने करणसूत्रं वृत्तम्-
दो इष्ट मानकर भुज, कोटि, कर्ण तीनों जाननेकी रीति एक श्लोकमें-
इष्टयोगहतिर्द्विघ्नी कोटिर्वर्गान्तरं भुजः ॥
कृतियोगस्तयोरेवं कर्णश्चाकरणीगतः ॥ ८ ॥
अन्वयः-द्विघ्नी इष्टयोः आहतिः कोटिः स्यात् । वर्गान्तरम् भुजः स्यात् । एवं
तयोः कृतियोगः अकरणीगतः कर्णः च स्यात् ॥ ८ ॥

क्षेत्रव्यवहारः। (१२९)
अर्थः-दोनों इष्टोंको परस्पर गुणा करके दो से गुणा करे; तब कोटि प्रमाण
मालूम होता है. दोनों इष्टोंको वर्ग कर अन्तर करनेसे जो शेष रहे; वह भुजका
प्रमाण होता है; दोनों इष्टोंके वर्गका योग करनेसे जो अंक हो अकरणीगत
कर्णका प्रमाण होता है ॥ ८ ॥
उदाहरणम्-
यैर्यैर्ह्यस्रं भवेज्जात्यं कोटिदोःश्रवणैः सखे ॥
त्रीनप्यविदितानेतान क्षिप्रं ब्रूहि विचक्षण ॥ ५ ॥
अन्वयः-हे विचक्षण ! सखे ! यैः यैः कोटिदोःश्रवणैः जात्यं त्र्यस्रम् भवेत्
अविदितान् एतान् त्रीन् अपि क्षिप्रम् ब्रूहि ॥ ५ ॥
अर्थः-हे चतुर मित्र ! जिन जिन कोटि भुज कर्णसे जात्यत्र्यस्र बने, उनको
बिना जाने ही तीनोंका प्रमाण शीघ्र कहो ॥ ५ ॥
न्यासः-अत्रेष्टे २ । १ आभ्यां कोटिभुजकर्णाः
४ । ३ । ५
अथवेष्टे २ । ३ आभ्यां कोटिभुजकर्णाः
१२ । ५ । १३
अथवेष्टे २ । ४ आभ्यां कोटिभुजकर्णाः
१६ । १२ । २० एवमन्यत्रानेकधा.
९

( १३० ) लीलावती ।
फैलाव-दो २ और १ एक इष्ट जानकर कोटि, भुज, कर्ण जाननेके लिये
उपरोक्त रीति के अनुसार दोनों इष्टोंको परस्पर गुणा किया तब
२ दो हुए; इसको दो २ से गुणा किया तब ४ गुणनफल
हुआ, यही कोटिप्रमाण है; फिर दोनों इष्टोंके वर्ग ४ । १ का
अंतर किया तब ३ तीन शेष रहे; यही भुजका प्रमाण है;
तदनन्तर दोनों इष्टोंके वर्ग ४ । १, का योग किया तब ५ पाँच
हुए, यही अकरणीगत कर्णका प्रमाण हुआ.
जब २ । ३ को इष्टमाना तब पूर्वोक्त रीतिसे दोनों इष्टोंकी परस्पर आहति करी;
तब ६ हुए; इनको २ दोसे गुणा किया तब बारह १२ हुए,
यही कोटिका प्रमाण है फिर दोनों इष्टोंके ४ । ९ वर्गका अंतर
किया तब ५ शेष रहे, यही भुजका प्रमाण है; तदनन्तर दोनों
इष्टोंके वर्ग ४ । ९ का योग किया तब १३ हुए; यही कर्णका
प्रमाण है.
जब २ । ४ को इष्ट माना तब पूर्वोक्त रीतिसे दोनों इष्टोंकी पर-
स्पर आहति करी तब ८ हुए; इनकों २ से गुणा किया तब १६
हुए; यही कोटिका प्रमाण है; फिर दोनों इष्टोंके वर्ग ४ । १६ का
अन्तर किया तब १२ शेष बचे; यही भुजका प्रमाण है, तदनन्तर
दोनों इष्टोके वर्ग ४ । १६ का योग किया तब बीस हुए; यही अकरणीगत
कर्णका प्रमाण है, इसी प्रकार जितने इष्ट मानोगे उतने ही अनेक प्रकारके क्षेत्रोंके
आकार होंगे ॥
कर्णकोटियुतौ भुजे च ज्ञाते पृथक्करणसूत्रं वृत्तम्-
कर्ण और कोटिका योग और भुज जानकर कर्ण और कोटिके पृथक् पृथक्
प्रमाण जाननेकी रीति एक श्लोकमें-
वंशाग्रमूलान्तरभूमिवर्गो वंशोद्धतस्तेन पृथग्युतोनौ ॥
वंशौ तदर्द्धे भवतः क्रमेण वंशस्य खण्डे श्रुतिकोटिरूपे॥९॥
अन्वयः-वंशाग्रमूलान्तरभूमिवर्गः वंशोद्धतः कार्य्यः तेन वंशौ पृथग्युतोनौ कार्यौ
तदर्द्धे वंशस्य खण्डे क्रमेण श्रुतिकोटिरूपे भवतः ॥ ९ ॥
अर्थः-बाँसके अग्र भाग और मूल (जड) भागके मध्यकी पृथ्वीका जो प्रमाण
हो उसका वर्ग करनेसे जो अंक हों उनमें बाँसके प्रमाण अर्थात् कर्णकोटिके
योगका भाग देनेसे जो लब्धि हो उसको कर्णकोटिके योगमें अर्थात् बाँसके

क्षेत्रव्यवहारः। (१३१)
प्रमाणमें एक स्थानमें जोडै और एक स्थानमें घटावे फिर उन दोनोंका आधा २
