लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
DevanagariHindipublished633 पृष्ठ
पृष्ठ 324, कुल 633 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 324
अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ३०६
[लघु०] लक्ष्मीः । शेषं गौरीवत् ॥
व्याख्या—लक्ष दर्शनाङ्कनयोः (चुरा० उ०) धातु से लक्षेर्मुँट् च (उणा०
४४०) द्वारा ई प्रत्यय और मुँट् का आगम करने से 'लक्ष्मी' शब्द निष्पन्न होता है।
ङ्यन्त न होने से इस से परे हल्ङ्याब्भ्यो० (१७६) द्वारा सुंलोप नहीं होता । अन्य
विभक्तियों में गौरीशब्दवत् प्रक्रिया होती है। रूपमाला यथा--
प्र० लक्ष्मीः लक्ष्म्यौ लक्ष्म्यः | प० लक्ष्म्याः* लक्ष्मीभ्याम् लक्ष्मीभ्यः
द्वि० लक्ष्मीम् ,, लक्ष्मीः | प० ,,* लक्ष्म्योः लक्ष्मीणाम्*
तृ० लक्ष्म्या लक्ष्मीभ्याम् लक्ष्मीभिः | स० लक्ष्म्याम्* ,, लक्ष्मीषु
च० लक्ष्म्यै* ,, लक्ष्मीभ्यः | सं० हे लक्ष्मि !* हे लक्ष्म्यौ! हे लक्ष्म्यः!
- इन स्थानों पर नदीसञ्ज्ञा हो कर आट् आदि नदी-कार्य होते हैं।
[लघु०] एवं तरी-तन्त्र्यादयः ॥
अर्थः—तरी, तन्त्री आदि अन्य ईप्रत्ययान्त शब्दों के रूप भी लक्ष्मीशब्द के
समान होते हैं ।
व्याख्या—अवि-तृ-स्तृ-तन्त्रिभ्य ईः (उणा० ४३८) इस औणादिक सूत्र से १.
अवी (रजस्वला स्त्री), २. तरी (नौका), ३. स्तरी (घूम), ४. तन्त्री (वीणा)—
इन चार ईप्रत्ययान्त शब्दों की निष्पत्ति होती है। इन का उच्चारण भी लक्ष्मीशब्दवत्
होता है। ङ्यन्त न होने से इन में भी सुँलोप नहीं होता । इस विषय पर एक श्लोक
प्रसिद्ध है—
अवी-तन्त्री-तरी-लक्ष्मी-धी-ह्री-श्रीणामुणादिषु ।
सप्तस्त्रीलिङ्गशब्दानां न सुलोपः कदाचन ॥
परन्तु इन में 'स्तरी' और 'भी' (डर) शब्दों का उल्लेख नहीं, किञ्च ये सब
शब्द औणादिक भी नहीं हैं, अतः यह श्लोक संशोधित रूप से इस प्रकार पढ़ा जाना
चाहिये—
अवी-तन्त्री-स्तरी-लक्ष्मी-तरी-धी-ह्री-श्रियाम् भियः ।
अङ्यन्तत्वात् स्त्रियामेषां न सुलोपः कदाचन ॥१
भाविक सुन्दर भूमि । इस शब्द की यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) से नदीसञ्ज्ञा हो
जाती है । इस पर एक सुन्दर सुभाषित बहुत प्रसिद्ध है—
पाणिनेर्न नदी गङ्गा यमुना च स्थली नदी ।
प्रभुः स्वातन्त्र्यमापन्नो यदिच्छति करोति तत् ॥
अर्थात् पाणिनि ने गङ्गा और यमुना को तो 'नदी' नहीं माना किन्तु स्थली
(स्थलप्रदेश) को 'नदी' माना है । सत्य है समर्थ लोग स्वतन्त्र होते हैं, जो जी
में आता है कह देते है कोई रोकने वाला नहीं होता । [व्याकरणप्रेमी थोड़ा विचार
कर इस पद्य का आनन्द उठा सकते हैं ।]
१. यहां यह ज्ञातव्य है कि इन शब्दों से यदि कृदिकारादक्तिनः (वा० १०६) से
वैकल्पिक ङीप् करेंगे तो ङीपपक्ष में इन शब्दों से परे भी सुँलोप होने लगेगा ।
अत एव द्विरूपकोश में लक्ष्मीशब्द के प्रथमैकवचन में दोनों रूप उपलब्ध होते हैं
—लक्ष्मीर्लक्ष्मी हरप्रिया । परन्तु इन के ङीप्पक्षीय रूप प्रसिद्ध नहीं हैं ।