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लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 323

३०८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ
पौर्णमासी = पूर्णिमा | मैत्री* = मित्रता | वैतरणी = नरक की नदी
प्रणाली = तरीक़ा | मौर्वी* = धनुष-डोरी | वैदेही = सीता
प्रतीची = पश्चिमदिशा | यक्षी* = कुवेर-स्त्री | वैयासिकी = व्यास-रचना
प्रतोली = गली | यवनानी = यवनलिपि | व्याघ्री* = बाघिन
प्रसाधनी = कङ्घी | याज्ञसेनी = द्रौपदी | शतघ्नी = तोप
प्राची = पूर्वदिशा | यामिनी = रात्रि | शमी = शमी वृक्ष
बदरी* = बेर का वृक्ष | युवती = जवान स्त्री | शर्वरी* = रात्रि
बिसिनी = कमल का पौधा | रजनी = रात | शाटी = वस्त्र, साड़ी
भट्टिनी = महारानी | राक्षसी = राक्षस स्त्री | शुण्ठी = सोंठ
भवती = आप (स्त्री) | राजधानी = राजधानी | शुनी = कुतिया
भवानी = दुर्गा | राज्ञी = रानी | शैली = रीति
भागीरथी = गङ्गा | रुक्मिणी = कृष्ण पत्नी | श्रेणी = पङ्क्ति
भामिनी = कोपशीला | रुद्राणी = पार्वती | सखी = सहेली
भारती = संस्कृतभाषा | रेवती = बलराम पत्नी | सङ्ग्रहणी = एक रोग
भेरी* = बड़ा नगारा | रोहिणी = एक नक्षत्र | सपत्नी = सौकन
मञ्जरी* = कोंपल | लेखनी = कलम | सरस्वती = वाग्देवी
मन्त्रिणी = मन्त्री (स्त्री) | लेखिनी = कलम | सरोजिनी = कमल-समूह
मन्दाकिनी = स्वर्गङ्गा | वह्नियिनी = सेना | साध्वी = पतिव्रता
मर्कटी = बानरी | वसुमती = पृथ्वी | सिंहवाहिनी = दुर्गा
मषी = स्याही | वंशी = बांसुरी | सिंही = शेरनी
महती = बड़ी | वाणी = वाणी | सीमन्तिनी = स्त्री
महामारी* = प्लेग आदि | वापी = बावड़ी | सुन्दरी* = रूपवती
महिषी* = भैंस, पटरानी | वामी = घोटी | सूची = सूई
मही = पृथिवी | वायसी = कौवी | सूरी* = कुन्ती
मातामही = नानी | वाराणसी = बनारस | सैरन्ध्री* = दासी
मातुलानी = मामी | वारुणी = मद्य, पश्चिम | सौदामनी = विद्युत्
मातुली = मामी | वाहिनी = सेना, नदी | स्थली¹ = सुन्दर स्थल
मालती = चमेली (लता) | विदुषी* = पठित स्त्री | स्रोतस्वती = नदी
मुम्बापुरी* = बम्बई नगर | विभावरी* = रात्रि | हरिणी = हरनी
मुरली = बांसुरी | विष्णुपदी = गङ्गा | हरीतकी = हरड़
मृडानी = पार्वती | वीथी = रास्ता, गली | हसन्ती = अगीठी
मेदिनी = पृथिवी | वैजयन्ती = पताका | हिमानी = वरफ-समूह
| | ह्लादिनी = वज्र, विद्युत्
१ स्थलशब्द से जानपद-कुण्ड-गोण स्थल० (४।१।४२) सूत्रद्वारा ङीप् प्रत्यय कर नित्य-
स्त्रीलिङ्गी 'स्थली' शब्द निष्पन्न होता है। इस का अर्थ है—अकृत्रिम या स्वा-