करे तब क्रमसे कर्ण और कोटिका प्रमाण मालूम होता है ॥ ९ ॥
उदाहरणम्-
यदि समभुवि वेणुर्द्वित्रिपाणिप्रमाणो गणक पवन-
वेगादेकदेशे स भग्नः ॥ भुवि नृपमितहस्तेष्वंगलग्नं
तदग्रं कथय कतिषु मूलादेष भग्नः करेषु ॥ ६ ॥
अन्वयः-हे गणक ! हे अङ्ग ! यः द्वित्रिपाणिप्रमाणः वेणुः भुवि निखातः
सः यदि पवनवेगात् भग्नः तर्हि तदग्रम् भुवि नृपमितहस्तेषु लग्नम् तदा कथय
एषः मूलात् कतिषु करेषु भग्नः ॥ ६ ॥
अर्थः-हे प्रिय गणक ! जो बाँस ३२ हाथका पृथ्वीमें गढा है; वह यदि वायुके
वेगसे एक जगह टूटा तो उसका अग्रभाग पृथ्वीमें १६ हाथपर जाके लगा तो
कहो यह बाँस जडसे कितने हाथ ऊपर टूटा ? ॥ ६ ॥
न्यासः [चित्र: ३२, १२, २०, १६] वंशाग्रमूलान्तरभूमिः १६ वंशः ३२
स एव कोटिकर्णयुतिः ३२ । भुजः १६
जाते ऊर्ध्वाधःखण्डे २० । १२ ॥
फैलाव-यहाँ वंशके अग्रभाग और मूलभागके मध्यभूमिका प्रमाण १६ सोलह
ही भुज प्रमाण है और बांसका प्रमाण ३२ ही कोटिकर्णका योग है; अब यहां
कोटिकर्ण अलग २ जाननेके अर्थ उपरोक्त रीतिके अनुसार बांसके अग्रभाग और
मूलके मध्यकी भूमिके प्रमाण अर्थात् भुज १६ का वर्ग किया तब २५६ हुए;
इनमें कर्णकोटिक योग अर्थात् वंशके प्रमाण ३२का भाग दिया तब ८ आठ लब्धि हुए
इनको कर्णकोटिक योग ३२ में एक स्थानमें जोडा और एक स्थानमें घटाया तब
४० । २४ हुए; इनको अलग २ आधार किया तब क्रमसे कर्ण और कोटिका प्रमाण
२० । १२ हुए अर्थात् कर्णका प्रमाण २० और कोटिका प्रमाण १२ हुआ. आशय
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(१३२) लीलावती।
यह है कि, वह बांस जडसे १२ हाथ ऊपर टूटा अर्थात् वंशके
अग्रभागके और मूलभागके मध्यकी भूमिका प्रमाण तो हुआ भुज
और जडसे टूटनेके स्थान तक हुआ कोटिका प्रमाण और टूटनेके
स्थानसे अग्रभाग पर्य्यन्त हुआ कर्णका प्रमाण ॥
बाहुकर्णयोगे दृष्टे कोट्याश्च ज्ञातायां पृथक्करणसूत्रं वृत्तम्-
भुजकर्णका योग और कोटिका प्रमाण जानकर भुज और कर्णका प्रमाण अलग
अलग जाननेकी रीति-
स्तम्भस्य वर्गोऽहिबिलान्तरेण भक्तः फलं व्यालबिला-
न्तरालात् ॥ शोध्यं तदर्द्धप्रमितैः करैः स्याद्विलाग्रतो
व्यालकलापियोगः ॥ १० ॥
अन्वयः-स्तम्भस्य वर्गः अहिबिलान्तरेण भक्तः तदा यत् फलं तत् व्यालबिलान्त-
रालात् शोध्यं तदर्द्धप्रमितैः करैः बिलाग्रतः व्यालकलापियोगः स्यात् ॥ १० ॥
अर्थः-स्तंभके प्रमाणका वर्ग करे, जो अङ्क हों उनमें सर्पके बिलके अन्तरका भाग
दे; तब जो फल हो उससे सर्प और बिलके अन्तरमें घटा दे, जो शेष रहे उसका
आधा कर ले, तब जो अंक रहे उतने ही हाथ बिलसे आगे साँप और मोरका
योग होगा ॥ १० ॥
उदाहरणम्-
अस्ति स्तम्भतले बिलं तदुपरि क्रीडाशिखण्डी स्थितः
स्तम्भे हस्तनवोच्छ्रिते त्रिगुणितस्तम्भप्रमाणान्तरे ॥
दृष्ट्वाऽहिं बिलमाव्रजंतमपतत्तिर्य्यक्स तस्योपरि क्षिप्रं
ब्रूहि तयोर्बिलात्कतिमितैः साम्येन गत्योर्युतिः ॥ ७॥
अन्वयः-स्तम्भतले बिलम् अस्ति तदुपरि क्रीडाशिखंडी स्थितः हस्तनवो-
च्छिते स्तम्भे स्थितः सः त्रिगुणितस्तम्भप्रमाणान्तरे बिलम् आव्रजंतम् अहिम् दृष्ट्वा
तस्य उपरि तिर्य्यक् अपतत् तर्हि तयोः बिलात् कतिमितैः साम्येन गत्योः युतिः
जाता इति क्षिप्रम् ब्रूहि ॥ ७ ॥
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क्षेत्रव्यवहारः। ( १३३ )
अर्थ:-एक स्तम्भ था, उसके नीचे सांपका बिल (भट्टा) था; स्तम्भपर एक
