लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १२८ ) लीलावती ।
पूर्वोदाहरणे--इस रीतिको पहले उदाहरणमें ही समझना.
न्यासः--कर्णः ८५ अत्र द्विकेनेष्टेन जातौ किल
कोटिभुजौ ५१ । ६८
चतुष्केण वा । कोटिः ७५ भुजः ४० अत्र४० दोःकोट्यो-
नामभेद एवं केवलं न स्वरूपभेदः ॥
फैलाव-जिस क्षेत्रमें कर्णप्रमाण ८५ है, तहां भुज और कोटि जाननेको
द्वितीय प्रकारसे कर्ण ८५ को द्विगुण किया तो १७० हुए इसमें एक युक्त
इष्ट २ के वर्ग ५ का भाग दिया तब ३४ लब्धि हुए;
इनको कर्ण ८५ में घटाया तब ५१ शेष रहे यही
कोटिका प्रमाण है । उसी लब्धि ३४ को इष्ट २
से गुणा किया तब यह ६८ भुजका प्रमाण मालूम
हुआ तब यह क्षेत्रका आकार हुआ.
जब ४ चारको इष्ट माना तब पूर्वोक्त गणित करनेसे कोटि ७५ प्रमाण हुआ,
और ४० भुज प्रमाण हुआ; अब यहां यह शंका होती है कि, पहली रीतिके
अनुसार ४ चार इष्ट मानकरं कर्ण प्रमाण ८५ होनेपर कोटिप्रमाण ४० और
भुजप्रमाण ७५ होता था और इस रीतिसे कोटिप्रमाण ७५ और भुजप्रमाण ४०
हो गया; अर्थात् पहली रीतिसे अत्यन्त विरुद्ध हो गया; तहां यह उत्तर है कि,
कोटि और भुजमें नाममात्रका ही भेद है; स्वरूपका कुछ भेद है नहीं.
अथेष्टाभ्यां भुजकोटिकर्णानयने करणसूत्रं वृत्तम्-
दो इष्ट मानकर भुज, कोटि, कर्ण तीनों जाननेकी रीति एक श्लोकमें-
इष्टयोगहतिर्द्विघ्नी कोटिर्वर्गान्तरं भुजः ॥
कृतियोगस्तयोरेवं कर्णश्चाकरणीगतः ॥ ८ ॥
अन्वयः-द्विघ्नी इष्टयोः आहतिः कोटिः स्यात् । वर्गान्तरम् भुजः स्यात् । एवं
तयोः कृतियोगः अकरणीगतः कर्णः च स्यात् ॥ ८ ॥