लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
पृष्ठ 146, कुल 268 में से
संदर्भ में पढ़ें( १३० ) लीलावती ।
फैलाव-दो २ और १ एक इष्ट जानकर कोटि, भुज, कर्ण जाननेके लिये
उपरोक्त रीति के अनुसार दोनों इष्टोंको परस्पर गुणा किया तब
२ दो हुए; इसको दो २ से गुणा किया तब ४ गुणनफल
हुआ, यही कोटिप्रमाण है; फिर दोनों इष्टोंके वर्ग ४ । १ का
अंतर किया तब ३ तीन शेष रहे; यही भुजका प्रमाण है;
तदनन्तर दोनों इष्टोंके वर्ग ४ । १, का योग किया तब ५ पाँच
हुए, यही अकरणीगत कर्णका प्रमाण हुआ.
जब २ । ३ को इष्टमाना तब पूर्वोक्त रीतिसे दोनों इष्टोंकी परस्पर आहति करी;
तब ६ हुए; इनको २ दोसे गुणा किया तब बारह १२ हुए,
यही कोटिका प्रमाण है फिर दोनों इष्टोंके ४ । ९ वर्गका अंतर
किया तब ५ शेष रहे, यही भुजका प्रमाण है; तदनन्तर दोनों
इष्टोंके वर्ग ४ । ९ का योग किया तब १३ हुए; यही कर्णका
प्रमाण है.
जब २ । ४ को इष्ट माना तब पूर्वोक्त रीतिसे दोनों इष्टोंकी पर-
स्पर आहति करी तब ८ हुए; इनकों २ से गुणा किया तब १६
हुए; यही कोटिका प्रमाण है; फिर दोनों इष्टोंके वर्ग ४ । १६ का
अन्तर किया तब १२ शेष बचे; यही भुजका प्रमाण है, तदनन्तर
दोनों इष्टोके वर्ग ४ । १६ का योग किया तब बीस हुए; यही अकरणीगत
कर्णका प्रमाण है, इसी प्रकार जितने इष्ट मानोगे उतने ही अनेक प्रकारके क्षेत्रोंके
आकार होंगे ॥
कर्णकोटियुतौ भुजे च ज्ञाते पृथक्करणसूत्रं वृत्तम्-
कर्ण और कोटिका योग और भुज जानकर कर्ण और कोटिके पृथक् पृथक्
प्रमाण जाननेकी रीति एक श्लोकमें-
वंशाग्रमूलान्तरभूमिवर्गो वंशोद्धतस्तेन पृथग्युतोनौ ॥
वंशौ तदर्द्धे भवतः क्रमेण वंशस्य खण्डे श्रुतिकोटिरूपे॥९॥
अन्वयः-वंशाग्रमूलान्तरभूमिवर्गः वंशोद्धतः कार्य्यः तेन वंशौ पृथग्युतोनौ कार्यौ
तदर्द्धे वंशस्य खण्डे क्रमेण श्रुतिकोटिरूपे भवतः ॥ ९ ॥
अर्थः-बाँसके अग्र भाग और मूल (जड) भागके मध्यकी पृथ्वीका जो प्रमाण
हो उसका वर्ग करनेसे जो अंक हों उनमें बाँसके प्रमाण अर्थात् कर्णकोटिके
योगका भाग देनेसे जो लब्धि हो उसको कर्णकोटिके योगमें अर्थात् बाँसके