लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
पृष्ठ 320, कुल 633 में से
संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ३०५
प्र० ० ० तिस्रः | प० ० ० तिसृभ्यः
द्वि० ० ० " | प० ० ० तिसॄणाम्
तृ० ० ० तिसृभिः | स० ० ० तिसृषु
च० ० ० तिसृभ्यः | सम्बोधन नहीं होता।
इसी प्रकार चतुर् (चार) शब्द के स्त्रीलिङ्ग में रूप बनते हैं—चतस्रः २,
चतसृभिः, चतसृभ्यः २, चतसॄणाम्, चतसृषु । इसे हलन्तस्त्रीलिङ्गप्रकरण में देखें ।
[लघु०] द्वे २ । द्वाभ्याम् ३ । द्वयोः २ ॥
व्याख्या—'द्वि' (दो) शब्द द्वित्व का वाचक होने से सदा द्विवचनान्त प्रयुक्त
होता है । अब स्त्रीलिङ्ग में इस की प्रक्रिया दर्शाई जानी है ।
द्वि शब्द से प्रथमा या द्वितीया के द्विवचन में 'द्वि+औ' इस स्थिति में त्यदा-
दीनामः (१६३) सूत्र से विभक्ति परे होने के कारण इकार को अकार हुआ । तब
'द्व+औ' इस दशा में स्त्रीत्वविवक्षा में अदन्त होने के कारण अजाद्यतष्टाप् (१२४५)
सूत्र से टाप् प्रत्यय हुआ । टाप् के टकार और पकार इत्सञ्ज्ञक होने से लुप्त हो जाते
हैं । 'द्व आ+औ' इस स्थिति में सवर्णदीर्घ हो औङ आपः (२१६) से औ को शी
आदेश तथा आद् गुणः (२७) से गुण करने पर 'द्वे' रूप सिद्ध होता है ।
भ्याम् में त्यदाद्यत्व, टाप् और सवर्णदीर्घ हो कर—'द्वाभ्याम्' ।
ओस् में, त्यदाद्यत्व, टाप्, सवर्णदीर्घ, आकार को आङि चापः (२१८) से
एकार, अय् आदेश और सकार को रुत्व-विसर्ग हो कर—'द्वयोः'१ । रूपमाला यथा—
प्र० ० द्वे ० | प० ० द्वाभ्याम् ०
द्वि० ० " ० | प० ० द्वयोः ०
तृ० ० द्वाभ्याम् ० | स० ० " ०
च० ० " ० | सम्बोधन नहीं होता ।
(यहाँ पर ह्रस्व इकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।)
--------::०::--------
अब ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का वर्णन करते हैं—
[लघु०] गौरी । गौर्यौ । गौर्यः । हे गौरि! । गौर्यै । इत्यादि ॥
व्याख्या—गौर शब्द से षिद्गौरादिभ्यश्च (१२५१) सूत्र द्वारा ङीष् प्रत्यय
करने पर भसञ्ज्ञक अकार का लोप हो कर 'गौरी' शब्द निष्पन्न होता है । गौरी का
अर्थ 'पार्वती' है । नित्यस्त्रीलिङ्ग होने से यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) द्वारा इस की नदी-
सञ्ज्ञा हो जाती है ।
प्रथमा के एकवचन में 'गौरी + स्' इस अवस्था में ङ्यन्त होने से हल्ङ्याब्भ्यः०
(१७६) सूत्र से अपृक्त सकार का लोप हो कर 'गौरी' रूप बनता है ।
१. ध्यान रहे कि पुंलिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग के 'द्वाभ्याम्' और 'द्वयोः' की प्रक्रिया
भिन्न २ है ।
ल० प्र० (२०)