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लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

ःअजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ३०३
शब्द—अर्थ शब्द—अर्थ शब्द—अर्थ
विहृति = मारना शान्ति = शान्ति संहति = समूह
वीचि = तरङ्ग शिरोधि = गरदन सिद्धि = सिद्ध होना
वृत्ति = जीविका शुक्ति = सीपी सूक्ति = सुन्दर वचन
वृष्टि = वर्षा शुद्धि = सफ़ाई स्तुति = प्रशंसा
वेणि = गुत्त श्रुति = वेद, कान स्थिति = ठहरना
व्याकृति = व्याकरण सन्तति = सन्तान स्फूर्ति = फुर्ती
व्रतति = लता सम्पत्ति = धन-दौलत स्मृति = स्मरण
शक्ति = ताकत संस्तुति = परिचय हानि = हानि
अब स्त्रीलिङ्ग में 'त्रि' (तीन) शब्द के रूप दर्शाते हैं। त्रिशब्दो नित्यं बहु-
वचनान्तः—यह पीछे (२४०) पृष्ठ पर स्पष्ट कर चुके हैं।
'त्रि+अस्' (जस्) इस दशा में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२२४) त्रिचतुरोः स्त्रियां तिसृ-चतसृ ।७।२।९९॥
स्त्रीलिङ्गयोरेतयोरेतौ स्तो विभक्तौ ॥
अर्थः—विभक्ति परे होने पर स्त्रीलिङ्ग में 'त्रि' शब्द के स्थान पर 'तिसृ' और
'चतुर्' शब्द के स्थान पर 'चतसृ' आदेश हो।
व्याख्या—विभक्तौ ।७।१। (अष्टन आ विभक्तौ से)। त्रिचतुरोः ।६।२। स्त्रियाम्
।७।१। तिसृचतसृ ।१।१। समासः—तिसृ च चतसृ च=तिसृचतसृ, समाहारद्वन्द्वः ।
अर्थः—(विभक्तौ) विभक्ति परे होने पर (स्त्रियाम्) स्त्रीलिङ्ग में (त्रिचतुरोः) त्रि
और चतुर् शब्दों के स्थान पर क्रमशः (तिसृचतसृ) तिसृ और चतसृ आदेश होते हैं।
'त्रि+अस्' (जस्) यहां जस् विभक्ति परे है अतः प्रकृतसूत्र से 'त्रि' के स्थान
पर 'तिसृ' आदेश हो 'तिसृ+अस्' इस स्थिति में पूर्वसवर्णदीर्घ (१२६) का बाध कर
ऋतो ङिसर्वनामस्थानयोः (२०४) से गुण प्राप्त होता है। इस पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त
होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२२५) अचि र ऋतः¹ ।७।२।१००॥
तिसृचतसृ एतयोर्ऋकारस्य रेफादेशः स्यादचि । गुणदीर्घोत्त्वानाम-
पवादः । तिस्रः २ । तिसृभिः । तिसृभ्यः २ । आमि नुट् ॥
अर्थः—अच् परे हो तो तिसृ और चतसृ के ऋकार को रेफ आदेश हो।
व्याख्या—अचि ।७।१। रः ।१।१। (रेफादकार उच्चारणार्थः) । ऋतः ।६।१।
१. अलोऽन्त्यपरिभाषायैव सिद्धे 'ऋत' इति अनुवर्त्तमान-'तिसृचतसृ' इत्यस्य षष्ठ्यन्त-
त्वकल्पनाय । अन्यथा त्रिचतुरोरित्यस्यैवानुवृत्त्यापत्तौ रादेशेन तिसृचतस्रोर्बाधा-
पत्तिरिति शेखरे नागेशः । वस्तुतस्तु तत्रैव स्वरितत्वं न तत्र। अन्यथा 'अचि रश्च'
इत्येव वदेत् । योग्यतयैव तत्कल्पनासिद्ध्या तददृष्टार्थमेवेत्यन्ये ।

३०४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
तिसृचतस्रो ।६।२। (त्रिचतुरोः स्त्रियां तिसृचतसृ मे विभक्ति विपरिणाम द्वारा )। अर्थ —
(अचि) अच् परे होने पर (तिसृचतस्रो ) तिसृ और चतसृ शब्दो के (ऋत ) ऋकार
के स्थान पर (र ) 'र्' यह आदेश होता है।
प्रश्न—अच् परे होने पर ऋकार को रेफ आदेश तो इको यणचि (१५) से
ही सिद्ध है, पुन इस सूत्र की क्या आवश्यकता है ?
उत्तर—गुणदीर्घोत्त्वानाम् अपवाद अर्थात् 'तिसृ +अस्' यहा जस् मे ऋतो ङि०
(२०४) से प्राप्त होने वाले गुण के, तिसृ+अस्' यहा शस् मे प्रथमयो पूर्वसवर्णः
(१२६) द्वारा प्राप्त होने वाले पूर्वसवर्णदीर्घ के तथा प्रियचतसृ+अस्' यहा ङसिं
और ङस् मे ऋत उत् (२०८) से प्राप्त होने वाले उत्त्व के बाघ के लिये इस सूत्र
से ऋकार के स्थान पर रेफ आदेश किया जाता है। इस प्रकार यह सूत्र गुण, दीर्घ
और उत्त्व का अपवाद है।
तिसृ+अस्' यहा गुण का बाघ कर रेफ आदेश कर सकार को रुत्व और रेफ
को विसर्ग आदेश करने से—'तिस्र ' रूप बना ।
'त्रि+अस्'(शस्) यहा तिसृ आदेश हो कर पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होता है;
पुन उस का बाध कर प्रकृत-सूत्र से रेफ आदेश हो जाता है—'तिस्र' ।
त्रि+भिस्=तिसृ+भिस्=तिसृभि । त्रि+भ्यस्=तिसृ+भ्यस्=ति-
सृभ्यः ।
'त्रि+आम्' यहा त्रेस्त्रयः (१६२) से प्राप्त त्रय आदेश का बाध कर
त्रिचतुरो ० (२२४) से तिसृ आदेश हो जाता है। 'तिसृ+आम्' इस स्थिति में
ह्रस्वनद्यापो नुट् (१४८) से नुट् आगम और अचि र ऋत (२२५) मे रेफ आदेश
युगपत् प्राप्त होते हैं। विप्रतिषेधे पर कार्यम् (११३) के अनुसार परकार्य रेफ आदेश
होना चाहिये। परन्तु नुम्-अचिर-तृज्वद्भावेभ्यो नुट् पूर्वविप्रतिषेधेन (वा० १६) इस
कात्यायनवचन से यहा पूर्वविप्रतिषेध मान कर पूर्व कार्य नुट् आगम हो जाता है।
अब 'तिसृ+नाम्' इस दशा मे नामि (१४६) से दीर्घ प्राप्त होता है, इस पर
अग्रिमसूत्र से उस का निषेध करते हैं—
[लघु०] निषेध-सूत्रम्—(२२६) न तिसृचतसृ ।६।४।४।।
एतयोर्नामि दीर्घो न । तिसृणाम् । तिसृषु ।।
अर्थ —नाम् परे होने पर तिसृ और चतसृ शब्दो को दीर्घ नही होता ।
व्याख्या—न इत्यव्ययपदम् । तिसृ-चतसृ ।६।२। (यहा सुपां सुलुक० सूत्र द्वारा
षष्ठी का लुक समझना चाहिये)। नामि ।७।१। (नामि से) । दीर्घ ।१।१। (ढ्रलोपे
पूर्वस्य दीर्घोऽण मे)। अर्थ —(नामि) नाम् परे होने पर (तिसृचतसृ) तिसृ और
चतसृ शब्दो के स्थान पर (दीर्घ) दीर्घ (न) नही होता ।
'तिसृ+नाम्' यहाँ दीर्घ का निषेध हो कर ऋवर्णान्नस्य णत्व वाच्यम् (वा०
२०) से नकार को णकार करने से—'तिसृणाम्' । रूपमाला यथा—

अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ३०५
प्र० ० ० तिस्रः | प० ० ० तिसृभ्यः
द्वि० ० ० " | प० ० ० तिसॄणाम्
तृ० ० ० तिसृभिः | स० ० ० तिसृषु
च० ० ० तिसृभ्यः | सम्बोधन नहीं होता।
इसी प्रकार चतुर् (चार) शब्द के स्त्रीलिङ्ग में रूप बनते हैं—चतस्रः २,
चतसृभिः, चतसृभ्यः २, चतसॄणाम्, चतसृषु । इसे हलन्तस्त्रीलिङ्गप्रकरण में देखें ।
[लघु०] द्वे २ । द्वाभ्याम् ३ । द्वयोः २ ॥
व्याख्या—'द्वि' (दो) शब्द द्वित्व का वाचक होने से सदा द्विवचनान्त प्रयुक्त
होता है । अब स्त्रीलिङ्ग में इस की प्रक्रिया दर्शाई जानी है ।
द्वि शब्द से प्रथमा या द्वितीया के द्विवचन में 'द्वि+औ' इस स्थिति में त्यदा-
दीनामः (१६३) सूत्र से विभक्ति परे होने के कारण इकार को अकार हुआ । तब
'द्व+औ' इस दशा में स्त्रीत्वविवक्षा में अदन्त होने के कारण अजाद्यतष्टाप् (१२४५)
सूत्र से टाप् प्रत्यय हुआ । टाप् के टकार और पकार इत्सञ्ज्ञक होने से लुप्त हो जाते
हैं । 'द्व आ+औ' इस स्थिति में सवर्णदीर्घ हो औङ आपः (२१६) से औ को शी
आदेश तथा आद् गुणः (२७) से गुण करने पर 'द्वे' रूप सिद्ध होता है ।
भ्याम् में त्यदाद्यत्व, टाप् और सवर्णदीर्घ हो कर—'द्वाभ्याम्' ।
ओस् में, त्यदाद्यत्व, टाप्, सवर्णदीर्घ, आकार को आङि चापः (२१८) से
एकार, अय् आदेश और सकार को रुत्व-विसर्ग हो कर—'द्वयोः'१ । रूपमाला यथा—
प्र० ० द्वे ० | प० ० द्वाभ्याम् ०
द्वि० ० " ० | प० ० द्वयोः ०
तृ० ० द्वाभ्याम् ० | स० ० " ०
च० ० " ० | सम्बोधन नहीं होता ।
(यहाँ पर ह्रस्व इकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।)
--------::०::--------
अब ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का वर्णन करते हैं—
[लघु०] गौरी । गौर्यौ । गौर्यः । हे गौरि! । गौर्यै । इत्यादि ॥
व्याख्या—गौर शब्द से षिद्गौरादिभ्यश्च (१२५१) सूत्र द्वारा ङीष् प्रत्यय
करने पर भसञ्ज्ञक अकार का लोप हो कर 'गौरी' शब्द निष्पन्न होता है । गौरी का
अर्थ 'पार्वती' है । नित्यस्त्रीलिङ्ग होने से यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) द्वारा इस की नदी-
सञ्ज्ञा हो जाती है ।
प्रथमा के एकवचन में 'गौरी + स्' इस अवस्था में ङ्यन्त होने से हल्ङ्याब्भ्यः०
(१७६) सूत्र से अपृक्त सकार का लोप हो कर 'गौरी' रूप बनता है ।
१. ध्यान रहे कि पुंलिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग के 'द्वाभ्याम्' और 'द्वयोः' की प्रक्रिया
भिन्न २ है ।
ल० प्र० (२०)

३०६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
'गौरी + औ' में पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होता है, उस का दीर्घाज्जसि च (१६२)
सूत्र से निषेध हो जाता है। तब इको यणचि (१५) से यण् आदेश हो कर 'गौर्यौ'
रूप बनता है। ध्यान रहे कि 'गौर्यौ' आदि में अचो रहाभ्यां द्वे (६०) सूत्र द्वारा
यकार यर् को द्वित्व हो कर पक्ष में 'गौर्य्यौ' प्रभृति रूप भी बनते हैं।
जस् में भी पूर्वसवर्णदीर्घ का निषेध हो यण् करने पर—'गौर्यः'।
'गौरी + अम् = गौरीम्। अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप हो जाता है।
'गौरी + शस्' यहां शस् में पूर्वसवर्णदीर्घ हो कर सकार को रुत्व-विसर्ग करने
से 'गौरीः' रूप बनता है। स्त्रीलिङ्ग होने से सकार को नत्व नहीं होता।
टा में इको यणचि (१५) से यण् हो कर 'गौर्या' रूप सिद्ध होता है।
'गौरी + ङे' (ङे)। यहां यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) से नदीसञ्ज्ञा हो कर
आण्नद्याः (१६६) से आट् आगम, आठश्च (१६७) से वृद्धि और इको यणचि (१५)
से यण् यकार करने से 'गौर्यै' रूप बनता है।
'गौरी + ङस्' (ङसिं वा ङस्) इस दशा में नदीसञ्ज्ञा, आट् आगम, वृद्धि और
यण् यकार हो कर 'गौर्याः' रूप सिद्ध होता है।
ओस् में इको यणचि (१५) से यण् हो कर 'गौर्योः' बनता है।
षष्ठी के बहुवचन आम् में नदीसञ्ज्ञा हो कर नदीमूलक नुट्, अनुबन्धलोप
और नकार को णकार करने से 'गौरीणाम्' प्रयोग सिद्ध होता है।
सप्तमी के एकवचन ङि में 'गौरी + ङि' इस दशा में ङेराम्० (१६८) से ङि
को आम्, आण्नद्याः (१६६) से आट् आगम, आठश्च (१६७) से वृद्धि तथा इको
यणचि (१५) से यण् करने पर 'गौर्याम्' प्रयोग सिद्ध होता है।
सम्बुद्धि में नदीसञ्ज्ञा होने से अम्बार्थ० (१६५) से ह्रस्व हो कर एङ्ह्रस्वात्०
(१३४) से सकार का लोप हो जाता है—'हे गौरि!'। रूपमाला यथा—
प्र० गौरी गौर्यौ गौर्यः | प० गौर्याः गौरीभ्याम् गौरीभ्यः
द्वि० गौरीम् 〃 गौरीः | ष० 〃 गौर्योः गौरीणाम्
तृ० गौर्या गौरीभ्याम् गौरीभिः | स० गौर्याम् 〃 गौरीषु
च० गौर्यै 〃 गौरीभ्यः | सं० हे गौरि! हे गौर्यौ! हे गौर्यः!
[लघु०] एव नद्यादयः ॥
अर्थ—इसी प्रकार नदी आदि ईकारान्त स्त्रीलिङ्गशब्दों के रूप बनेंगे।
व्याख्या—बालकों के लिये गौरीवत् कुछ उपयोगी शब्दों का सङ्ग्रह यहां दे
रहे हैं। '' इस चिह्न वाले स्थानों में षत्वविधि जाननी चाहिये।
शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ
अक्षौहिणी = सेनाविशेष | अनीकिनी = सेना | अमरावती = इन्द्रपुरी
अङ्गुली = अङ्गुल | अनुक्रमणी = सूची | अरण्यानी = बड़ा जङ्गल
अटवी = जङ्गल | अनुचरी
= दासी | अवाची = दक्षिण दिशा

अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ३०७
शब्द — अर्थ | शब्द — अर्थ | शब्द — अर्थ
अश्मरी* = पथरी रोग | कुटुम्बिनी = भार्या | दूती = संदेशहरी
आनुपूर्वी* = क्रम | कुमारी* = कुंवारी लड़की | देवकी = श्रीकृष्ण-माता
आमलकी = आँवला | केतकी = केवड़ा (क्षुप) | देवी = दुर्गा, देवपत्नी
इङ्गुदी = गोंदी | कोकी = चकवी | दैनन्दिनी = डायरी
इन्द्राणी = इन्द्रपत्नी | कौमुदी = चान्दनी | द्रौपदी = द्रुपद-कन्या
उज्जयिनी = उज्जैन नगर | कौमोदकी = विष्णुकी गदा | धमनी = नाड़ी, शिरा
उदीची = उत्तर दिशा | कौशाम्बी = एक नगर | धरित्री* = पृथ्वी
उर्वशी = एक अप्सरा | क्षत्रियाणी = क्षत्रियस्त्री | नगरी* = नगर
उर्वी* = पृथ्वी | गर्दभी = गधी | नटी = नट की स्त्री
ऋतुमती = रजस्वला | गर्भिणी = गर्भवती | नदी = नदी
एकादशी = एकादशी | गायत्री* = एक छन्द | नलिनी = कमलिनी
कटी = कमर | गाली = अपशब्द | नागवल्ली = पान की वेल
कठिनी = खड़िया मिट्टी | गुटी = गोली | नाडी = शिरा
कदली = केले का पेड़ | गुडूची = गिलोय | नारी* = स्त्री
कवरी* = वेणी | गुर्वी* = भारी | निशीथिनी = रात्रि
कमठी = कछुई | गृध्रसी = एक रोग | पञ्चवटी = एक स्थान
करिणी = हथिनी | गृहिणी = भार्या | पतिवत्नी = सधवा
कर्तनी = कैंची | गोष्ठी = सभा | पत्नी = भार्या
कस्तूरी* = कस्तूरी | गोस्तनी = द्राक्षा विशेष | पदवी = मार्ग, पद
काकली = सूक्ष्ममधुरध्वनि | घृतचौरी* = कचौरी | पद्मिनी = कमल-समूह
काकिणी = कौड़ी | छागी = बकरी | परिपाटी = सिलसिला
काकी = कौवी | जगती = पृथ्वी | पाञ्चाली = द्रौपदी
कादम्बरी* = मदिरा | जननी = माता | पार्वती = दुर्गा
कादम्बिनी = मेघ-माला | ज्योत्स्नी = चान्दनी रात | पितामही = दादी
कामिनी = स्त्री | टिप्पणी = नोट | पिप्पली = पीपर
कामुकी = कामुक स्त्री | तटिनी = नदी | पुत्री* = बेटी
कालिन्दी = यमुना नदी | तपस्विनी = तपस्या वाली | पुरन्ध्री* = पति-पुत्रवती
काली = देवी-विशेष | तमी = अन्धेरी रात | पुरी* = नगरी
कावेरी* = एक नदी | तरङ्गिणी = नदी | पुंश्चली = व्यभिचारिणी
काशी = बनारस | तरुणी = जवान स्त्री | पुष्करिणी = हथिनी
किङ्किणी = घुंघरू | तामसी = तमोगुणवाली | पुष्पवती = रजस्वला
किंवदन्ती = अफ़वाह | तिरस्करिणी = परदा | पृथिवी = भूमि
कुटी = झोंपड़ी | त्रयी* = ऋग्यजुःसाम | पृथ्वी = भूमि
कुट्टनी = दलाल स्त्री | दासी = नौकरानी | पेषणी = पेषण-शिला

