लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षेत्रव्यवहारः। ( १४१ )
उदाहरणम्-
चतुरस्रे त्रिषड्द्व्यर्का भुजास्त्र्यस्रे त्रिषण्णवाः ॥
उद्दिष्टा यत्र धृष्टेन तदक्षेत्रं विनिर्दिशेत् ॥ १३ ॥
अन्वयः-यत्र धृष्टेन चतुरस्रे त्रिषड्द्व्यर्काः। तथा त्र्यस्रे त्रिषण्णवाः भुजाः उद्दिष्टाः
तत् अक्षेत्रम् विनिर्दिशेत् ॥ १३ ॥
अर्थ:-जिस चतुरस्र क्षेत्रमें तीन, छ, दो, बारह ३ । ६ । २ । १२ प्रमाणकी
चार भुज हैं और त्र्यस्र (त्रिकोण) में ३ तीन ६ छ ९ नौ प्रमाणकी तीन भुज
हैं यदि कोई ढीठ ऐसा प्रश्न करे तो उसको अक्षेत्र कहना चाहिये ॥ १३ ॥
न्यासः एते अनुपपन्ने क्षेत्रे.
भुजप्रमाणा ऋजुशलाका भुजस्थानेषु विन्यस्या-
नुपपत्तिर्दर्शनीयेति ॥
फैलाव-यह दोनों अक्षेत्र हैं, इनकी अक्षेत्रता जाननेको भुजके प्रमाणकी सूधी
शलाकाएँ भुजके स्थानोंमें रखकर दिखावे, इस कारण रेखाओंसे प्रत्यक्ष कर
दिखाते हैं ॥
चतुर्भज क्षेत्रमें तीन भुज २ । ३ । ६ का योग
११ है और बडा भुज १२ है, इस कारण तीनों
भुजांका योग ११ बडी एक भुज १२ बारहसे
छोटा है, इस कारण अक्षेत्र कहना उचित है,
ऐसे क्षेत्रमें क्षेत्रफल नहीं मिलता क्योंकि क्षेत्रफल भूमि और कोटि तथा लम्बिके
अधीन हैं और ऐस प्रश्नमें सब भुज भूमिमें मिल जाते हैं, इसी कारण त्रिभुज भी
अक्षेत्र है, दोनों क्षेत्रोंका रूप रेखाओंसे दिखाते हैं ॥