काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
३।१६२] ५. दोष : (१०) देशादि-विरोध १६७
(१० क) देशोऽद्रि-वन-राष्ट्रादिः, (ख) कालो रात्रिन्दिवर्तवः ।
(ग) १नृत्य-गीत-प्रभृतयः कलाः कामार्थ-संश्रयाः ॥१६२॥
(१०. क. अ) पर्वत, (आ) वन तथा (इ) राष्ट्र आदि 'देश' होता है ।
(ख. अ) रात, (आ) दिन, (इ) मौसम 'काल' होता है । (ग) काम, (ii)
अर्थ पुरुषार्थोंपर आश्रित (अ) नृत्य (आ) गीत आदि कला होती हैं ॥१६२॥
(१०) दशम देशादि-विरोध दोषके आधार देशादिके लक्षण—अगले दो
श्लोकों (१६२-१६३) में दशम दोष देशादिविरोधके देश आदि छह आधारोंका
परिगणन करके उसका लक्षण १६४वें श्लोकमें किया गया है । देश आदि छह
पदार्थोंके विषयमें कविके प्रमाद (असावधानी) के कारण यदि कोई ऐसी बात
कह दी जाती है, जो उन-उन आधारोंमें प्रसिद्धिके विपरीत हो, तो वह
क्रमशः (क) देश-विरोधी, (ख) कालविरोधी, (ग) कलाविरोधी, (घ)
लोकविरोधी, (ङ) न्यायविरोधी और (च) आगमविरोधी दोष कहलाता है ।
ये छह दशम दोषके अवान्तर भेद हैं ।
इस दोषका मूल भरतके 'न्यायादपेत' दोषमें निहित है : प्रमाणों (लोक,
वेद तथा अध्यात्म) से रहित कथन न्यायसे रहित होनेसे न्यायापेत (न्याय-
विरोधी) दोष होता है । २ प्रत्यक्ष, अनुमान आदि प्रमाणोंसे पदार्थके स्वरूपकी
परीक्षा 'न्याय' कहलाता है । भरतोक्त या दर्शनशास्त्रोक्त प्रमाणोंके द्वारा
परीक्ष्य पदार्थों (प्रमेयों)को काव्यमें इस रूपमें प्रयुक्त करना कि वे प्रमाणोंसे
परीक्षा करनेपर सही न उतर सकें, न्यायापेत दोष होता है । काव्यके वर्ण्य
प्रमेयोंका वर्गीकरण दार्शनिक वर्गीकरणके समान तो नहीं हो सकता । अतः
दण्डीने देश आदि छह प्रमेय बताकर इनके विषयमें प्रमाणविरुद्ध कथनको
विनाशपथदानाभ्यां पदवादसमुत्सकम् ।
कामधेनु : विरेचक-याभ-पुरीष-विनाश-पदविन्यासैर्विरेचन-मिथुनीभाव-
पुरीष-विनाश-प्रतीतेस्त्रिविधान्यश्लीलानि द्रष्टव्यानि ।
१. इसका उदाहरण १७०वें श्लोकमें नाट्यसे सम्बद्ध दिया है । अतः उचित
पाठ तो 'नाट्य' प्रतीत होता है । नृत्य नाट्य (प्रेक्षणीयक्र)का ही अङ्ग
है, यह समझकर कदाचित् 'नृत्य' कहा है ।
२. न्यायादपेतं विज्ञेयं प्रमाणपरिवर्जितम् । नाट्यशास्त्र १६।६३
लोको वेदस्तथाऽध्यात्मं प्रमाणं त्रिविधं स्मृतम् ।। २५।१३२
१६८ काव्यादर्श [३।१६२
देशादिविरुद्ध दोषके रूपमें निरूपित किया है ।
काव्यके छह प्रमेयोंका स्वरूप आचार्यने निम्नोक्त प्रकारसे बताया है :
(क) देश—प्रत्यक्ष प्रमाणसे ज्ञेय विषयोंमें सर्वप्रथम पदार्थ है सबका
