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सर्वकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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क्षेत्रव्यवहारः ।
( १२६ )
ऊना ७० युता ७४ वर्द्धितो
जातौ कोटिकर्णौ ३५ । ३७॥
चतुष्टयेन वा
कोटिः १६ कर्णः २०
षट्केन वा
कोटिः ९ कर्णः १५
फैलाव-इष्ट कल्पना किया २ इष्टभुज कल्पना किया १२ कल्पित भुजका वर्ग
किया तो हुए १४४ इसमें इष्ट २ का भाग लिया तो लब्धि हुए ७२ इसको दो
स्थानमें लिखकर एक स्थानमें इष्टको घटा दिया तो हुए ७० दूसरे स्थानमें इष्ट
जोड दिया तो हुए ७४ इन दोनों स्थानके अंकों ७० । ७४ को आधा किया तो
३५ । ३७ हुए; यही कोटि कर्णका प्रमाण है; अर्थात् कोटिका
प्रमाण ३५ और कर्णका प्रमाण, सैंतीस ३७ हुआ तब क्षेत्रका
आकार ऐसा हुआ है ॥
जब चार ४ को इष्ट माना तब ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार इष्ट भुज १२
का वर्ग किया तब १४४ हुए; इसमें इष्ट ४ का भाग दिया तब ३६ लब्धि हुए
इनको दो स्थानमें लिखकर एक स्थानमें इष्ट ४ घटाया और
एक स्थानमें जोडा तब ३२ । ४० हुए; इनको आधा किया तब
१६ । २० हुए यही कोटिकर्णका प्रमाण है ॥
जब छ ६ को इष्ट माना तब भुज १२ बारहके वर्ग १४४
में इष्ट ६ का भाग दिया तब २४ लब्धि हुए इनको दो स्थानोंमें
लिखकर एक स्थानमें इष्टको घटा दिया और एक स्थानमें
जोड दिया तब १८ । ३० हुए; इनको आधा किया तब ९ ।
१५ हुए; यही कोटि और कर्णका प्रमाण है ॥