मोर नाच रहा था, जिस स्तम्भपर मोर नाच रहा था वह नौ ९ हाथ ऊंचा था
और उससे सत्ताईस हाथ दूसरे अपने बिलमेंको सांप दौडा हुआ आ रहा था;
उस समय स्तम्भपर बैठे हुए मोरने देखा कि, सांप आ रहा है; सो उसी समय
स्तम्भपरसे उडा और उस सर्पके ऊपरके तिरछा होकर अर्थात् कर्ण गतिसे गिरा;
तो कहो कि बिलसे कितने हाथपर जाके मोर और सर्पका योग हुआ ॥ ७ ॥
न्यासः स्तम्भः ९ अहिबिलान्तरम् २७
जाता बिलयुत्योर्मध्यहस्ताः १२
फैलाव-इस उदाहरणमें ९ हाथ ऊंचा स्तम्भ तो कोटि है और सर्प
बिलका अन्तर २७ सत्ताईस भुजकर्णका योग है; अब भुज और कर्णका
प्रमाण अलग २ जाननेके अर्थ उपरोक्त नियमानुसार स्तम्भ अर्थात् कोटिके
प्रमाण ९ का वर्ग ८१ किया; इसमें सर्प और बिलके
अन्तर अर्थात् कर्ण और भुजके योग २७ सत्ताईसका भाग
दिया तब तीन ३ लब्धि हुए, इसको सर्प और बिलके अन्तर
२७ में घटाया तब २४ चौबीस रहे; इनका आधा किया तब
१२ बारह हुए; यही भुजका प्रमाण है और शेष १५ पन्द्रह कर्णका प्रमाण है,
अर्थात् भुजप्रमाण १२ बारह हाथ बिलसे परे सर्प मोरका योग हुआ ॥
कोटिकर्णान्तरे भुजे च दृष्टे पृथक्करणसूत्रं वृत्तम्-
कोटिकर्णका योग और भुजप्रमाण जानकर कोटि और कर्णका अलग २ प्रमाण
जाननेकी रीति एक श्लोकमें लिखते हैं-
भुजाद्वर्गितात्कोटिकर्णान्तराप्तं द्विधा कोटिकर्णान्तरेणो-
नयुक्तम् ॥ तदर्द्धं क्रमात्कोटिकणौँ भवेतामिदं धीमताऽऽ-
वेद्य सर्वत्र योज्यम् ॥ ११ ॥
अन्वयः-वर्गितात् भुजात् कोटिकर्णान्तराप्तं द्विधा कोटिकर्णान्तरेण ऊनयुक्तं
कार्यम् तदर्द्धं क्रमात् कोटिकर्णौ भवेताम् । धीमता इदम् आवेद्य सर्वत्र योज्यम् ॥११॥
अर्थः-भुजका वर्ग करके कोटिकर्णके अन्तरका भाग दें; जो फल आवे उसे दो
स्थानमें लिखे; एक स्थानमें कोटिकर्णका अन्तर घटा दे और एक स्थानमें जोड दे
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( १३४ ) लीलावती।

फिर दोनोंको आधा कर ले;तब क्रमसे कोटि और कर्ण होते हैं. बुद्धिमान् विचारपूर्वक
इस बातको सब जगह सब प्रकारके उदाहरणोंमें इस रीतिसे काम करे ॥ १२१॥
सखे पद्मतन्मज्जनस्थानमध्यं भुजः कोटिकर्णान्तरं
पद्म दृश्यम् ॥ नलः कोटिरेतन्मितं स्याद्यदम्भो वदैवं
समानीय पानीयमानम् ॥ १२ ॥
अन्वयः-हे सखे ! अत्र पद्मतन्मज्जनस्थानमध्यम् भुजः दृश्यम् पद्म कोटिकर्णा-
न्तरम् नलः कोटिः एवम् एतन्मितं यत् अंभः तत् पानीयमानं समानीय वद १२॥
अर्थः-हे मित्र ! यहाँके उदाहरणमें पद्म और उसके डूबनेके स्थानका मध्य
भुज है और दृश्य कमल कोटिकर्णका अन्तर है; पद्मकी नाल कोटि है; तो
कोटिकी नापका जो जल है उसका प्रमाण कहो; कितना गहरा है ? ॥ १२ ॥
उदाहरणम्-
चक्रक्रौञ्चाकुलितसलिले काऽपि दृष्टं तडागे
तोयादूर्ध्वं कमलकलिकाग्रं वितस्तिप्रमाणम् ॥
मंदंमन्दं चलितमनिलेनाहतं हस्तयुग्मे तस्मि-
न्मग्नं गणक कथय क्षिप्रमम्भःप्रमाणम् ॥ ८ ॥
अन्वयः-चक्रक्रौञ्चाकुलितसलिले क अपि तडागे तोयात् ऊर्ध्व वितस्तिप्रमाणं
कमलकलिकाग्रं दृष्टम् तत् मन्दम् मन्दं चलितं पवनेन आहतं सत् तस्मिन्
हस्तयुग्मे मग्नम् तर्हि हे गणक ! अम्भःप्रमाणं क्षिप्रं कथय ॥ ८ ॥
अर्थः-किसी तालाबमें चकवी चकवा हंस आदि पक्षियोंसे जल शोभित हो
रहा था और उस तालाबमें जलसे ऊपर एक वितस्तिका कमलकी कलिकाका अग्र-
भाग दीख रहा था, इतनेमें ही चली जो मन्द मन्द पवन तिससे उसी क्षण वह कम-
लकी कली दो २ हाथ जलके भीतर जाकर डूब गई तो हे गणितके जाननेवाले !
कहो उस तालाबमें कितना गहरा जल है ? ॥ ८ ॥
न्यासः-
कोटिकर्णान्तरम् १/२
भुजः २ लब्धं जलगाम्भीर्यम् १५/४
इयं कोटिः । इयमेव कलिकामानयुता
जातः कर्णः १७/४

क्षेत्रव्यवहारः। (१३६)
फैलाव-यहाँ भुजप्रमाण २ का वर्ग किया तो ४ हुए, इसमें कोटि-
कर्णान्तर अर्थात कलिकाके प्रमाण १/२ का भाग दिया १/२) ४/१ = २/१ ४/१ = ८/१ तब ८
आठ लब्धि हुए; इनमें कोटि कर्णान्तरको एक स्थानमें घटाया और एक स्थानमें जोडा,
घटाया | जोडा.
८/१ - १/२ = १६/२ - १/२ = १५/२ | ८/१ + १/२ = १६/२ + १/२ = १७/२
तब १५/२ १७/२ क्रमसे हुए; इनको आधा किया तो क्रमसे
१५/४ १७/४ कोटि कर्णका प्रमाण हुआ; यहाँ जलकी गहराईका
प्रश्न था, सो जो कोटिका मान १५/४ आया है वही गहराई है.
कोट्येकदेशेन युते कर्णे भुजे च दृष्टे कोटिकर्णज्ञानाय
करणसूत्रं वृत्तम्-
कोटिके कुछ भुज और कर्ण जानकर कोटिकर्णका रूप जाननेकी
रीति एक श्लोकमें-
द्विनिघ्नतालोच्छ्रितिसंयुतं यत्परोन्तरं तेन विभाजितायाः ॥
तालोच्छ्रितेस्तालसरोऽन्तरघ्न्या उड्डीनमानं खलु लभ्यते तत्॥ १३॥
अन्वयः-यत् द्विनिघ्नतालोच्छ्रितिसंयुतं सरोन्तरं तेन विभाजितायाः तालसरोऽ-
न्तरघ्न्याः तालोच्छ्रितेः यत् तत् खलु उड्डीनमानं लभ्यते ॥ १३ ॥
अर्थः-तालके वृक्षकी उँचाईको दोसे गुणा करे, जो गुणनफल हो उसमें वृक्ष और
तालाबके अन्तरको जोड दे तब जो अङ्क हों उनका वृक्ष और तालाबके अन्तरसे
गुणी हुई वृक्षकी उँचाईमें भाग दे, तब जो फल हो वही कूदनेका प्रमाण होगा;
अर्थात् जो कुछ जाना हुआ कोटिका भाग है उसे भुजसे गुणा करे; जो गुणन
फल हो उसमें जाने हुए द्विगुणित कोटिके एक देश और भुज इनके योगसे भाग
दे, तब जो लब्धि हो, वह कोटिका खण्ड है, जो कि, कर्णके साथ मिला था और
उस खण्डको यदि योगमें घटा दे तब कर्णका प्रमाण मालूम होता है ॥ १३ ॥
उदाहरणम्-
वृक्षाद्धस्तशतोच्छ्रयाच्छतयुगे वापीं कपिः कोऽप्यया-
दुत्तीर्याथ परो द्रुतं श्रुतिपथेनोड्डीय किञ्चिद्द्द्रुमात् ॥

( १३६ ) लीलावती ।
जातैवं समता तयोर्यदि गतावुड्डीनमानं किय-
द्विद्वंश्चेत्सुपरिश्रमोऽस्ति गणिते क्षिप्रं तदाचक्ष्व मे ॥ ९ ॥
अन्वय-कःअपि कपिः हस्तशतोच्छ्रयात् वृक्षात् उत्तीर्य्य शतयुगे वापीम् अयात्
अथ परः द्रुतं द्रुमात् किञ्चित् उड्डीय श्रुतिपथेन अयात् । यदि एवं तयोः गतौ समता
तर्हि हे विद्वन् ! चेत् गणिते सुपरिश्रमः अस्ति तर्हि उड्डीनमानं कियत् तत् मे
क्षिप्रम् आचक्ष्व ॥ ९ ॥
अर्थः-कोई बन्दर सौ १०० हाथ ऊँचे वृक्षसे उतर कर २०० दो सौ हाथ दूरपर
किसी बावडीमें जल पीनेको गया; इसके बाद दूसरा भी जो कि, वृक्षपर बैठा था
उसी समय वृक्षपरसे कूदकर कर्णमार्गसे बावडीको गया; इस प्रकार यदि उन दोनों
बन्दरोंको तुल्य मार्ग चलना पडा; हे विद्वन ! यदि गणितशास्त्रमें चतुर हो और कुछ
परिश्रम किया हो तो मुझको शीघ्र कहो कि, वह दूसरा वानर जो कि कूद कर गया
था कितना ऊपरको उछलके बावडीपर गया ? ॥ ९ ॥
न्यासः-वृक्षवाप्यन्तरम् २०० ।
वृक्षोच्छ्रायः १०० । लब्धमुड्डी-
नमानं ५० कोटिः १५० कर्णः
२५० । भुजः २०० ॥
फैलाव-यहाँ जो सौ १०० हाथ लम्बा वृक्ष है वह तो कोटिका जाना हुआ भाग
है, वृक्ष और बावडीका अन्तर २०० भुज है, दोनों वानरोंको तुल्य ही मार्ग जाना
पडा; इस कर्ण और कोटिके एक
देशका योग ३०० हाथ है; यहाँ उप-
रोक्त नियमानुसार वृक्षकी ऊँचाई अर्थात्
जाने हुए कोटिके एक देश १०० को
दोसे गुणा किया तब २०० हुए. इसमें
भुज अर्थात् वृक्ष और बावडीके अन्तर २०० को जोडा तब ४०० हुए;
इनका जाने हुए कोटिके एक देश १०० को भुज २०० से गुणा किये हुए
२०००० अङ्कोंमें भाग दिया तब ५० लब्धि हुए, यही कोटिके उस भागका