अधिष्ठान देश । काव्यमें देशका वर्णन (अ) पर्वत, (आ) जंगल, नदी, समुद्र,
मरुस्थल, (इ) राष्ट्र (प्रशासनिक इकाई), नगर, ग्राम, घर, बाहर आदिके
रूपमें किया जाता है । अर्थात् भौगोलिक वर्णन देशका विषय है ।
(ख) काल—समयका वर्णन सूर्य या चन्द्रकी गतिके आधारपर कल्पित
लघुतम इकाई 'त्रुटि' अथवा 'क्षण'से लेकर उनके योगसे निष्पन्न प्रातः,
सायम्, रात, दिन, सन्ध्या, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, वर्ष, युग, कल्प आदि
बड़ी मात्राओंके रूपमें किया जाता है । इतिहासभी कालका विषय है ।
(ग) कला—मनुष्यके चार पुरुषार्थों (i) धर्म, (ii) अर्थ, (iii) काम
और (iv) मोक्षमें (iv) मोक्ष निवृत्तिमार्ग होनेसे काव्यका प्रमेय कम ही
होता है । प्रवृत्तिमार्गी तीन पुरुषार्थोंमें (क) धर्म अर्थका साधन है और (ख)
अर्थ कामका है।¹ इन सबका साध्य सुख (आनन्द) है। आनन्दका ही
साधन चौंसठ कलाएँ और १०४ उपकलाएँ हैं । इनमेंसे नाट्य कला आँख
और कान, दो, इन्द्रियोंसे रञ्जनके कारण सर्वाधिक मधुर होती है । नाट्यका
ही अङ्ग है गान्धर्व कला । वह अन्य कलाओंकी प्रतिनिधि है । नाट्याचार्यों
भरत और विशाखिलके अनुसार गान्धर्व विद्याके तीन आश्रय हैं : (i) स्वर
(कण्ठ vocal, तन्त्री instrumental music), (ii) ताल (कर-चरणनिक्षेप)
और (iii) पद (i. शब्दविधान, ii. छन्दोविधान )।² दण्डीने (i, iii) प्रकारके
१. दो पुरुषार्थ धर्म और अर्थ साधन हैं और दो काम और मोक्ष क्रमशः
प्रवृत्ति और निवृत्ति मार्गके साध्य हैं । कामका साधन अर्थ है और अर्थ-
का साधन धर्म है : कामैर्हं स्म वै पुरुषैयः सत्रमासते—'असौ नः कामः ।
स नः समृध्यताम् ।' इति (श० ब्रा० ४।६।६।२३) । निष्काम भावसे
साधित धर्म चित्तशुद्धिकारक होनेसे ज्ञानकी योग्यता उत्पन्न करता है ।
अतः निष्काम धर्म मोक्षका साधन है । द्रष्टव्य गीता-भाष्य-नवाम्बरा,
पृष्ठ ३६ ।
२. गान्धवं त्रिविधं विद्यात् स्वर-ताल-पदात्मकम् । नाटच० २८।११
स्वरा ग्रामावलङ्कारा वर्णाः स्थानानि जातयः ।
साधारणे च शारीर्यां वीणायामेष सङ्ग्रहः ॥ १५
व्यञ्जनानि, स्वरा वर्णाः सन्धयोऽथ विभक्तयः ।
३।१६३] ५ दोष : (१०) देशादि-विरोध १६६
(घ) चराचराणां भूतानां प्रवृत्तिर्लोकसञ्ज्ञिता ।
(ङ) हेतुविद्याऽऽत्मको न्यायः, (च) सस्मृतिः श्रुतिरागमः ॥१६३॥
(घ) स्थावर-जङ्गमात्मक पदार्थोंकी प्रवृत्ति (व्यवहार) 'लोक' है ।
(ङ) कारणविद्या (तर्कशास्त्र) के रूपमें 'न्याय' होता है । (च i) स्मृतियों
सहित (ii) श्रुति (मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद) 'आगम' है ।। १६३ ।।
गान्धर्वका प्रतिनिधित्व करने वाली गीत कलाका और (ii) ताल विधाकी
उपलक्षक नृत्य कलाका कथन किया है । ये कलाएँ (१) पेशेवर प्रयोक्ताके
लिए अर्थ-संश्रय हैं और (२ अ) आत्मतोषके लिए प्रयोग करने वालेके लिए
तथा (आ) श्रोताके लिए काम-संश्रय हैं ।
ये तीनों प्रमेय भरतके 'लोक' नामक प्रमाणमें समाहित हैं । दण्डीने इन्हें
पृथक् कर दिया है ।। १६२ ।।
(घ) लोक—देश और कालरूप अधिष्ठान तथा कलाओंकी निष्पत्ति
उनके आधेय तथा अनुष्ठाता स्थावर जङ्गम भोग्य और भोक्ता पदार्थोंके बिना
निष्प्रयोजन है । इसलिये आचार्यने देश, काल और कलाके बाद स्थावरजङ्ग-
मात्मक पदार्थोंको 'लोक'के नामसे बताया है । (i) स्थावर वृक्ष, लता, आदि
उद्दीपन विभावके रूपमें और (ii) चेतन पदार्थ आलम्बन विभावके रूपमें
काव्यमें अपने व्यवहारके माध्यमसे उपयोगी होते हैं । अतः चराचर अव्यक्त,
अल्पव्यक्त और सुव्यक्त चैतन्य वाले पदार्थोंके अस्तित्वमात्रका नाम 'लोक'
नहीं है । अपितु इनकी भोक्तृ-भोग्यके रूपमें प्रवृत्ति, व्यवहार ही लोकसे इष्ट
है । वस्तुके स्वरूपावस्थानके बिना कोई भी व्यवहार सम्भव नहीं होता, अतः
देशादिमें आधेय वस्तुओंका स्वरूप 'लोक'में पहले ही समाहित है । काव्यका
विषय यही लोक है । समस्त आलम्बन, उद्दीपन विभाव, उनकी चेष्टाओंके
रूपमें अनुभाव तथा उनके समस्त मनोजगत्में सञ्चरण करनेवाले संचारी
भाव आदि इस लोकप्रवृत्तिका ही अङ्ग है । अतः लोकका ही अङ्ग हैं ।
नामाख्यातोपसर्गाश्च निपातास्तद्धिताः कृतः ।। १६
छन्दो-विधिरलङ्कारा ज्ञेयः पद-गतो विधिः ।
निबद्धं चानिबद्धं च द्विविधं तत्पदं स्मृतम् ।। १७
ध्रुवस्तवावापनिष्कामौ...पाद-मार्गाः स-पाणयः ।। १८-१६
इत्येकविंशतिविधं ज्ञेयं तालगतं बुधैः । २०
अभिनवभारती २८।११ : "आश्रित-वाची 'विधा'-शब्द" इति चिरं-
तनाः ।... तथा च विशाखिलाचार्यः— 'स्वर-पद-ताल-समवाये तु गान्धर्वम्'
इति ।
२०० काव्यादर्श [३।१६४
तेषु तेष्वयथारूढं यदि किञ्चित् प्रवर्तते ।
कवेः प्रमादाद् देशादिविरोधीत्येतदुच्यते ॥ १६४ ॥
उन-उन (देशादि) विषयोंमें कविके प्रमादसे यदि प्रसिद्धिके विपरीत कुछ
(काव्यमें) होता है, तो वह (१०) देशादिविरोधी कहा जाता है ॥ १६४ ॥
(ङ) न्याय — 'हेतुविद्या' शब्द 'आन्वीक्षिकी'का पर्याय है, जो स्वयं
'दर्शनशास्त्र'का पर्याय है । कार्य-कारण सम्बन्धके विवेचनसे समस्त जगत्का
अन्वीक्षण करनेसे यह विद्या 'कारणविद्या', 'हेतुविद्या', 'तर्कशास्त्र', 'अन्वी-
क्षण', 'दर्शन' आदि शब्दोंसे अभिहित होती है ।¹ लोककी प्रवृत्ति तथा उसके
प्रयोजनको सूक्ष्मतासे समझनेके लिये हेतुविद्याकी परम उपयोगिता है । अतः
आचार्यने (घ) लोकके बाद तथा उससे पृथक् इसका निरूपण किया है । यह
अन्य इसी प्रकारकी विद्याओंका उपलक्षक है ।
(च) आगम — विद्यास्वरूप होते हुए भी श्रुति और उसकी अविरोधी या
विरोधी परम्परा (स्मृति) सदासे हेतुविद्यासे पृथक् एक प्रमाणके रूपमें मान्य
रही है । यह उपलक्षक है इतिहास, पुराण तथा विभिन्न देशों, कालोंमें
विभिन्न समाजोंमें विकसित सामाजिक शास्त्रोंका ॥ १६३ ॥
काव्यके इस षड्विध वर्ण्य विषयके यथार्थ, प्रमाणसिद्ध स्वरूपके विरुद्ध
जो कुछ अपनी अशक्तिसे, या प्रमादसे कवि प्रतिपादित करता है, वह सब
जिस-जिस विषयका विरोध उसमें होता है, उस-उसका विरोधी कहलाता है ।
सहृदय जनको उद्वेजक होनेसे यह दोष है ।
भामहने दण्डी जैसा विस्तार तो नहीं किया है, पर छहों भेदोंका निरूपण
प्रायः दण्डीकी दिशामें ही किया है । वामनने सम्भवतः भरतके अधिक अनु-
कूल होनेकी चेष्टामें (क) देश, काल और स्वभावसे विरोधीको देशविरोधी
दोष बताया है । और (ख i) कलाशास्त्रों, तथा (ii) चतुर्वर्ग (धर्मार्थकाम-
मोक्ष सम्बन्धी) शास्त्रोंसे विरोधीको 'विद्याविरुद्ध' नामक दोष बताया है ।²
इस वर्णनमें वामनके (क) देश, काल एवं स्वभाव दण्डीके देश, काल एवं
लोकप्रवृत्ति हैं ! (ख i) कलाशास्त्र दण्डीकी कला है । (ii) चतुर्वर्गशास्त्रमें
दण्डीके न्याय और आगम समाहित हैं । १६४ ॥
१. तर्कसङ्ग्रह तारोदय, भूमिका, पृष्ठ चार देखें ।
२. काव्याल० सूत्र २।२।२३-२४ : (क) देशकालस्वभावविरुद्धार्थानि लोक-
विरुद्धानि । (ख) कला-चतुर्वर्गशास्त्र-विरुद्धार्थानि विद्याविरुद्धानि ।
३।१६५] ५. दोष : (१० क. अ) अद्रि-देशविरोध २०१
(१० क. अ) 'कर्पूर पादपामर्श-सुरभिर्मलयानिलः' ।
(आ) 'कलिङ्ग-वन-सम्भूता मृग-प्राया मतङ्गजाः' ।। १६५ ।।
(१०. क. अ) 'मलयानिल कपूरके पेड़ोंको छूनेसे सुगन्धित है' ।
(आ) कलिङ्ग देशके वनोंमें उत्पन्न हाथी प्रायः मृग जातिके, अथवा
मृगों जैसे छोटे, होते हैं' ।। १६५ ।।
(१० क.) देशविरोध--(अ) अद्रिविरोध : 'मलय' शब्द दक्षिणमें
(तमिलमें) 'पर्वत' का वाचक है । उत्तर भारतमें (संस्कृतमें) यह शब्द दक्षिण
के एक पर्वतविशेषके लिये रूढ हो गया है, जिसकी प्रसिद्धि यह है कि वहाँ
चन्दनके वृक्ष होते हैं । दक्षिणसे आनेवाली हवा उन्हें छूकर आती है, इसलिये
सुगन्धित होती है । प्रकृत १६५वें श्लोकके पूर्वार्धमें मलयानिलकी सुरभिता
चन्दनसे न बताकर कपूरके पेड़ोंके स्पर्शसे बताई है । यह यथार्थ नहीं है ।
क्योंकि (१) कपूरके पेड़ नहीं होते । (२) मलयाद्रिकी कर्पूरपादपके
अधिष्ठानके रूपमें प्रसिद्धि भी नहीं है । अतः यहाँ अद्रिरूप देशका अयथार्थ
(प्रत्यक्षप्रमाणविरुद्ध) वर्णन करनेके कारण देशविरोधिता दोष है ।
(आ) वन-विरोधी : श्लोकके उत्तरार्धमें दक्षिणापथके दण्डकारण्य जैसे
कलिङ्गवन, अपरनाम 'महाकान्तार', के दक्षिणपूर्वी भागके एक प्रदेशको बहुत
प्राचीन कालसे 'कलिङ्ग' कहा जाता था । इसके जङ्गलोंमें पाये जानेवाले हाथी
श्रेष्ठ जातिके माने जाते थे ।१ हाथियोंकी आठ जातियोंमें से श्रेष्ठ जातिका
नाम 'भद्र' है । उनका डीलडौल विशाल होता है ।२ उन्हें कविने 'मृगप्राय'
कहा है । इसके दो अर्थ हो सकते हैं : कलिङ्गवनोंमें उत्पन्न हाथी (१)
विशालकाय होनेके बजाय मृगोके समान ह्रस्वाकार होते हैं; (२) वे 'भद्र'
जातिके होनेके बजाय गजोंकी तृतीय 'मृग' जातिके होते हैं । रत्नश्रीज्ञानने
हाथियोंकी 'भद्र'के समान 'मृग' भी एक जाति बताई है ।३ जिस प्रकार पुरुषों
के बलाबल, आकार, स्वभाव आदिके आधारपर शश, मृग, वाजी आदि भेद
१. कालिङ्गाङ्गगजाः श्रेष्ठाः प्राच्याश्चेति करूषजाः । अर्थशास्त्र २।२
२. भद्रात्मनो दुरधिरोहतनोर्विशालवंशोन्नतेः....। काव्यप्रकाश २।१२
वामनझळकीकरटीका : 'भद्रो, मन्दो, मृगश्च' इत्युक्त्वा 'एतेऽष्टौ
गजयोनयः ।' इत्युक्तेः ।
३. रत्नश्री ३।१६५ : मृगप्रायाः--'मृग'-लक्षणा हस्तिजातिः प्राया भूयसी
येषां, तया वा प्रायाः समधिका मृगप्रायाः । ...कलिङ्गवनजन्मनां
हस्तिनां भद्रजातिप्रायत्वात् ।
२०२ काव्यादर्श [३।१६६
(इ) 'चोलाः कालागुरुश्यामाः कावेरीतीरभूमयः ।'
इति देशविरोधिन्या वाचः प्रस्थानमीदृशम् ॥ १६६ ॥
(इ) 'कावेरी नदीके किनारोंकी धरती वाला 'चोल' नामक जनपद काले
अगरसे श्याम है ।'
देशके विरोधवाली उक्तिका स्वरूप ऐसा होता है ॥ १६६ ॥
बताये गये हैं, इसी प्रकार गजोंके भद्र, मृग आदि आठ भेद गजशास्त्रमें प्रोक्त
हैं । दोनों ही अर्थोंमें यहाँ वनरूप देशका विरोध है : कलिङ्गवनोंमें जब छोटे
आकार वाले या मृग जातिके दन्तावल होते ही नहीं, तब वहाँ उन्हें बताना
देशविरोध है ॥ १६५ ॥
(इ) राष्ट्रविरोधी कथन : प्रकृत उदाहरण (१६६वें श्लोक)में दण्डीने
(क) देशके तृतीय भेद राष्ट्रके विरोधका उदाहरण दिया है ।
(१) कालागुरु वृक्षों (Aquilaria Agallocha, अपरनाम Aloe Wood,
Eagle Wood)की उत्पत्ति भारतवर्षमें उत्तरापथमें भूटानमें, पूर्वमें बंगालमें
तथा असमके पहाड़ी क्षेत्रों खसिया, गारो, नाग, कछार और सिल्हटमें ही
