लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षेत्रव्यवहारः। ( १३३ )
अर्थ:-एक स्तम्भ था, उसके नीचे सांपका बिल (भट्टा) था; स्तम्भपर एक
मोर नाच रहा था, जिस स्तम्भपर मोर नाच रहा था वह नौ ९ हाथ ऊंचा था
और उससे सत्ताईस हाथ दूसरे अपने बिलमेंको सांप दौडा हुआ आ रहा था;
उस समय स्तम्भपर बैठे हुए मोरने देखा कि, सांप आ रहा है; सो उसी समय
स्तम्भपरसे उडा और उस सर्पके ऊपरके तिरछा होकर अर्थात् कर्ण गतिसे गिरा;
तो कहो कि बिलसे कितने हाथपर जाके मोर और सर्पका योग हुआ ॥ ७ ॥
न्यासः स्तम्भः ९ अहिबिलान्तरम् २७
जाता बिलयुत्योर्मध्यहस्ताः १२
फैलाव-इस उदाहरणमें ९ हाथ ऊंचा स्तम्भ तो कोटि है और सर्प
बिलका अन्तर २७ सत्ताईस भुजकर्णका योग है; अब भुज और कर्णका
प्रमाण अलग २ जाननेके अर्थ उपरोक्त नियमानुसार स्तम्भ अर्थात् कोटिके
प्रमाण ९ का वर्ग ८१ किया; इसमें सर्प और बिलके
अन्तर अर्थात् कर्ण और भुजके योग २७ सत्ताईसका भाग
दिया तब तीन ३ लब्धि हुए, इसको सर्प और बिलके अन्तर
२७ में घटाया तब २४ चौबीस रहे; इनका आधा किया तब
१२ बारह हुए; यही भुजका प्रमाण है और शेष १५ पन्द्रह कर्णका प्रमाण है,
अर्थात् भुजप्रमाण १२ बारह हाथ बिलसे परे सर्प मोरका योग हुआ ॥
कोटिकर्णान्तरे भुजे च दृष्टे पृथक्करणसूत्रं वृत्तम्-
कोटिकर्णका योग और भुजप्रमाण जानकर कोटि और कर्णका अलग २ प्रमाण
जाननेकी रीति एक श्लोकमें लिखते हैं-
भुजाद्वर्गितात्कोटिकर्णान्तराप्तं द्विधा कोटिकर्णान्तरेणो-
नयुक्तम् ॥ तदर्द्धं क्रमात्कोटिकणौँ भवेतामिदं धीमताऽऽ-
वेद्य सर्वत्र योज्यम् ॥ ११ ॥
अन्वयः-वर्गितात् भुजात् कोटिकर्णान्तराप्तं द्विधा कोटिकर्णान्तरेण ऊनयुक्तं
कार्यम् तदर्द्धं क्रमात् कोटिकर्णौ भवेताम् । धीमता इदम् आवेद्य सर्वत्र योज्यम् ॥११॥
अर्थः-भुजका वर्ग करके कोटिकर्णके अन्तरका भाग दें; जो फल आवे उसे दो
स्थानमें लिखे; एक स्थानमें कोटिकर्णका अन्तर घटा दे और एक स्थानमें जोड दे
CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri