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सर्वकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

पृष्ठ 154, कुल 268 में से

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पृष्ठ 154

( १३८ ) लीलावती ।
२३ का वर्ग ५२९ घटाया तब ४९ बाकी रहे इन ४९ का मूल लिया तब ७
मिले फिर भुजकोटियोगको दो स्थानोंमें लिखा, एक स्थानमें पहले लिया हुआ
मूल ७ घटाया और एक स्थानमें जोडा तब १६ । ३० हुए;
इनको आधा किया तब क्रमसे भुज और कोटिका प्रमाण
८ । १५ हुआ; अर्थात् भुजका प्रमाण ८ और कोटिका १३____ १५ हुआ ॥ १० ॥
उदाहरणम्-
दोःकोट्योरन्तरं शैलाः कर्णो यत्र त्रयोदश ॥
भुजकोटी पृथक्तत्र वदाऽऽशु गणकोत्तम ॥ ११ ॥
अन्वयः-हे गणकोत्तम ! यत्र शैलाः भुजकोटयोः अन्तरम् । त्रयोदश कर्णः ।
तत्र भुजकोटी पृथक् आशु वद ॥ ११ ॥
अर्थः-हे गणितशास्त्रको अच्छा जाननेवाले ! जहां भुजकोटिका अन्तर ७ सात
ह और कर्ण १३ तेरह है वहां भुज, कोटि अलग अलग शीघ्र कहो ॥ ११ ॥
न्यास कर्णः १३ भुजकोट्योरन्तरम्
७ लब्धे भुजकोटी ५ । १२
फैलाव-कर्ण १३ के वर्ग १६९ को दूना किया तब ३३८ हुए; इनमें
भुजकोटिके अन्तर ७ का वर्ग ४९ घटाया तब २८९ इनका मूल
लिया तब १७ मिले, इसमें अन्तरको एक स्थानमें घटाया और एक
स्थानमें जोडा तब १० । २४ हुए; इनको आधा किया तब क्रमसे
भुजकोटिका प्रमाण ५ । १२ हुए.
लम्बावबाधाज्ञानाय करणसूत्रं वृत्तम्-
लम्ब और अवबाधा जाननेकी रीति एक श्लोकमें-
अन्योन्यमूलाग्रगसूत्रयोगाद्वेण्वोर्वधे योगहृते च लम्बः ॥
वंशौ स्वयोगेन हतावभीष्टभूम्रौ च लम्बोभयतः कुखण्डे ॥ १५ ॥
अन्वयः-अन्योन्यमूलाग्रगसूत्रयोगात् वेण्वोः वधे कृते योगहृते च लम्बः स्यात् ।
वंशौ स्वयोगेन हतौ अभीष्टभूम्रौ च लम्बोभयतः कुखण्डे स्याताम् ॥ १५ ॥