३०८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ
पौर्णमासी = पूर्णिमा | मैत्री* = मित्रता | वैतरणी = नरक की नदी
प्रणाली = तरीक़ा | मौर्वी* = धनुष-डोरी | वैदेही = सीता
प्रतीची = पश्चिमदिशा | यक्षी* = कुवेर-स्त्री | वैयासिकी = व्यास-रचना
प्रतोली = गली | यवनानी = यवनलिपि | व्याघ्री* = बाघिन
प्रसाधनी = कङ्घी | याज्ञसेनी = द्रौपदी | शतघ्नी = तोप
प्राची = पूर्वदिशा | यामिनी = रात्रि | शमी = शमी वृक्ष
बदरी* = बेर का वृक्ष | युवती = जवान स्त्री | शर्वरी* = रात्रि
बिसिनी = कमल का पौधा | रजनी = रात | शाटी = वस्त्र, साड़ी
भट्टिनी = महारानी | राक्षसी = राक्षस स्त्री | शुण्ठी = सोंठ
भवती = आप (स्त्री) | राजधानी = राजधानी | शुनी = कुतिया
भवानी = दुर्गा | राज्ञी = रानी | शैली = रीति
भागीरथी = गङ्गा | रुक्मिणी = कृष्ण पत्नी | श्रेणी = पङ्क्ति
भामिनी = कोपशीला | रुद्राणी = पार्वती | सखी = सहेली
भारती = संस्कृतभाषा | रेवती = बलराम पत्नी | सङ्ग्रहणी = एक रोग
भेरी* = बड़ा नगारा | रोहिणी = एक नक्षत्र | सपत्नी = सौकन
मञ्जरी* = कोंपल | लेखनी = कलम | सरस्वती = वाग्देवी
मन्त्रिणी = मन्त्री (स्त्री) | लेखिनी = कलम | सरोजिनी = कमल-समूह
मन्दाकिनी = स्वर्गङ्गा | वह्नियिनी = सेना | साध्वी = पतिव्रता
मर्कटी = बानरी | वसुमती = पृथ्वी | सिंहवाहिनी = दुर्गा
मषी = स्याही | वंशी = बांसुरी | सिंही = शेरनी
महती = बड़ी | वाणी = वाणी | सीमन्तिनी = स्त्री
महामारी* = प्लेग आदि | वापी = बावड़ी | सुन्दरी* = रूपवती
महिषी* = भैंस, पटरानी | वामी = घोटी | सूची = सूई
मही = पृथिवी | वायसी = कौवी | सूरी* = कुन्ती
मातामही = नानी | वाराणसी = बनारस | सैरन्ध्री* = दासी
मातुलानी = मामी | वारुणी = मद्य, पश्चिम | सौदामनी = विद्युत्
मातुली = मामी | वाहिनी = सेना, नदी | स्थली¹ = सुन्दर स्थल
मालती = चमेली (लता) | विदुषी* = पठित स्त्री | स्रोतस्वती = नदी
मुम्बापुरी* = बम्बई नगर | विभावरी* = रात्रि | हरिणी = हरनी
मुरली = बांसुरी | विष्णुपदी = गङ्गा | हरीतकी = हरड़
मृडानी = पार्वती | वीथी = रास्ता, गली | हसन्ती = अगीठी
मेदिनी = पृथिवी | वैजयन्ती = पताका | हिमानी = वरफ-समूह
| | ह्लादिनी = वज्र, विद्युत्
१ स्थलशब्द से जानपद-कुण्ड-गोण स्थल० (४।१।४२) सूत्रद्वारा ङीप् प्रत्यय कर नित्य-
स्त्रीलिङ्गी 'स्थली' शब्द निष्पन्न होता है। इस का अर्थ है—अकृत्रिम या स्वा-

अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ३०६
[लघु०] लक्ष्मीः । शेषं गौरीवत् ॥
व्याख्या—लक्ष दर्शनाङ्कनयोः (चुरा० उ०) धातु से लक्षेर्मुँट् च (उणा०
४४०) द्वारा ई प्रत्यय और मुँट् का आगम करने से 'लक्ष्मी' शब्द निष्पन्न होता है।
ङ्यन्त न होने से इस से परे हल्ङ्याब्भ्यो० (१७६) द्वारा सुंलोप नहीं होता । अन्य
विभक्तियों में गौरीशब्दवत् प्रक्रिया होती है। रूपमाला यथा--
प्र० लक्ष्मीः लक्ष्म्यौ लक्ष्म्यः | प० लक्ष्म्याः* लक्ष्मीभ्याम् लक्ष्मीभ्यः
द्वि० लक्ष्मीम् ,, लक्ष्मीः | प० ,,* लक्ष्म्योः लक्ष्मीणाम्*
तृ० लक्ष्म्या लक्ष्मीभ्याम् लक्ष्मीभिः | स० लक्ष्म्याम्* ,, लक्ष्मीषु
च० लक्ष्म्यै* ,, लक्ष्मीभ्यः | सं० हे लक्ष्मि !* हे लक्ष्म्यौ! हे लक्ष्म्यः!

  • इन स्थानों पर नदीसञ्ज्ञा हो कर आट् आदि नदी-कार्य होते हैं।
    [लघु०] एवं तरी-तन्त्र्यादयः ॥
    अर्थः—तरी, तन्त्री आदि अन्य ईप्रत्ययान्त शब्दों के रूप भी लक्ष्मीशब्द के
    समान होते हैं ।
    व्याख्या—अवि-तृ-स्तृ-तन्त्रिभ्य ईः (उणा० ४३८) इस औणादिक सूत्र से १.
    अवी (रजस्वला स्त्री), २. तरी (नौका), ३. स्तरी (घूम), ४. तन्त्री (वीणा)—
    इन चार ईप्रत्ययान्त शब्दों की निष्पत्ति होती है। इन का उच्चारण भी लक्ष्मीशब्दवत्
    होता है। ङ्यन्त न होने से इन में भी सुँलोप नहीं होता । इस विषय पर एक श्लोक
    प्रसिद्ध है—
    अवी-तन्त्री-तरी-लक्ष्मी-धी-ह्री-श्रीणामुणादिषु ।
    सप्तस्त्रीलिङ्गशब्दानां न सुलोपः कदाचन ॥
    परन्तु इन में 'स्तरी' और 'भी' (डर) शब्दों का उल्लेख नहीं, किञ्च ये सब
    शब्द औणादिक भी नहीं हैं, अतः यह श्लोक संशोधित रूप से इस प्रकार पढ़ा जाना
    चाहिये—
    अवी-तन्त्री-स्तरी-लक्ष्मी-तरी-धी-ह्री-श्रियाम् भियः ।
    अङ्यन्तत्वात् स्त्रियामेषां न सुलोपः कदाचन ॥१
    भाविक सुन्दर भूमि । इस शब्द की यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) से नदीसञ्ज्ञा हो
    जाती है । इस पर एक सुन्दर सुभाषित बहुत प्रसिद्ध है—
    पाणिनेर्न नदी गङ्गा यमुना च स्थली नदी ।
    प्रभुः स्वातन्त्र्यमापन्नो यदिच्छति करोति तत् ॥
    अर्थात् पाणिनि ने गङ्गा और यमुना को तो 'नदी' नहीं माना किन्तु स्थली
    (स्थलप्रदेश) को 'नदी' माना है । सत्य है समर्थ लोग स्वतन्त्र होते हैं, जो जी
    में आता है कह देते है कोई रोकने वाला नहीं होता । [व्याकरणप्रेमी थोड़ा विचार
    कर इस पद्य का आनन्द उठा सकते हैं ।]
    १. यहां यह ज्ञातव्य है कि इन शब्दों से यदि कृदिकारादक्तिनः (वा० १०६) से
    वैकल्पिक ङीप् करेंगे तो ङीपपक्ष में इन शब्दों से परे भी सुँलोप होने लगेगा ।
    अत एव द्विरूपकोश में लक्ष्मीशब्द के प्रथमैकवचन में दोनों रूप उपलब्ध होते हैं
    —लक्ष्मीर्लक्ष्मी हरप्रिया । परन्तु इन के ङीप्पक्षीय रूप प्रसिद्ध नहीं हैं ।