प्रमाण है, जो कि कर्ण मिला हुआ था और इतना ५० ही ऊपरको कूदकर
दूसरा वानर बावडीपर पहुँचा, इसको योगमें घटा देनेसे कर्णप्रमाण २०० मालूम
होता है और कोटिके ज्ञात भाग १०० में मिला देनेसे पूरा कोटिका प्रमाण १५०
मालूम होता है ॥

क्षेत्रव्यवहारः । ( १३७ )
भुजकोट्योर्योगे कर्णे च ज्ञाते पृथक्करणसूत्रं वृत्तम् -
भुज और कोटिका योग तथा कर्ण जानकर भुज और कोटिको अलग अलग
जाननेकी रीति एक श्लोकमें-
कर्णस्य वर्गाद्द्विगुणाद्विशोध्यो दोःकोटियोगः
स्वगुणोऽस्य मूलम् ॥ योगो द्विधा मूलविहीन-
युक्तः स्यातां तदर्द्धे भुजकोटिमाने ॥ १४ ॥
अन्वयः-द्विगुणात् कर्णस्य वर्गात् स्वगुणः दोःकोटियोगः विशोध्यः अस्य
मूलं ग्राह्यम् । योगः द्विधा मूलविहीनयुक्तः कार्य्यः तदर्द्धे भुजकोटिमाने
स्याताम् ॥ १४ ॥
अर्थः-कर्णके वर्गको दोसे गुणा करे तब जो अङ्क हों उनमें भुज और कोटिके
योगका वर्ग घटा दे जो शेष रहे उसका मूल ले; भुजकोटिके योगको दो स्थानोंमें
लिख; एक स्थानमें पहले लिया हुआ मूल घटा दे और एक स्थानमें जोड
दे; फिर दोनों स्थानोंके घटाये हुए और जोडे हुए अङ्कोंको आधा कर ले; तब
भुज और कोटिके प्रमाण होते हैं ॥ १४ ॥
उदाहरणम्-
दशसप्ताधिकः कर्णस्त्र्यधिका विंशतिः सखे ॥
भुजकोटियुतिर्यत्र तत्र ते मे पृथग्वद् ॥ १० ॥
अन्वयः-हे सखे ! यत्र दशसप्ताधिकः कर्णः त्र्यधिका विंशतिः भुजकोटियुतिः
तत्र ते मे पृथक् वद् ॥ १० ॥
अर्थः-हे मित्र ! जहां कर्णका प्रमाण १७ है और भुजकोटिका योग २३
तेईस है; तहां भुज और कोटिका प्रमाण अलग अलग कहो ॥ १० ॥
न्यासः १५ १७
कर्णः १७ दोःकोटियोगः २३ जाते
भुजकोटी ८ । १५ ॥
२३ ८
फैलाव-यहां कर्ण १७ है और भुजकोटियोग २३ है, यहां भुजकोटिका
अलग २ प्रमाण जाननेके अर्थ उपरोक्त नियमानुसार कर्ण १७ का वर्ग किया
२८९ इसको दोसे गुणा किया तब ५७८ हुए; इसमें भुज कोटिके योग

( १३८ ) लीलावती ।
२३ का वर्ग ५२९ घटाया तब ४९ बाकी रहे इन ४९ का मूल लिया तब ७
मिले फिर भुजकोटियोगको दो स्थानोंमें लिखा, एक स्थानमें पहले लिया हुआ
मूल ७ घटाया और एक स्थानमें जोडा तब १६ । ३० हुए;
इनको आधा किया तब क्रमसे भुज और कोटिका प्रमाण
८ । १५ हुआ; अर्थात् भुजका प्रमाण ८ और कोटिका १३____ १५ हुआ ॥ १० ॥
उदाहरणम्-
दोःकोट्योरन्तरं शैलाः कर्णो यत्र त्रयोदश ॥
भुजकोटी पृथक्तत्र वदाऽऽशु गणकोत्तम ॥ ११ ॥
अन्वयः-हे गणकोत्तम ! यत्र शैलाः भुजकोटयोः अन्तरम् । त्रयोदश कर्णः ।
तत्र भुजकोटी पृथक् आशु वद ॥ ११ ॥
अर्थः-हे गणितशास्त्रको अच्छा जाननेवाले ! जहां भुजकोटिका अन्तर ७ सात
ह और कर्ण १३ तेरह है वहां भुज, कोटि अलग अलग शीघ्र कहो ॥ ११ ॥
न्यास कर्णः १३ भुजकोट्योरन्तरम्
७ लब्धे भुजकोटी ५ । १२
फैलाव-कर्ण १३ के वर्ग १६९ को दूना किया तब ३३८ हुए; इनमें
भुजकोटिके अन्तर ७ का वर्ग ४९ घटाया तब २८९ इनका मूल
लिया तब १७ मिले, इसमें अन्तरको एक स्थानमें घटाया और एक
स्थानमें जोडा तब १० । २४ हुए; इनको आधा किया तब क्रमसे
भुजकोटिका प्रमाण ५ । १२ हुए.
लम्बावबाधाज्ञानाय करणसूत्रं वृत्तम्-
लम्ब और अवबाधा जाननेकी रीति एक श्लोकमें-
अन्योन्यमूलाग्रगसूत्रयोगाद्वेण्वोर्वधे योगहृते च लम्बः ॥
वंशौ स्वयोगेन हतावभीष्टभूम्रौ च लम्बोभयतः कुखण्डे ॥ १५ ॥
अन्वयः-अन्योन्यमूलाग्रगसूत्रयोगात् वेण्वोः वधे कृते योगहृते च लम्बः स्यात् ।
वंशौ स्वयोगेन हतौ अभीष्टभूम्रौ च लम्बोभयतः कुखण्डे स्याताम् ॥ १५ ॥

क्षेत्रव्यवहारः। ( १३९ )
अर्थः-दोनों बाँसोंकी उँचाईका परस्पर घात करे; फिर इसी घातमें दोनों
बाँसोंकी उँचाईके योगका भाग दे, जो लब्धि हो वही लम्बका प्रमाण होता है.
