लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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इसी रीतिसे कोटिका प्रमाण कल्पना करके अनेक प्रकारके भुज कर्ण; इष्टके
अनेक प्रकार होनेसे हो सकते हैं ॥
अथेष्टकर्णात्कोटिभुजानयने करणसूत्रं वृत्तम्-
कल्पित कर्णसे कोटि और भुज लानेकी रीति एक श्लोकमें-
इष्टेन निघ्नाद्द्विगुणाच्च कर्णादिष्टस्य कृत्यैकयुजा यदाप्तम् ॥
कोटिर्भवेत्सा पृथगिष्टनिघ्नी तत्कर्णयोरन्तरमत्र बाहुः ॥ ६ ॥
अन्वयः-इष्टेन निघ्नात् द्विगुणात् कर्णात् एकयुजा इष्टस्य कृत्या यत् आप्तं सा कोटिः
भवेत् । सा पृथक् इष्टनिघ्नी तत्कर्णयोः अन्तरम् बाहुः स्यात् ॥ ६ ॥
अर्थः-कर्णको दूना कर इष्टसे गुणा करे जो अंक हों उनमें एक युक्त इष्टके वर्गका
भाग दे; जो लब्धि हो वही कोटि है उसी क्षेत्रमें कोटिको इष्टसे गुणा कर जो अंक
हो उनका और कर्णका अन्तर करनेसे जो शेष रहे वही भुजका प्रमाण होता है ॥६॥
उदाहरणम्-
पञ्चाशीतिमिते कर्णे यौ यावकरणीगतौ ॥
स्यातां कोटिभुजौ तौ तौ वद कोविद् सत्वरम् ॥ ४ ॥
अन्वयः-हे कोविद् ! पञ्चाशीतिमिते कर्णे यौ यौ कोटिभुजौ स्याताम् अकरणी
गतौ तौ तौ सत्वरं वद ॥ ४ ॥
अर्थः- हे गणक ! जिस क्षेत्रमें ८५ पचासी कर्ण हैं; उस क्षेत्रमें कोटि और
भुजकी जो जो संख्या हो वह वह अकरणीगत शीघ्र कहो ॥ ४ ॥
न्यासः-कर्णः८५ अयं द्विगुणः १७० द्विके-
नेष्टेन हतः ३४० इष्ट २ कृत्या ४ सैकया ५
भक्ते जाता कोटिः ६८ इयमिष्टगुणा १३६ कर्णो
८५ निता जातो भुजः ॥ ५१ ॥
चतुष्केनेष्टेन वा । कोटिः४० भुजः ७५