३१० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
अब ईकारान्त स्त्रीलिङ्गो मे सब से विलक्षण स्त्रीशब्द का वर्णन करते हैं।
[लघु०] स्त्री। हे स्त्रि '॥
व्याख्या—स्त्यै शब्द-सङ्घातयोः (भ्वा० प०) धातु से स्त्यायतेर्ड्रट् (उणा०
६०५) सूत्र द्वारा ड्रट् प्रत्यय हो कर अनुबन्धलोप, टिलोप, लोपो व्योर्बलि (४२६)
से यकारलोप, टिड्ढाणञ्० (१२४७) से ङीप् प्रत्यय और यस्येति च (२३६) से
भसञ्ज्ञक अकार का लोप करने से 'स्त्री' शब्द निष्पन्न होता है। स्त्रीशब्द ङ्यन्त है
अतः 'स्त्री+सु' यहा हल्ङ्याब्भ्य० (१७६) द्वारा अपृक्त सकार का लोप हो जाता
है—स्त्री।
सम्बुद्धि में यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) सूत्र द्वारा स्त्रीशब्द की नदीसञ्ज्ञा हो
जाती है। तब अम्बार्थनद्योर्ह्रस्वः (१६५) सूत्र से ह्रस्व और एङ्घ्रस्वात् सम्बुद्धेः
(१३४) सूत्र से सकार का लोप हो कर 'हे स्त्रि' प्रयोग सिद्ध होता है।
'स्त्री+औ' यहा धातु का ईकार न होने से इयङ् प्राप्त नही होता। पूर्व-
सवर्णदीर्घ का भी दीर्घाज्जसि च (१६२) से निषेध हो जाता है। तब इको यणचि
(१५) मे यण् प्राप्त होता है। इस पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२२७) स्त्रियाः ।६।४।७६॥
अस्येयङ् स्याद् अजादौ प्रत्यये परे। स्त्रियौ। स्त्रियः॥
अर्थ.—अजादि प्रत्यय परे होने पर स्त्रीशब्द के ईकार को इयङ् आदेश हो।
व्याख्या—स्त्रियाः ।६।१। इयङ् ।१।१। अचि ।७।१। (अचि श्नुधातु० से)।
'प्रत्यये' का अध्याहार कर यस्मिन् विधिस्तदादावल्ग्रहणे द्वारा तदादिविधि हो कर
'अजादौ प्रत्यये' बन जाता है। अर्थ —(अचि=अजादौ) अजादि (प्रत्यये) प्रत्यय परे
होने पर (स्त्रिया ) स्त्रीशब्द के स्थान पर (इयङ्) इयङ् आदेश हो। अलोऽन्त्य-
परिभाषा से स्त्रीशब्द के अन्त्य ईकार के स्थान पर इयङ् आदेश होगा।
'स्त्री+औ' यहा 'औ' यह अजादि प्रत्यय परे होने से प्रकृतसूत्र द्वारा इयङ्
आदेश होकर—'स्त्रियौ' रूप बना।
'स्त्री+अस्' (जस्) यहां भी इयङ् हो कर—'स्त्रियः' रूप बनता है।
'स्त्री+अम्' यहा अमि पूर्वः (१३५) का बाध कर प्रकृत-सूत्र से नित्य इयङ्
प्राप्त होता है; इस पर अग्रिमसूत्र से विकल्प करते हैं—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२२८) वाऽम्शसोः ।६।४।८०॥
अमि शसि च स्त्रिया इयङ् वा स्यात्। स्त्रियम्, स्त्रीम्। स्त्रियः,
'स्त्रीः। स्त्रिया। स्त्रियै। स्त्रियाः २। परत्वान्नुट्—स्त्रीणाम्। स्त्रीषु ॥
अर्थः—अम् वा शस् परे होने पर स्त्रीशब्द को विकल्प कर के इयङ् हो।
व्याख्या—वा इत्यव्ययपदम्। अम्शसोः ।७।२। स्त्रियाः ।६।१। (स्त्रियाः से)।
इयङ् ।१।१। (अचि श्नु० से) । अर्थः—(अम्शसो ) अम् अथवा शस् परे होने पर
(स्त्रियाः) स्त्रीशब्द के स्थान पर (वा) विकल्प कर के (इयङ्) इयङ् आदेश होता
है। यह पूर्वसूत्र का बाधक है।

अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ३११
'स्त्री + अम्' यहां प्रकृतसूत्र से ईकार को विकल्प कर के इयङ् हो गया ।
इयङ्पक्ष मे अनुबन्ध-लोप हो कर—स्त्रियम् । इयङ् के अभाव में अमि पूर्वः (१३५)
से पूर्वरूप हो कर—स्त्रीम् । इस प्रकार 'स्त्रियम्, स्त्रीम्' दो रूप सिद्ध होते हैं।
'स्त्री + अस्' (शस्) यहां भी वाऽम्शसोः सूत्र से वैकल्पिक इयङ् हो कर—स्त्रियः।
पक्ष में पूर्वसवर्णदीर्घ हो कर—स्त्रीः । इस प्रकार 'स्त्रियः, स्त्रीः' दो रूप बनते हैं ।
तृतीया के एकवचन में 'स्त्री + आ' इस अवस्था में स्त्रियाः (२२७) सूत्र से
ईकार को इयङ् हो कर—'स्त्रिया' रूप बनता है ।
चतुर्थी के एकवचन 'स्त्री + ए' में यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) से नित्य नदी-
सञ्ज्ञा हो जाती है । यद्यपि स्त्रीशब्द के स्थान पर इयङ् होता है, तथापि स्त्रीशब्द
का वर्जन होने से ङिति ह्रस्वश्च (२२२) से ङित्प्रत्ययों में नदीसञ्ज्ञा का विकल्प
नहीं होता । नदीसञ्ज्ञा होने से आण्नद्याः (१६६) से आट् आगम और आठश्च
(१६७) से वृद्धि होने के अनन्तर 'स्त्री + ऐ' इस स्थिति में स्त्रियाः (२२७) से इयङ्
हो कर 'स्त्रियै' प्रयोग निष्पन्न होता है ।
'स्त्री + अस्' (ङसिँ वा ङस्) यहां भी पूर्ववत् नदीसञ्ज्ञा होने से आट, वृद्धि
और इयङ् हो कर—'स्त्रियाः' रूप बनता है ।
ओस् में स्त्रियाः (२२७) से इयङ् हो कर—'स्त्रियोः' रूप बनता है ।
षष्ठी के बहुवचन में 'स्त्री + आम्' इस दशा में इयङ् और नुट् दोनों की
युगपत् प्राप्ति होने पर परत्व के कारण नुट् का आगम हो जाता है। अब अट्कुप्वाङ्०
(१३८) से नकार को णकार हो कर 'स्त्रीणाम्' प्रयोग सिद्ध होता है ।
'स्त्री + ङि' यहां पर नदीसञ्ज्ञा होने से ङेराम्० (१६८) सूत्र से ङि को
आम्, आट् का आगम, वृद्धि और स्त्रियाः (२२७) से इयङ् हो कर 'स्त्रियाम्' प्रयोग
सिद्ध होता है। रूपमाला यथा—
प्र० स्त्री स्त्रियौ स्त्रियः | प० स्त्रियाः स्त्रीभ्याम् स्त्रीभ्यः
द्वि० स्त्रियम् } " { स्त्रियः | प० " स्त्रियोः स्त्रीणाम्
स्त्रीम् } { स्त्रीः | स० स्त्रियाम् " स्त्रीषु
तृ० स्त्रिया स्त्रीभ्याम् स्त्रीभिः | सं० हे स्त्रि ! हे स्त्रियौ ! हे स्त्रियः !
च० स्त्रियै " स्त्रीभ्यः |
नोट— स्त्रीशब्द के समान उच्चारण वाला स्त्रीलिङ्ग में अन्य कोई शब्द नहीं ।
[लघु०] श्रीः । श्रियौ । श्रियः ॥
व्याख्या—श्रयति हरिम् इति श्रीः । लक्ष्मी वा शोभा को 'श्री' कहते हैं । श्रिञ्
सेवायाम् (भ्वा० उभ०) धातु से क्विव्वचि-प्रच्छि-श्रि-स्रु-द्रु-प्रु-ज्वां दीर्घोऽसम्प्रसारणञ्च
(उणा० २।५) सूत्र द्वारा क्विप् प्रत्यय तथा प्रकृति को दीर्घ करने से 'श्री' शब्द
निष्पन्न होता है । श्रीशब्द ङ्यन्त नहीं, इस में ईकार धातु का अवयव है । अतः
हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६) से सुँलोप नहीं होता—श्रीः ।

३१२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
'श्री+औ' यहां धातु के अवयव ईकार से पूर्व धातु का अवयव 'थ्' संयोग
वर्त्तमान है, अङ्ग अनेकाच् भी नही, अत एरनेकाच० (२००) से यण् नही होता ।
अचि श्नु० (१६६) से इयङ् हो कर- 'श्रियौ' प्रयोग बनता है।
श्री+अस् (जस्) =श्रिय । अचि श्नु० (१६६) से इयङ् होता है ।
'हे श्री+स्' यहां सम्बुद्धि मे यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) से नित्यनदीसञ्ज्ञा
होने के कारण अम्बार्थनद्योः० (१६५) द्वारा ह्रस्व प्राप्त होता है। परन्तु यह अनिष्ट
है, अत इस के वारण के लिए नदीसञ्ज्ञा का निषेध करते हैं-
[लघु०] निषेध-सूत्रम्- (२२६) नेयँङुवँङ्स्थानावस्त्री । १।४।४।।
इयँङुवँडो स्थितियेयोस्तावीदूतो नदीसञ्ज्ञौ न स्त, न तु स्त्री । हे
श्री ! । श्रिये, श्रिये । श्रिया २, श्रिय. २ ।।
अर्थः-जिन ईकार ऊकार के स्थान पर इयङ् उवङ् आदेश होते हैं उन की
नदीसञ्ज्ञा नही होती। परन्तु स्त्रीशब्द की तो होती ही है।
व्याख्या- न इत्यव्ययपदम् । इयँडुवँङ्स्थानौ १।२। यू १।२। नदी १।१।
(यू स्त्र्याख्यौ नदो से) । अस्त्री १।१। समास - इयङ् च उवङ् च = इयँङुवँङौ,
इतरेतरद्वन्द्वः । इयँङुवँडो स्थान (स्थिति ) ययोस्तौ = इयँङुवँङ्स्थानौ, बहुव्रीहि-
समास । ईश्च ऊश्च = यू, इतरेतरद्वन्द्व. । न स्त्री = अस्त्री, नञ्समास । अर्थः-
(इयँडुवँङ्स्थानौ) जिन के स्थान पर इयँङ् उवँङ् आदेश होते हैं ऐसे (यू) ईकार
ऊकार (नदी) नदीसञ्ज्ञक (न) नही होते । (अस्त्री) परन्तु स्त्रीशब्द पर यह नियम
लागू नहीं होता।
श्रीशब्द के ईकार के स्थान पर अजादि प्रत्ययो मे अचि श्नु० (१६६) सूत्र द्वारा
इयँङ् बादेश होता है, अत. प्रकृतसूत्र द्वारा अजादिप्रत्ययो में तथा अन्यत्र१ भी इस मे
नदीसञ्ज्ञा का निषेध हो जायेगा ।
'हे श्री+स्' यहा नदीसञ्ज्ञा का निषेध हो जाने से नदीमूलक ह्रस्व नही
होता । सकार को रुत्व और रेफ को विसर्ग करने से - 'हे श्री' प्रयोग सिद्ध होता है ।
श्री + अम् = श्रियम् । श्री + अस् (शस्) = श्रिय । श्री + आ (टा) = श्रिया ।
सर्वत्र अचि श्नु० (१६६) से इयँङ् हो जाता है।
चतुर्थी के एकवचन 'श्री+ए' मे यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) सूत्र से प्राप्त
नदीसञ्ज्ञा का नेयँङुवँङ्० (२२६) से निषेध हो जाता है। पुन. ङिति ह्रस्वश्च (२२२)
से विकल्प कर के नदीसञ्ज्ञा हो जाती है। नदीसञ्ज्ञा के पक्ष मे आट् का आगम,
१. ध्यान रहे कि नदीसञ्ज्ञा का निषेध केवल वहा ही नही होता जहा इयँट् उवँङ्
आदेश होते हैं । किन्तु इयँडुवँङ्स्थानी शब्द मे अन्यत्र भी- जहा इयँङ् उवँङ्
नही होते - निषेध हो जाता है । यथा- 'श्री' शब्द मे इयँङ् तो अजादि विभ-
क्तियो मे होता है परन्तु नदीसञ्ज्ञा का निषेध बजादियो मे तथा अन्यत्र सम्बुद्धि
में भी हो ज्ञाता है।

अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ३१३
वृद्धि और इयङ् हो कर 'श्रियै' बनता है। नदीत्व के अभाव में केवल इयङ् हो कर
—'श्रिये'। इस प्रकार ङे में 'श्रियै, श्रिये' ये दो रूप सिद्ध होते हैं।
पञ्चमी वा षष्ठी के एकवचन 'श्री + अस्' में पूर्ववत् नदीसञ्ज्ञा का निषेध
हो पुनः विकल्प हो जाता है। नदीत्वपक्ष में आट्, वृद्धि और इयङ् हो कर—'श्रियाः'।
नदीत्व के अभाव में केवल इयङ् हो कर—'श्रियः' सिद्ध होता है। इस प्रकार ङसिँ
और ङस् में 'श्रियाः, श्रियः' ये दो रूप निष्पन्न होते हैं।
षष्ठी के बहुवचन 'श्री + आम्' में यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) से प्राप्त नित्य-
नदीत्व का नेयँङुवँङ्० (२२६) से निषेध हो जाता है। आम् के ङित् न होने से ङिति
ह्रस्वश्च (२२२) द्वारा नदीत्व का विकल्प नहीं हो सकता। इस पर अग्रिमसूत्र द्वारा
नदीसञ्ज्ञा का विकल्प करते हैं—
[लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(२३०) वाऽऽमि ।१।४।५॥
इयँङुवँङ्स्थानौ स्त्र्याख्यौ यू आमि वा नदीसञ्ज्ञौ स्तः, न तु स्त्री।
श्रीणाम्, श्रियाम्। श्रियाम्, श्रियि ॥
अर्थः—जिन के स्थान पर इयङ् उवङ् आदेश होते हैं, ऐसे नित्यस्त्रीलिङ्ग
ईकार ऊकार आम् परे होने पर विकल्प कर के नदीसञ्ज्ञक हों। परन्तु यह नियम
स्त्रीशब्द में प्रवृत्त नहीं होता।
व्याख्या—इयँङुवँङ्स्थानौ ।१।२। (नेयँङुवँङ्० से)। स्त्र्याख्यौ ।१।२। यू ।
१।२। नदी ।१।१। (यू स्त्र्याख्यौ नदी से)। वा इत्यव्ययपदम्। आमि ।७।१। अर्थः—
(इयँङुवँङ्स्थानौ) जिन के स्थान पर इयङ् उवँङ् आदेश होते हैं, ऐसे (स्त्र्याख्यौ)
नित्यस्त्रीलिङ्ग (यू) ईकार ऊकार (आमि) आम् परे होने पर (वा) विकल्प कर के
(नदी) नदीसञ्ज्ञक होते हैं।
'श्री + आम्' यहां इयँङ्स्थानी नित्यस्त्रीलिङ्ग ईकार की आम् परे रहते प्रकृत
सूत्र से विकल्प कर के नदीसञ्ज्ञा हो जाती है। नदीसञ्ज्ञापक्ष में नद्यन्त होने से
ह्रस्वनद्यापः० (१४८) से नुट् और अट्कुप्वाङ्० (१३८) से नकार को णकार करने
से 'श्रीणाम्' और अभावपक्ष में अचि श्नु० (१६६) से इयङ् हो कर 'श्रियाम्' प्रयोग
सिद्ध होता है।
सप्तमी के एकवचन 'श्री + ङि' में ङिति ह्रस्वश्च (२२२) से नदीसञ्ज्ञा के
विकल्प होने से नदीत्वपक्ष में ङेराम्० (१६८) सूत्र से ङि को आम् आदेश हो कर
आट् आगम, वृद्धि और इयङ् करने से—'श्रियाम्'। नदीत्वाभाव में केवल इयङ् आदेश
हो कर 'श्रियि' प्रयोग बनता है। श्रीशब्द की रूपमाला यथा—
प्रथमा श्रीः श्रियौ श्रियः
द्वितीया श्रियम् " "
तृतीया श्रिया श्रीभ्याम् श्रीभिः
चतुर्थी श्रियै, श्रिये " श्रीभ्यः
पञ्चमी श्रियाः, श्रियः " "

३१४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
षष्ठी श्रिया, श्रियः श्रियोः श्रीणाम्, श्रियाम्
सप्तमी श्रियाम्, श्रियि ,, श्रीषु
सम्बोधन हे श्रीः ! हे श्रियौ ! हे श्रियः !
इसी प्रकार धी (बुद्धि), ह्री (लज्जा), भी (डर) शब्दों के रूप बनेंगे ।
विशेष ज्ञातव्य —
(१) ध्यान रहे कि नदीसञ्ज्ञा का उपयोग केवल ‘ङे, ङसिँ, ङस्, ङि, आम्
और सम्बुद्धि' इन छः स्थानों पर ही होता है ।
(२) जिस शब्द में इयङ् उवङ् आदेश होते हों उस में प्रथम नेयङुवङ्-
स्थानावस्त्री (२२६) सूत्र से सर्वत्र छः स्थानो पर नदीसञ्ज्ञा का निषेध
हो जाता है ।
(३) नदीत्व के निषेध के बाद ङिद्वचनों तथा आम् में क्रमशः ङिति ह्रस्व-
श्च (२२२) और वाऽऽमि (२३०) सूत्रों से नदीत्व का विकल्प हो जाता है।
(४) शेष सम्बुद्धि ही बच रहती है जिस में वैसे का वैसा नदीत्वनिषेध बना
रहता है । इस प्रकार नेयङुवङ्० (२२६) केवल सम्बुद्धि में ही चरि-
तार्थ होता है ।
(५) इन नियमों से स्त्रीशब्द प्रभावित नहीं होता; क्योंकि सर्वत्र 'अस्त्री'
कहा गया है । अतः स्त्रीशब्द यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) से नित्य नदी-
सञ्ज्ञक है ।
(यहां ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।)
— : ० : — (
अब उकारान्त स्त्रीलिङ्ग 'धेनु' (गाय) शब्द का वर्णन करते हैं—
[लघु०] धेनुर्मतिवत् ॥
व्याख्या—'धेनु'शब्द की प्रक्रिया 'मति'शब्दवत् होती है । रूपमाला यथा—
प्र० धेनुः धेनू धेनवः | प० धेन्वाः, धेनोः धेनुभ्याम् धेनुभ्यः
द्वि० धेनुम् ,, धेनूः | ष० ,, ,, धेन्वोः धेनूनाम्
तृ० धेन्वा धेनुभ्याम् धेनुभिः | स० धेन्वाम्, धेनौ ,, धेनुषु
च० धेन्वं, धेनवे ,, धेनुभ्यः | सं० हे धेनो ! हे धेनू ! हे धेनव !
स्त्रीलिङ्ग होने के कारण घिसञ्ज्ञा होने पर भी आङो नाऽस्त्रियाम् (१७१)
द्वारा टा को ना नहीं होता ।
ङिद्वचनों में ङिति ह्रस्वश्च (२२२) द्वारा नदीसञ्ज्ञा का विकल्प हो जाता
है । नदीत्वपक्ष में नदीकार्य होते हैं । यथा--ङे में आट् का आगम और वृद्धि हो कर
यण् (१५) हो जाता है । ङसिँ और ङस् मे भी ऐसा ही होता है । ङि मे इदुद्भ्याम्
(२२३) से ङि को आम् आदेश, आट् और वृद्धि हो कर यण् (१५) हो जाता है ।
नदीत्वाभाव में ङिद्वचनों की प्रक्रिया 'शम्भु' शब्द के समान होती है ।

अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ३१५
संस्कृतसाहित्य में उदन्त स्त्रीलिङ्ग शब्द बहुत कम हैं। फिर भी हम कुछ
शब्दों का सङ्ग्रह यहां दे रहे हैं [ * यह चिह्न णत्वप्रक्रिया का ज्ञापक है ] ।
शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ
अचिरांशु = बिजली | काकु = स्वर-विकृति | रेणु³ = धूल
अभ्रमु* = ऐरावतपत्नी | कुहू = कोयलध्वनि | वार्त्ताकु = बैंगन
अलावू = लताविशेष | खर्जू = खुजली | वितद्रु* = एक नदी
इर्वारु* = ककड़ी | गण्डु = तकिया, गांठ | शतद्रु* = सतलुज
उडु¹ = नक्षत्र, तारा | चञ्चु = चोंच | सरयू* = एक नदी
कच्छु = रोग-विशेष | जम्बू = जामुन | सिन्धु = सिन्ध नदी
कण्डू = खुजली | तनु = शरीर | स्नायु = नस
कन्दु² = कड़ाही | दनु = दैत्य-माता | हनु = ठोड़ी
करेणु = हथिनी | रज्जु = रस्सी |
अब उकारान्त स्त्रीलिङ्ग ‘क्रोष्टु’ (गीदड़ी) शब्द का वर्णन करते हैं—
[लघु०] अतिदेश-सूत्रम्—(२३१) स्त्रियाञ्च ।७।१।९६॥
स्त्रीवाची क्रोष्टुशब्दस्तृजन्तवद् रूपं लभते ॥
अर्थः—स्त्रीवाची क्रोष्टुशब्द तृजन्त के सदृश रूप को प्राप्त होता है, अर्थात्
स्त्रीलिङ्ग में ‘क्रोष्टु’ के स्थान पर ‘क्रोष्टृ’ आदेश हो जाता है ।
व्याख्या—स्त्रियाम् ।७।१। च इत्यव्ययपदम् । क्रोष्टुः ।१।१। तृज्वत् इत्यव्यय-
पदम् । (तृज्वत्क्रोष्टुः से) । तृचा तुल्यम् = तृज्वत्, तृजन्तवदित्यर्थः । अर्थः—(स्त्रि-
याम्) स्त्रीलिङ्ग में (च) भी (क्रोष्टुः) क्रोष्टु शब्द (तृज्वत्) तृजन्त के समान
होता है ।
अर्थकृत आन्तर्य (सादृश्य) द्वारा क्रोष्टु के स्थान पर क्रोष्टृ ही आदेश होता
है । अन्य कोई तृजन्त नहीं होता ।
क्रोष्टु के स्थान पर क्रोष्टृ आदेश हो जाने पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२३२) ऋन्नेभ्यो ङीप् ।४।१।५॥
ऋदन्तेभ्यो नान्तेभ्यश्च स्त्रियां ङीप् । क्रोष्ट्री गौरीवत् ॥
अर्थः—स्त्रीलिङ्ग में ऋदन्त और नकारान्त शब्दों से परे ङीप् प्रत्यय हो ।
व्याख्या—स्त्रियाम् ।७।१। (यह अधिकृत है) । प्रातिपदिकेभ्यः ।५।३।
(ङ्याप्प्रातिपदिकात् से वचनविपरिणाम द्वारा) । ऋन्नेभ्यः ।५।३। ङीप् ।१।१। समासः
—ऋतश्च नाश्च = ऋन्नाः, तेभ्यः = ऋन्नेभ्यः । इतरेतरद्वन्द्वः । नकारादकार उच्चा-
१. क्लीबत्वमपीष्टम् । नक्षत्रमृक्षं भं तारा तारकाऽप्युडु वा स्त्रियाम् इत्यमरः ।
२. पुंस्त्वमपीष्टम् । ना कन्दुर्व्वा स्वेदनी स्त्रियाम् इत्यमरः ।
३. अस्य पुंस्त्वमपि । रेणुर्द्वयोः स्त्रियां धूलिः इत्यमरः ।

३१६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
रणार्थ । 'ऋन्नेभ्य' स तदन्तविधि हो जाने से 'ऋदन्तनान्तेभ्य' बन जाता है। अर्थ —
(ऋन्नेभ्य ) ऋदन्त और नकारान्त (प्रातिपदिकेभ्य ) प्रातिपदिकों से परे (स्त्रियाम्)
स्त्रीत्व की विवक्षा मे (ङीप्) ङीप् प्रत्यय हो जाता है।
ऋदन्त प्रातिपदिकों से यथा—कर्तृ + ङीप् = कर्तृ + ई = कर्त्री । हर्तृ + ङीप्
= हर्तृ + ई = हर्त्री । नकारान्त प्रातिपदिकों से यथा—दण्डिन् + ङीप् = दण्डिन् + ई
= दण्डिनी । योगिन् + ङीप् = योगिन् + ई = योगिनी ।
'क्रोष्टु' शब्द ऋदन्त है, अत ङीप् प्रत्यय हो गया । 'ङीप्' का 'ई' शेष रहता
है। ङकार की लशक्यतद्धिते (१३६) से और पकार की हलन्त्यम् (१) से इत्सञ्ज्ञा
हो जाती है। तब 'क्रोष्ट् + ई' इस स्थिति मे यण् आदेश हो कर 'क्रोष्ट्री' यह ईका-
रान्त शब्द बन जाता है। ङीन्त होने से क्रोष्ट्री शब्द के रूप गौरीशब्दवत् होते हैं।
रूपमाला यथा—
प्र० क्रोष्ट्री क्रोष्ट्र्यौ क्रोष्ट्र्यः | प० क्रोष्ट्या क्रोष्ट्रीभ्याम् क्रोष्ट्रीभ्यः
द्वि० क्रोष्ट्रीम् " क्रोष्ट्रीः | प० " क्रोष्ट्र्योः क्रोष्ट्रीणाम्
तृ० क्रोष्ट्या क्रोष्ट्रीभ्याम् क्रोष्ट्रीभिः | स० क्रोष्ट्याम् " क्रोष्ट्रीषु
च० क्रोष्ट्र्यै " क्रोष्ट्रीभ्यः | स० हे क्रोष्ट्रि! हे क्रोष्ट्र्यौ! हे क्रोष्ट्र्यः!
इसी प्रकार—कर्त्री (करने वाली), धात्री (धारण करने वाली), पात्री
(पालन करने वाली) प्रभृति शब्दों के रूप होते हैं।
(यहाँ उकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।)
---------------- ० ----------------
[लघु०] भ्रूः श्रीवत् ॥
व्याख्या—भ्रमुँ अनवस्थाने (दिवा० प०) धातु से भ्रमेरून् डूः (उणा० २२६)
सूत्र द्वारा डू प्रत्यय कर टिलोप करने से 'भ्रू' (भौँ) शब्द निष्पन्न होता है। भ्रूशब्द
के रूप श्रीशब्द के समान बनेंगे। अचि श्नुधातुभ्रुवाम्० (१६६) सूत्र मे विशेष उल्लेख
के कारण इस म उवङ् आदेश होगा। इस मे उवङ् की स्थिति होने से प्रथम नेयङु-
र्वस्थान्० (२२६) द्वारा नदीसञ्ज्ञा का निषेध हो कर तदनन्तर ङित् वचनों मे ङिति
ह्रस्वश्च (२२) तथा आम् मे वाऽऽमि (२३०) मे नदीत्व का विकल्प हो जाने से 'श्री'
शब्द के समान प्रक्रिया होगी। रूपमाला यथा—
प्रथमा भ्रूः भ्रुवौ भ्रुवः
द्वितीया भ्रुवम् " "
तृतीया भ्रुवा भ्रूभ्याम् भ्रूभिः
चतुर्थी भ्रुवै, भ्रुवे " भ्रूभ्यः
पञ्चमी भ्रुवाः, भ्रुवः " "
षष्ठी " " भ्रुवोः भ्रूणाम्, भ्रुवाम्

अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ३१७
सप्तमी भ्रुवाम्, भ्रुवि भ्रुवोः भ्रुषु
सम्बोधन हे भ्रूः! हे भ्रुवौ! हे भ्रुवः!
इसी प्रकार भू (पृथ्वी) शब्द के रूप होते हैं।
[लघु०] स्वयम्भूः पुंवत् ॥
अर्थः—स्वयम्भूशब्द पुंलिङ्ग 'स्वयम्भू' के समान होता है।
व्याख्या—स्वयम्भू शब्द नित्यस्त्रीलिङ्ग नहीं, किन्तु विशेष्यलिङ्ग के आश्रित
है। अतः इस की यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) से नदीसञ्ज्ञा नहीं होती। ओः सुंपि
(२१०) से प्राप्त यण् का न भूसुधियोः(२०२) से निषेध हो कर अचि श्नु०(१६६)
से उवँङ् हो जाता है। रूपमाला यथा—
स्वयम्भू (देवी, आदि शक्ति)
प्रथमा स्वयम्भूः स्वयम्भुवौ स्वयम्भुवः
द्वितीया स्वयम्भुवम् " "
तृतीया स्वयम्भुवा स्वयम्भूभ्याम् स्वयम्भूभिः
चतुर्थी स्वयम्भुवे " स्वयम्भूभ्यः
पञ्चमी स्वयम्भुवः " "
षष्ठी " स्वयम्भुवोः स्वयम्भुवाम्
सप्तमी स्वयम्भुवि " स्वयम्भूषु
सम्बोधन हे स्वयम्भूः ! हे स्वयम्भुवौ ! हे स्वयम्भुवः !
नोट—वधू (बहू), जम्बू (जामुनवृक्ष), चमू (सेना), चञ्चू (चोंच), तनू
(शरीर), चम्पू (गद्यपद्यमिश्रित काव्य), श्वश्रू (सास), गुग्गुलू (गूगल), कमण्डलू
(कमण्डल), वामोरू (सुन्दर पट्टों वाली स्त्री), संहितोरू (सटी हुई जांघों वाली),
कद्रू (सर्पों की माता), कर्कन्धू (बेर) आदि शब्दों की प्रक्रिया गौरीशब्दवत् होती है।
केवल ङ्यन्त न होने से सुँलोप नहीं होता। निदर्शनार्थ 'वधू' शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० वधूः वध्वौ वध्वः | प० वध्वाः वधूभ्याम् वधूभ्यः
द्वि० वधूमू " वधूः | प० " वध्वोः वधूनाम्
तृ० वध्वा वधूभ्याम् वधूभिः | स० वध्वाम् " वधुषु
च० वध्वै " वधूभ्यः | सं० हे वधु! हे वध्वौ! हे वध्वः!
(यहां ऊकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।)
—:: o ::—
अब ऋदन्त स्त्रीलिङ्गों का वर्णन करते हैं। स्वसृ (बहन) आदि ऋदन्त
शब्दों से स्त्रीलिङ्ग में ऋन्नेभ्यो ङीप् (२३२) से ङीप् प्राप्त होता है। इस का अग्रिम-
सूत्र से निषेध करते हैं—
[लघु०] निषेध-सूत्रम्—(२३३) न षट्-स्वस्रादिभ्यः ।४।१।१०॥