दोनों बाँसोंका उँचाईका अलग अलग उन ही बाँसोंकी भूमिसे गुणा करे; जो
गुणनफल हो उसमें उँचाईके योगका भाग लेनेसे जो लब्धि हो वह अपनी अपनी
की अबबाधा मालूम होती है ॥ १५ ॥
उदाहरणम्-
पञ्चदशदशकरोच्छ्रयवेण्वोरज्ञातमध्यभूमिकयोः ॥
इतरेतरमूलाग्रगसूत्रयुतेर्लम्बमानमाचक्ष्व ॥ १२ ॥
अन्वयः-हे गणक ! अज्ञातमध्यभूमिकयोः पञ्चदशदशकरोच्छ्रयवेण्वोः इतरेतर
मूलाग्रगसूत्रयुतेः लम्बमानम् आचक्ष्व ॥ १२ ॥
अर्थः-हे गणितप्रवीण ! एक १५ पन्द्रह हाथ लम्बा और दूसरा १० दश हाथ
लम्बा ये दो बाँस कुछ अन्तरसे पृथिवीमें खड़े किये यह नहीं जानते कि, कितने
अन्तरसे खड़े किये थे; उन दोनों बाँसोंमें सूत बांधा जैसे एकके मूलमें बांधकर
दूसरेके अग्रभागमें बांधा और दूसरेकी जड़में बांधकर पहलेके अग्रभागमें बांधा तौ
कहो कि, जहां दोनों सूतोंका मेल हुआ, वहांसे पृथवीतक यदि लम्ब (रेखा)
डाला जाय तो इस लम्बका क्या प्रमाण होगा ? ॥ १२ ॥
न्यासः- वंशौ १५। १० जातो लम्बः ६ वंशा-
न्तरभूमिः ५ अत्र जाते भूखण्डे
३।२ अथवा भूः १० खण्डे ६।४
वा भूः २० खण्डे १२।८ एवं सर्वत्र
लम्बः स एव यद्यत्र भूमितुल्ये भुजे
वंशः कोटिस्तदा भूखण्डेन किमिति
त्रैराशिकेन सर्वत्र प्रतीतिः ॥
फैलाव-उपरोक्त लम्ब वह है जो कि, दोनों बांसोंके मूलसे अग्रभागपर्यन्त

( १४० ) लीलावती ।
एकका दूसरेमें सूत्र बांधनेसे जहां सूत्रोंका मेल होता
है वहांसे पृथ्वीतक जो अन्तर है उसपर रेखा डाली
जाती है और अवबाधा वह है कि जो लम्बके इधर
उधर दोनों तरफकी पृथ्वी है; उसी लंब और अवबाधाके
जाननेके निमित्त उपरोक्त नियमानुसार दोनों बांसोंके
प्रमाण १५।१० का परस्पर घात किया तब १५० हुए,
इनमें बांसोंके योग २५ का भाग दिया तब ६ लब्धि
हुए यही सूत्रोंके योगसे पृथ्वीतक जो लम्ब डाला है उसका प्रमाण है और उन
बांसोंके बीचमें भूमि पांच ५ मानी तो इसी भूमिको पहले बांस १५ से गुणा
किया तब ७५ हुए, इसमें दोनों बांसोंके योग २५ का भाग लेनेसे ३ लब्धि हुए;
यही बडे बांसके ओरकी अवबाधा है; फिर उसी पांचको दूसरे बांस १० से गुणा
किया तब ५० हुए; इसमें भी दोनों बांसके योग २५ का भाग दिया तब २ लब्धि
हुए; यही दूसरे छोटे बांसकी अवबाधा हुई, जब दश १० को मध्य भूमि कल्पना
किया तब उक्त रीतिके अनुसार बडे बाँसके ओरकी अवबाधा ६ हुई और छोटे बांसके ओर
की अवबाधा ४ हुई इसी प्रकार १५ को मध्यकी भूमि माना तो क्रमसे १२।८ दोनों
अवबाधा हुईं. भूमि चाहे जितनी मानो पर लंब वही ६ मिलेगा, जब यहां भूमि
तुल्य भुज माना और वंशतुल्य कोटि माना तब त्रैराशिकसे ही सर्वत्र प्रतीति हो
सकती है, जैसे कि, ५ भूमिपर बाँस कोटि मिलती है तो अवबाधापर क्या कोटि
मिलेगी ? इस प्रकार दोनों ओरसे वही लम्ब आता है ॥
अथाक्षेत्रलक्षणसूत्रम्-
अब अक्षेत्रका लक्षण लिखते हैं-
धृष्टोद्दिष्टमृजुभुजं क्षेत्रं यत्रैकबाहुतः स्वल्पा ॥
तदितरभुजयुतिरथवा तुल्या ज्ञेयं तदक्षेत्रम् ॥ १६ ॥
अन्वयः-यत्र एकबाहुतः तदितरभुजयुतिः स्वल्पा अथवा तुल्या तत् धृष्टोद्दिष्टम्
ऋजुभुजं क्षेत्रम् अक्षेत्रं ज्ञेयम् ॥ १६ ॥
अर्थः-जिस त्रिभुज अथवा चतुर्भुज क्षेत्रमें एक भुजसे अन्यभुजोंका योग
न्यून हो अथवा तुल्य हो वह ढीठ पुरुषका कहा हुआ क्षेत्र अक्षेत्र है ॥ १६ ॥

क्षेत्रव्यवहारः। ( १४१ )
उदाहरणम्-
चतुरस्रे त्रिषड्द्व्यर्का भुजास्त्र्यस्रे त्रिषण्णवाः ॥
उद्दिष्टा यत्र धृष्टेन तदक्षेत्रं विनिर्दिशेत् ॥ १३ ॥
अन्वयः-यत्र धृष्टेन चतुरस्रे त्रिषड्द्व्यर्काः। तथा त्र्यस्रे त्रिषण्णवाः भुजाः उद्दिष्टाः
तत् अक्षेत्रम् विनिर्दिशेत् ॥ १३ ॥
अर्थ:-जिस चतुरस्र क्षेत्रमें तीन, छ, दो, बारह ३ । ६ । २ । १२ प्रमाणकी
चार भुज हैं और त्र्यस्र (त्रिकोण) में ३ तीन ६ छ ९ नौ प्रमाणकी तीन भुज
हैं यदि कोई ढीठ ऐसा प्रश्न करे तो उसको अक्षेत्र कहना चाहिये ॥ १३ ॥
न्यासः एते अनुपपन्ने क्षेत्रे.