होती है ।¹ दक्षिणापथमें नहीं । सफेद अगरसे काला अगर उत्तम होता है ।²
यह सिल्हटमें सर्वोत्तम होता है । अतः उत्तरापथमें होनेवाली वस्तुको दक्षिणा-
पथके एक जनपद चोलमें बताना राष्ट्रविरोध दोष है ।
(२) दण्डीको यदि इतना ही कहना अभीष्ट होता, तो वे दक्षिणापथको
सामान्य रूपसे ही कहते । इससे प्रतीत होता है कि 'चोल जनपदमें' कहनेसे
उन्हें कुछ विशेष अभिप्रेत है । वह विशेष यह है कि दक्षिणापथमें चेर और
चोल जातिके राजाओंका उच्छेद करके बादामी (वातापी) में चालुक्यों,
काञ्चीमें पल्लवों और मदुरामें पाण्ड्योंका राज्य लगभग तीन (छठीसे नौवीं)
शती तक रहा । इनमेंसे पूर्वकालमें चोलाधीन कावेरीतीर-भूमि उरैयुर तकका
प्रदेश पल्लवसाम्राज्यका भाग था । दण्डीके समय यह परमप्रतापी नरसिंहवर्मा
द्वितीय, अपरनाम राजसिंह, के अधीन था ।³ अतः पल्लवाधीन कावेरीतीर-
भूमिको चोलाधीन देश कहनेसे भी राष्ट्रविरोध दोष है । चोलोंका अभ्युदय
१. काउंसिल आफ साइण्टिफिक एण्ड इण्डस्ट्रियल रिसर्च, दिल्ली, १९४८ :
दी वैल्थ आफ इण्डिया, भाग १, पृष्ठ ८६ ।
२. कृष्णं गुणाधिकं तत्तु लोहवद् वारि मज्जति । भावप्रकाश १।६।२३
३. श्रीनीलकण्ठ शास्त्री, ए हिस्ट्री आफ साउथ इण्डिया, अध्याय ७-६ ।
३।१६७] ५ दोष : (१० ख) काल-विरोध २०३
(ख. अ) पद्मिनी नक्तमुन्निद्रा, (आ) स्फुटत्यह्नि कुमुद्वती ।
(ख. अ) पद्मिनी रातको खिली है । (आ) कुमुदिनी दिनमें चटकती है ।
या तो पल्लवाभ्युदयसे पूर्व था, या नवीं शती ई० में हुआ है । कावेरी-तीर-
भूमिको 'चोल' कहनेसे दण्डीके समय कोई छोटी-मोटी चोल नामलेवा
रियासत बची भी हो, तो उसका उपहास आचार्यने किया है । क्षेमेन्द्र द्वारा
कावेरीको चोल देशमें कहना¹ तो उचित है । किन्तु दण्डीके समय नहीं ।
इस प्रकार उक्तिमें (अ) पर्वतविरोध, (आ) वनविरोध और (इ) राष्ट्र-
विरोधके प्रदर्शनके माध्यमसे (क) देशविरोधी उक्तिका स्वरूप आचार्यने
स्पष्ट किया है । देशके 'आदि'-शब्द-परिगृहीत अन्य अङ्गोंका विरोध इसी
प्रकार स्वयं समझ लेना चाहिये ।
भामहने देशविरोधका स्वरूप यों प्रस्तुत किया है : किसी स्थानमें जो
द्रव्यका होना या नहीं होना कहा जाता है, उसकी विरोधी उक्ति स्वभावके
अनुसार 'देशविरोधी' है । जैसे—गुफाओंके निकट उगे हुए कालागरु वाले
मलय पर्वतपर सुगन्धित फूलोंसे झुके हुए देवदारु वृक्ष शोभा पाते हैं ।² यहाँ
(१) मलयपर चन्दनकी प्रसिद्धिके विपरीत कालागरुवृक्ष कविने बताये हैं ।
(२) देवदार वृक्ष हिमालयमें काफी ऊँचाई पर होते हैं तथा उनके फूल नहीं
