लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षेत्रव्यवहारः । ( १३७ )
भुजकोट्योर्योगे कर्णे च ज्ञाते पृथक्करणसूत्रं वृत्तम् -
भुज और कोटिका योग तथा कर्ण जानकर भुज और कोटिको अलग अलग
जाननेकी रीति एक श्लोकमें-
कर्णस्य वर्गाद्द्विगुणाद्विशोध्यो दोःकोटियोगः
स्वगुणोऽस्य मूलम् ॥ योगो द्विधा मूलविहीन-
युक्तः स्यातां तदर्द्धे भुजकोटिमाने ॥ १४ ॥
अन्वयः-द्विगुणात् कर्णस्य वर्गात् स्वगुणः दोःकोटियोगः विशोध्यः अस्य
मूलं ग्राह्यम् । योगः द्विधा मूलविहीनयुक्तः कार्य्यः तदर्द्धे भुजकोटिमाने
स्याताम् ॥ १४ ॥
अर्थः-कर्णके वर्गको दोसे गुणा करे तब जो अङ्क हों उनमें भुज और कोटिके
योगका वर्ग घटा दे जो शेष रहे उसका मूल ले; भुजकोटिके योगको दो स्थानोंमें
लिख; एक स्थानमें पहले लिया हुआ मूल घटा दे और एक स्थानमें जोड
दे; फिर दोनों स्थानोंके घटाये हुए और जोडे हुए अङ्कोंको आधा कर ले; तब
भुज और कोटिके प्रमाण होते हैं ॥ १४ ॥
उदाहरणम्-
दशसप्ताधिकः कर्णस्त्र्यधिका विंशतिः सखे ॥
भुजकोटियुतिर्यत्र तत्र ते मे पृथग्वद् ॥ १० ॥
अन्वयः-हे सखे ! यत्र दशसप्ताधिकः कर्णः त्र्यधिका विंशतिः भुजकोटियुतिः
तत्र ते मे पृथक् वद् ॥ १० ॥
अर्थः-हे मित्र ! जहां कर्णका प्रमाण १७ है और भुजकोटिका योग २३
तेईस है; तहां भुज और कोटिका प्रमाण अलग अलग कहो ॥ १० ॥
न्यासः १५ १७
कर्णः १७ दोःकोटियोगः २३ जाते
भुजकोटी ८ । १५ ॥
२३ ८
फैलाव-यहां कर्ण १७ है और भुजकोटियोग २३ है, यहां भुजकोटिका
अलग २ प्रमाण जाननेके अर्थ उपरोक्त नियमानुसार कर्ण १७ का वर्ग किया
२८९ इसको दोसे गुणा किया तब ५७८ हुए; इसमें भुज कोटिके योग