भुजप्रमाणा ऋजुशलाका भुजस्थानेषु विन्यस्या-
नुपपत्तिर्दर्शनीयेति ॥
फैलाव-यह दोनों अक्षेत्र हैं, इनकी अक्षेत्रता जाननेको भुजके प्रमाणकी सूधी
शलाकाएँ भुजके स्थानोंमें रखकर दिखावे, इस कारण रेखाओंसे प्रत्यक्ष कर
दिखाते हैं ॥
चतुर्भज क्षेत्रमें तीन भुज २ । ३ । ६ का योग
११ है और बडा भुज १२ है, इस कारण तीनों
भुजांका योग ११ बडी एक भुज १२ बारहसे
छोटा है, इस कारण अक्षेत्र कहना उचित है,
ऐसे क्षेत्रमें क्षेत्रफल नहीं मिलता क्योंकि क्षेत्रफल भूमि और कोटि तथा लम्बिके
अधीन हैं और ऐस प्रश्नमें सब भुज भूमिमें मिल जाते हैं, इसी कारण त्रिभुज भी
अक्षेत्र है, दोनों क्षेत्रोंका रूप रेखाओंसे दिखाते हैं ॥

( १४२ ) लीलावती ।
चतुर्भुजका स्वरूप. त्रिभुजका स्वरूप.
६ ३ २ ६ ३
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१२ १२ ९
अथवा इन भुजाओंकी तुल्य सींकोंको मिलाके रखनेसे प्रत्यक्ष क्षेत्रका स्वरूप
जान पडता है ॥
आबाधादिज्ञानाय करणसूत्रमार्याद्वयम् ।
आबाधा आदि जाननेकी रीति आर्याके दो श्लोकोंमें-
त्रिभुजे भुजयोर्योगस्तदन्तरगुणो भुवा हृतो लब्ध्या ॥
द्विःस्था भूरूनयुता दलिताबाधे तयोः स्याताम् ॥ १७ ॥
स्वाबाधाभुजकृत्योरन्तरमूलं प्रजायते लम्बः ॥
लम्बगुणं भूम्यर्द्धं स्पष्टं त्रिभुजे फलं भवति १८ ॥
अन्वयः-त्रिभुजे भुजयोः योगः कार्य्यः ततः तदन्तरगुणः कार्य्यः । ततः भुव
हृतः कार्य्यः । लब्ध्या द्विःस्था भूः ऊनयुता कार्य्या सा दलिता तयोः आबाधे
स्याताम् ॥ १७ ॥ स्वाबाधाभुजकृत्योः अन्तरमूलं लम्बः प्रजायते । भूम्यर्द्धं
लम्बगुणं त्रिभुजे स्पष्टम् फलम् भवति ॥ १८ ॥
अर्थः-त्रिभुजक्षेत्रमें दो भुजाओंका योग करे तब जो अङ्क हों उनको उन हीं दोनों
भुजाओंके अन्तरसे गुणा करे; जिन ऊपरकी भुजाओंका योग किया है फिर गुण-
नफलमें भूमि मानी हुई नीचेकी भुजका भाग दे; जो लब्धि हो वह दो स्थानोंमें
रक्खी हुई भूमि मानी हुई भुजामें एक स्थानमें घटा दे और एक स्थानमें जोड
दे; उसको आधा आधा कर ले, तब जो अङ्क मिले, वही दोनों भुजाओंकी आबाधा
है ॥ १७ ॥ अपनी आबाधा और अपनी भुजका वर्ग करे, उन वर्गोंका अन्तर करे,
उस अन्तरका मूल ले, तब जो अङ्क मिले वही लम्बका प्रमाण होता है, भूमिको
आधा कर लम्बसे गुणा कर दे तब त्रिभुजमें स्पष्ट फल होता है ॥ १८ ॥
उदाहरणम्-
क्षेत्रे मही मनुमिता त्रिभुजे भुजौ तु यत्र त्रयोदशतिथि-
प्रमितौ च यस्य ॥ तत्राऽवलम्बकमथो कथयावबाधे
क्षिप्रं तथा च समकोष्ठमिति फलाख्याम् ॥ १४ ॥
अन्वयः-यत्र त्रिभुजे क्षेत्रे मही मनुमिता यस्य भुजौ तु त्रयोदशतिथिप्रमितौ तत्र
अवलम्बकम् अथो अवबाधे तथा च फलाख्याम् समकोष्ठमिति च क्षिप्रं कथय ॥१४॥

क्षेत्रव्यवहारः। ( १४३ )
अर्थः-जिस त्रिभुजक्षेत्रमें १४ प्रमाण भूमि हैं और दोनों भुज १३ और १५
प्रमाण हैं तहां लम्ब और दोनों अवबाधा तथा चतुष्कोणरूप फलका प्रमाण भी
शीघ्र कहो ॥ १४ ॥
न्यासः- भूः १४ भुजौ १३ । १५ लब्धे
आबाधे ५ । ९ । लम्बश्च १२
क्षेत्रफलञ्च ८४ ॥
फैलाव-इस त्रिभुजक्षेत्रमें भूमि १४ दोनों भुज १३ । १५ हैं यहाँ आबाधा जान-
नेको उपरोक्त नियमानुसार ऊपरके दोनों भुजों १३ । १५ का
योग किया तब २८ हुए, इन ही दोनोंको अन्तर २ से गुणा