३१८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
ङीप्टापौ न स्तः ॥
स्वसा तिस्रश्चतस्रश्च ननान्दा दुहिता तथा ।
याता मातेति सप्तैते स्वस्रादय उदाहृताः ॥
स्वसा । स्वसारौ ॥
अर्थ—षट्संज्ञकों तथा स्वसृ आदियों से परे ङीप् और टाप् नहीं होते ।
स्वसृ आदियों का कारिका में परिगणन करते हैं—१ स्वसृ (बहन), २
तिसृ (त्रि को स्त्रीलिङ्ग में हुआ आदेश), ३ चतसृ (चतुर् को स्त्रीलिङ्ग में हुआ
आदेश), ४ ननान्दृ (पति की बहन, ननन्द), ५ दुहितृ (लड़की), ६ यातृ (पति
के भाई की पत्नी), ७ मातृ (माता)—ये सात शब्द स्वस्रादि कहे गये हैं ।
व्याख्या—न इत्यव्ययपदम् । षट्स्वस्रादिभ्यः ।५।३। ङीप् ।१।१। (ऋन्नेभ्यो
ङीप् से) । टाप् ।१।१। (अजाद्यतष्टाप् से) । समास—षट् च स्वस्रादयश्च = षट्-
स्वस्रादयः, तेभ्यः = षट्स्वस्रादिभ्यः, इतरेतरद्वन्द्वः । अर्थ—(षट्स्वस्रादिभ्यः)
षट्सञ्ज्ञकों तथा स्वसृ आदि शब्दों से परे (ङीप्) ङीप् और (टाप्) टाप् (न) नहीं
होते । स्वस्रादिगण मूल में श्लोकबद्ध दे दिया गया है । षट्सञ्ज्ञा आगे (२६७) सूत्र
द्वारा षष्, पञ्चन्, सप्तन् आदि शब्दों की कही गई है ।
‘स्वसृ’ शब्द की प्रक्रिया अजन्तपुंलिङ्गोक्त ‘धातृ’ शब्द के समान होती है। केवल
शस् में सकार को नकार नहीं होता—‘स्वसॄः’ । रूपमाला यथा—
प्र० स्वसा* स्वसारौ स्वसारः† प० स्वसुः‡ स्वसृभ्याम् स्वसृभ्यः
द्वि० स्वसारम् ,, † स्वसॄः प० ,, ‡ स्वस्रोः स्वसॄणाम्
तृ० स्वस्रा स्वसृभ्याम् स्वसृभिः स० स्वसरि✓ ,, स्वसृषु
च० स्वस्रे ,, स्वसृभ्यः स० हे स्वसः! हे स्वसारौ! हे स्वसारः!

  • अनडुदानस्० (२०५) से अनँङ्, अप्तृन्तृच्स्वसृ० (२०६) से उपधादीर्घ,
    हल्ङ्याब्भ्य० (१७६) से सकारलोप तथा न लोप० (१८०) से नकारलोप ।
    † ऋतो ङि० (२०४) से गुण तथा अप्तॄन्० (२०६) से उपधादीर्घ ।
    ‡ ऋत उत् (२०८) से उत्, रात्सस्य (२०६) से सकारलोप ।
    ✓ऋतो ङि० (२०८) से गुण, रपर ।
    ✕ऋतो ङि० (२०४) से गुण, हल्ङ्याब्भ्य० (१७६) से सुंलोप ।
    [लघु०] माता पितृवत् । शसि—मातृः ॥
    व्याख्या—मातृ (माता) शब्द की प्रक्रिया अजन्तपुंलिङ्गोक्त ‘पितृ’ शब्दवत्
    होती है । केवल शस् में नत्व न होने से ‘मातृः’ यह विशेष है । रूपमाला यथा—
    प्र० माता मातरो मातरः प० मातुः मातृभ्याम् मातृभ्यः
    द्वि० मातरम् ,, मातृः प० ,, मात्रोः मातृणाम्
    तृ० मात्रा मातृभ्याम् मातृभिः स० मातरि ,, मातृषु
    च० मात्रे ,, मातृभ्यः स० हे मातः! हे मातरौ! हे मातरः!

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३१६
इसी प्रकार—ननान्दृ, दुहितृ और यातृ शब्दों के उच्चारण होते हैं।
(यहां ऋदन्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।)
---::०::---
[लघु०] द्यौर्गोवत् ॥
व्याख्या—'द्यो' शब्द का अर्थ आकाश वा स्वर्ग है। द्यौः स्त्री स्वर्गन्तरिक्षयोः
इत्यौणादिकपदार्णवे पेरुसूरिः। द्युतैं दीप्तौ (भ्वा० आ०) धातु से बहुल के कारण
औणादिक 'डो' प्रत्यय करने से 'द्यो' शब्द निष्पन्न होता है। इस की प्रक्रिया अजन्त-
पुंल्लिङ्गस्थ 'गो' शब्द के समान होती है। रूपमाला यथा—
प्र० द्यौः† द्यावौ† द्यावः† प० द्योः* द्योभ्याम् द्योभ्यः
द्वि० द्याम्‡ ,, द्याः‡ प० ,, * द्यवोः द्यवाम्
तृ० द्यवा द्योभ्याम् द्योभिः स० द्यवि ,, द्योषु
च० द्यवे ,, द्योभ्यः सं० हे द्यौः! हे द्यावौ! हे द्यावः!
† गोतो णित् (२१३) से णित्त्व हो कर अचो ञ्णिति (१८२) से वृद्धि।
‡ औतोऽम्शसोः (२१४) से आकार एकादेश।

  • ङसिँ-ङसोश्च (१७३) से पूर्वरूप एकादेश।
    इसी प्रकार स्त्रीलिङ्ग गो (गाय) शब्द का उच्चारण होता है।
    (यहां ओकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।)
    ---::०::---
    [लघु०] राः पुंवत् ॥
    व्याख्या—'रै' शब्द पुंलिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग दोनों में प्रयुक्त होता है। स्त्री-
    लिङ्ग में भी प्रक्रिया पुंलिङ्ग के समान होती है। रूपमाला यथा—
    प्र० राः रायौ रायः प० रायः राभ्याम् राभ्यः
    द्वि० रायम् ,, ,, प० ,, रायोः रायाम्
    तृ० राया राभ्याम् राभिः स० रायि ,, रासु
    च० राये ,, राभ्यः सं० हे राः! हे रायौ! हे रायः!
    हलादि विभक्तियों में रायो हलि (२१५) से ऐकार को आकार आदेश तथा
    अजादि विभक्तियों में एचोऽयवायावः (२२) से आय् आदेश हो जाता है।
    (यहां ऐकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।)
    ---::०::---
    [लघु०] नौर्ग्लौवत् ॥
    व्याख्या—णुद प्रेरणे (तुदा० प०) धातु से ग्ला-नुदिभ्यां डौः (उणा० २२२)
    सूत्र द्वारा डौ प्रत्यय हो कर टि का लोप करने से 'नौ' (नौका) शब्द निष्पन्न होता
    है। इस की समग्र प्रक्रिया अजन्तपुंलिङ्गान्तर्गत 'ग्लौ' शब्द के समान होती है।
    रूपमाला यथा—

३२० | भैमीव्याख्योपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
प्र० नौ नावौ नाव | प० नाव नौभ्याम् नौभ्य
द्वि० नावम् ,, ,, | ष० ,, नावो नावाम्
तृ० नावा नौभ्याम् नौभि | स० नावि ,, नौषु
च० नावे ,, नौभ्य | स० हे नौ ! हे नावौ ! हे नाव !
अजादिविभक्तियों में एचोऽयवायाव (२२) से आव् आदेश हो जाता है।
(यहाँ औकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।)
[लघु०] इत्यजन्ता स्त्रीलिङ्गा [शब्दा ] ॥
अर्थ—यहाँ 'अजन्तस्त्रीलिङ्ग' शब्द समाप्त होते हैं।
अभ्यास (३५)
(१) क्या कारण है कि इयङ्स्थानी होने पर भी 'स्त्री' शब्द में नदीसञ्ज्ञा का निषेध नहीं होता ?
(२) 'रमायै' में आटश्च सूत्र क्यों प्रवृत्त नहीं होता ?
(३) क्या कारण है कि अजन्त स्त्रीलिङ्ग प्रकरण में ह्रस्व अकारान्त शब्दों का वर्णन नहीं किया गया ?
(४) 'औङ्' किसे कहते हैं, उस का किस सूत्र में उल्लेख आया है ?
(५) मत्याम्, धेन्वाम् आदि में ङि को आम् करने के लिये डेराम्० के विद्यमान रहते इदुद्भ्याम् क्यों बनाना पड़ा ? स्पष्ट करें।
(६) लिङ्गविशिष्टपरिभाषा का सोदाहरण विवेचन करें।
(७) गुणदीर्घौत्वानांमपवाद का तात्पर्य उदाहरणप्रदर्शनपूर्वक व्यक्त करें।
(८) निम्नस्थ रूपों की ससूत्र सिद्धि करते हुए वैकल्पिक रूप भी लिखें—
१ तिस्र । २ मातृ । ३ द्यौ । ४ अवक् । ५ रमयो । ६ स्त्रियम् ।
७ श्रीणाम् । ८ मतौ । ६ द्वे । १० स्त्रिय । ११ मत्यै । १२ उत्तरपूर्वायाम् । १३ श्री । १४ रमायाम् । १५ स्त्रियौ । १६ द्यो । १७ रमे । १८ स्वसारौ । १६ भ्रुवाम् । २० क्रोष्ट्री ।
(६) 'हे श्री' में इयङ् आदेश न होने पर भी कैसे नेयैङुवँ० प्रवृत्त होता है?
(१०) स्त्रीलिङ्गी उन ईदन्तशब्दों का निर्देश करें जिन में सुंलोप नहीं होता ।
(११) स्त्री, भ्रू, धेनु लक्ष्मी, स्वसृ, श्री—शब्दों की रूपमाला लिखें।
(१२) सूत्रों की व्याख्या करें—
अचि र ऋत , नेयैङुवँस्थान्०, ङिति ह्रस्वश्च, वाऽमि, इदुद्भ्याम् ।
————— ० —————
इति भैमीव्याख्योपेतायां लघु-सिद्धान्त-
कौमुद्यामजन्त-स्त्रीलिङ्ग-
प्रकरणं समाप्तम् ॥

अथाऽजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम्

अब क्रमप्राप्त अजन्तनपुंसक शब्दों का विवेचन करते हैं। सर्वप्रथम अदन्त
शब्दों का वर्णन प्रारम्भ होता है—
ज्ञा अवबोधने (क्रया० प०) धातु से ल्युट् प्रत्यय कर यु को अन आदेश करने
से 'ज्ञान' (जानना) शब्द निष्पन्न होता है। कृदन्तत्वात् प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो कर इस
से स्वादिप्रत्ययों की उत्पत्ति होती है। प्रथमा के एकवचन 'ज्ञान + स्' (सुँ) में अग्रिम
सूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२३४) अतोऽम् ७।१।२४॥
अतोऽङ्गात् क्लीबात् स्वमोborderम्। अमि पूर्वः (१३५)—ज्ञानम्। एङ्-
ह्रस्वाद्० (१३४) इति हल्लोपः—हे ज्ञान!॥
अर्थः—अदन्त नपुंसक अङ्ग से परे सुँ और अम् को अम् आदेश हो।
व्याख्या—अतः ।५।१। अङ्गात् ।५।१। (अङ्गस्य इस अधिकृत का वचनविपरि-
णाम द्वारा)। नपुंसकात् ।५।१। स्वमोः ।६।२। (स्वमोर्नपुंसकात् से)। अम् ।१।१।
समासः—सुश्च अम् च = स्वमौ, तयोः = स्वमोः, इतरेतरद्वन्द्वः। 'अङ्गात्' का विशेषण
होने से 'अतः' से तदन्तविधि हो कर 'अदन्ताद् अङ्गात्' बन जाता है। अर्थः—(अतः
= अदन्तात्) अदन्त (नपुंसकात्) नपुंसक (अङ्गात्) अङ्ग से परे (स्वमोः) सुँ और
अम् के स्थान पर (अम्) अम् आदेश हो। अनेकाल् होने से अम् आदेश अनेकाल्र्शित्
सर्वस्य (४५) द्वारा सर्वादेश होगा।
स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) सूत्र से नपुंसक में सुँ और अम् का लुक् प्राप्त था;
ह्रस्व अकारान्त शब्दों में यह सूत्र उस का बाध करता है। अम् को अम् इसीलिये
विधान किया गया है। द्विर्बद्धं सुबद्धं भवति।
१. कई लोग अतोम् सूत्र का 'अतः ।६।१। म् ।१।१।' इस प्रकार पदच्छेद करते हुए
—अदन्त नपुंसक अङ्ग से परे सुँ और अम् को 'म्' आदेश हो—ऐसा अर्थ करते
हैं। इस प्रकार सुँ में सकार को 'म्' आदेश हो कर—'ज्ञानम्' प्रयोग ठीक सिद्ध
हो जाता है। अम् के विषय में आदेः परस्य (७२) परिभाषा द्वारा अम् के आदि
अकार को मकार हो कर 'संयोगान्तलोप करने से 'ज्ञानम्' भी सिद्ध हो जाता है।
किञ्च सम्बुद्धि में प्रक्रिया अतीव सरल हो जाती है अर्थात् ज्योंही सम्बुद्धि के
सकार को मकार करते हैं त्योंही एङ्ह्रस्वात् सम्बुद्धेः (१३४) से उस का लोप
हो जाता है, अन्तादिवच्च (४१) से पूर्वान्तवद्भाव की कल्पना का कष्ट नहीं
उठाना पड़ता। परन्तु शेखरकार आदियों ने इस मत की खूब आलोचना की है।
उन का कथन है कि 'म्' आदेश मानने पर 'ज्ञानम्' आदियों में सुंपि च (१४१)
से दीर्घ प्राप्त होगा जो अनिष्ट है। किञ्च एङ्ह्रस्वात्० (१३४) के भाष्य से
स्पष्ट प्रतीत होता है कि भाष्यकार 'अम्' आदेश ही मानते हैं 'म्' आदेश नहीं।
ल० प्र० (२१)

३२२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
'ज्ञान+सु' यहां प्रकृतसूत्र से सुं को अम् आदेश हो कर अमि पूर्व (१३५)
से पूर्वरूप करने पर—ज्ञान् अ म् = 'ज्ञानम्' प्रयोग सिद्ध होता है ।
ध्यान रहे कि 'सुं' विभक्तिमञ्ज्ञक है अतः इस के स्थान पर आदेश होने वाला
अम् भी विभक्तिमञ्ज्ञक होगा । अत एव हलन्त्यम् (१) द्वारा प्राप्त अम् के मकार
की इत्सञ्ज्ञा का न विभक्तौ तुस्मा (१३१) से निषेध हो जायेगा ।
सम्बुद्धि में 'हे ज्ञान+स्' इस स्थिति में परत्व के कारण सम्बुद्धिलोप का बाध
कर प्रकृतसूत्र से सुं को अम् आदेश हो कर अमि पूर्व (१३५) से पूर्वरूप करने पर
'ज्ञानम' हुआ। पुनः एङ्ह्रस्वात्सम्बुद्धे (१३४) से सम्बुद्धि के हल्—मकार का लोप
करने पर 'हे ज्ञान' प्रयोग सिद्ध होता है¹ ।
प्रथमा के द्विवचन में 'ज्ञान+औ' इस स्थिति में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२३५) नपुंसकाच्च ॥७।१।१९॥
क्लीबाद् औडः शी स्यात् । भसञ्ज्ञायाम्—
अर्थ—नपुंसक अङ्ग से परे 'औ' को 'शी' आदेश हो जाता है । भसञ्ज्ञा करने
पर (अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है ।)
व्याख्या—नपुंसकात् ।५।१। च इत्यव्ययपदम् । अङ्गात् ।५।१। (अङ्गस्य इस
अधिकृत का वचनविपरिणाम हो जाता है) । औङः ।६।१। (औङ आपः से) । शी
।१।१। (जसः शी से) । अर्थ—(नपुंसकात्) नपुंसक (अङ्गात्) अङ्ग से परे (औङः)
औङ् के स्थान पर (शी) शी आदेश हो । प्रथमा तथा द्वितीया के द्विवचन की औङ्
सञ्ज्ञा है—यह पीछे औङ आपः (२१६) सूत्र पर लिख चुके हैं ।
'ज्ञान+औ' यहां शी आदेश हो अनुबन्धलोप करने से 'ज्ञान+ई' हुआ । अत्र
'ई' यह 'औ' के स्थान पर आदेश होने के कारण स्थानिवद्भावेन स्वादि है । सुडनपुंस-
कस्य (१६३) से नपुंसक का वर्जन होने से सर्वनामस्थान भी नहीं । किञ्च यह
अजादि भी है अतः इस के परे होने पर यचि भम् (१६५) से ज्ञानशब्द की भसञ्ज्ञा
हो अग्रिमसूत्र द्वारा नकारोत्तर अकार का लोप प्राप्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(२३६) यस्येति च ॥६।४।१४८॥
ईकारे तद्धिते च परे भस्येवर्णावर्णयोर्लोपः । इत्यल्लोपे प्राप्ते—
अर्थ—ईकार या तद्धित परे होने पर भसञ्ज्ञक इवर्ण अवर्ण का लोप हो ।
व्याख्या—यस्य ।६।१। भस्य ।६।१। (यह अधिकृत है) । ईति ।७।१। च इत्य-
व्ययपदम् । तद्धिते ।७।१। (भस्तद्धिते से) । लोपः ।१।१। (अल्लोपोऽनः से) । समास
—इश्च अश्च = यम्, तस्य = यस्य, समाहारद्वन्द्वः । अर्थ—(ईति) ईकार (च)
अथवा (तद्धिते) तद्धित परे होने पर (भस्य) भसञ्ज्ञक (यस्य) इवर्ण अवर्ण का
१. हे ज्ञान्+म् = हे ज्ञान्+अम् = हे ज्ञान्+म् । यहां पूर्वरूप अकार को अन्तादि-
वच्च (८१) से पूर्व का अन्त मान लेने से 'ज्ञान' यह ह्रस्वान्त अङ्ग हो जाता
है । तब इस से परे सम्बुद्धि के हल् मकार का लोप हो जाता है ।