किया तब ५६ हुए, भूमि मानी हुई भुज १४ का भाग दिया तब
४ लब्धि हुए, इन्हें भूमि १४ में एक स्थानमें घटाया और एक स्थानमें जोडा तब
१० । १८ हुए इनको आधा किया तब क्रमसे आबाधा मिली ५ । ९ अर्थात् पहली
भुजकी आबाधा ५ और दूसरी भुजकी आबाधा ९ मिली, फिर लम्ब जाननेके लिये
अपनी अपनी भुज और आबाधाका वर्ग किया उस वर्गका अन्तर किया उस अन्त-
रका मूल लिया, तब लम्ब हुआ जैसे पहली भुज १३ का वर्ग १६९ हुए और पहली
आबाधा ५ का वर्ग २५ हुआ, इनका अन्तर लिया तब १४४ बचे, इसका मूल
लिया तब १२ मिले यही लम्बका प्रमाण है, इसी प्रकार दूसरी भुज १५ का वर्ग
किया तब २२५ हुए उसीकी आबाधा ९ का वर्गकिया तब ८१ हुए इनका अन्तर
लिया तब १४४ बचे इनका मूल लिया तब वही लम्बका प्रमाण १२ मिला, फिर
क्षेत्रफल जाननेके लिये भूमि १४ के आधे ७ को लम्ब १२ से गुणा किया तब ८४
हुए. यही क्षेत्रफल होगा ॥
ऋणाबाधोदाहरणम्-ऋणआबाधा जाननेका उदाहरण-
दशसप्तदशप्रमौ भुजौ त्रिभुजे यत्र दशप्रमा मही ॥
अबधे वद लम्बकं तथा गणितं गणितिकाऽऽशु तत्र मे ॥ १५ ॥
अन्वयः-यत्र त्रिभुजे दशसप्तदशप्रमौ भुजौ नवप्रमा मही हे गणितिक ! तत्र
अबधे लम्बकं तथा गणितम् मे आशु वद ॥ १५ ॥
अर्थः-जिस त्रिभुजक्षेत्रमें दश और सत्रह प्रमाण तो दोनों भुज हैं और नौ प्रमाण

( १४४ ) लीलावती ।
पृथ्वी है, हे गणितके जाननेवाले ! उस क्षेत्रमें दोनों आबाधा बताओ, लम्ब बताओ
और क्षेत्रफल भी शीघ्र कहो ॥ १५ ॥
न्यासः- भुजौ १० । १७ भूमिः ९ अत्र त्रिभुजे
भुजयोर्योग इत्यादिना लब्धम् २१ अनेन
भूरूना न स्यात् । अस्मादेव भूरपनांताशेषा-
र्द्धमृणगता वा दिग्वैपरीत्येनेत्यर्थः । तथा
जाते आबाधे ६ । १५ अत उभयत्राऽपि
जातो लम्बः ८ फलम् ३६ ।
फैलाव-यहां लम्बभूमिसे बाहर निकल जाता है, इस कारण यह ऋणाबाधा का
उदाहरण कहलाता है. यहां उपरोक्त नियमानुसार दोनों भुजा
१० । १७ का योग किया तब २७ हुए; इसको उन हीं भुजाओंके
अन्तर ७ से गुणा किया तब १८९ हुए. इसमें भूमि ९ का भाग
दिया तब २१ मिलें, इसको भूमि ९ में ऋणबाधा भू जोडा तब
३० हुए; इसका आधा किया तब १५ मिले, यह १७ की आबाधा हुई. अब पहली
भुजकी आबाधा जाननेके अर्थ उसी लब्धि २१ को भूमिमें घटाना चाहिये; परन्तु
घट नहीं सकती, इस कारण दिग्वैपरीत्य कर दिया, अर्थात भूमिमें लब्धि न घटा
कर लब्धि में भूमिको घटाया तब १२ रहे, इसको आधा किया तब ६ हुए,
यही ऋणाबाधा है, इस प्रकार दोनों आबाधा ६।१५ हुई, इन ही आबाधाओंसे लम्ब
जाननेके लिये पहली भुज १० का वर्ग किया तब १०० हुए, इसी भुजकी आबाधा
६ का वर्ग किया तब ३६ हुए, इनका अन्तर किया तब ६४ बचे, इसका वर्ग-
मूल लिया तब पहली आबाधासे लम्ब मिला ८ । इसी प्रकार दूसरी भुज १७ का
वर्ग किया तब २८९ हुए, इसी भुजकी आबाधा १५ का वर्ग किया तब २२५ हुए
इनका अन्तर किया तब ६४ बचे इनका मूल लिया तब वही लम्बप्रमाण ८ मिला,
इस प्रकार दोनों आबाधाओंसे एक ही लम्ब मिला. अब क्षेत्रफल जाननेको भूमिके
आधे ४ १/२ को लम्ब ८ से गुणा किया तब ३६ मिले. यही क्षेत्रफल है ॥
चतुर्भुजे त्रिभुजे चास्पष्टस्पष्टफलानयने करणसूत्रं वृत्तम्-
चतुर्भुजमें अस्पष्ट और त्रिभुजमें स्पष्ट फल जाननेकी रीति एक श्लोकमें-