होता अपितु ठीठा (cone) होता है । उन्हें कविने धुर दक्षिणमें स्थित
मलयपर्वतपर तथा (३) फूलोंसे झुके बताया है । अतः देशविरोधी होनेसे
यह उक्ति दोषयुक्त है । दक्षिणके निवासी दण्डीने देशविरोधके तीनों
उदाहरणोंमें दक्षिण भारतमें ही नहीं होनेवाले पदार्थोंका वर्णन किया है ।
उत्तर भारतके भी धुर उत्तरमें कश्मीरके निवासी भामहने देवदारका
उदाहरण उचित ही दिया है । मलय पर्वतका वर्णन तो उन्होंने सम्भवतः
दण्डीके उदाहरणकी नकलपर दिया है ॥ १६६ ॥
(ख) कालविरोध—अगले अढ़ाई (१६७-१६८।।) श्लोकोंमें आचार्य
ने कालके उपलक्षणार्थ प्रस्तुत तीनों पदार्थोंके विरोधके उदाहरण प्रस्तुत किये
हैं । प्रथम श्लोकके पूर्वार्धके दो पादोंमें क्रमशः (अ) रात्रि काल और (आ)
दिनके विरोधके उदाहरण दिये हैं । इसके बाद डेढ़ श्लोकमें (इ) ऋतुविरोधके
१. उल्लङ्घ्यमाना कावेरी तेन सम्मर्दकारिणा ।
चोलकेश्वरकीर्तिश्च कालुष्यं ययतुः समम् ।। कथासरित्सागर १६।६५
२. या देशे द्रव्यसम्भूतिरपि वा नोपदिश्यते ।
तत् तद्विरोधि विज्ञेयं स्वभावात् तद् यथोच्यते ।। काव्याल० ४।२६
मलये कन्दरोपान्तरूढकालागरुद्रुमे ।
सुगन्धिकुसुमानम्रा राजन्ते देवदारवः ।। ३०
२०४ काव्यादर्श [३।१६७-१६६
(इ १) मधुरोत्फुल्लनिचुलो, (२) निदाघो मेघदुर्दिनः ॥ १६७ ॥
(३) श्रव्यहंसगिरो वर्षाः, (४) शरदामत्तबर्हिणी ।
(५) हेमन्तो निर्मलादित्यः, (६) शिशिरः श्लाघ्यचन्दनः' ॥ १६८ ॥
इति कालविरोधस्य दर्शिता गतिरीदृशी ।
(इ १) वसन्त फूल आए हुए निचुल (स्थलवेतस) वाला है । (२) ग्रीष्म
मेघोंसे ढंके आकाश वाला है (३) सुनने योग्य हंसोंकी वाणियों वाला बारिस
का मौसम है । (४) मदमस्त मयूरों वाली शरद् है । (५) हेमन्तमें निर्मल
है सूरज । (६) शिशिरमें लगता है चन्दन अच्छा ॥ १६८ ॥
इस प्रकार कालविरोधकी ऐसी स्थिति दिखाई ।
छह उदाहरण छह पादोंमें प्रस्तुत करके १६६वें श्लोकके पूर्वार्धमें कालविरोध
का उपसंहार किया है ।
(अ) रात्रिविरोध : पद्मिनी (कमलिनी) रातमें नहीं खिलती, अपितु
दिनमें खिलती है । कुमुदिनी रातको खिलती है । यहाँ कुमुदिनीको रातमें
खिलती न बताकर पद्मिनीको बताया है । इसलिये रात्रिकालका विरोध
किया है । अतः प्रत्यक्षविरुद्ध यह सहृदयके लिये उद्वेजक होनेसे दोष है ।
(आ) दिनविरोध-कुमुदिनीको रातमें खिलती न बताकर दिनमें
खिलती बतानेसे यहाँ दिनकालविरोध प्रत्यक्षविरुद्ध होनेसे दोष है ।
(इ) ऋतुविरुद्ध : (१) वसन्तमें निचुल (स्थलवेतस)¹ नहीं खिलता;
(२) ग्रीष्म ऋतुमें आकाश मेघच्छन्न नहीं होता; (३) वर्षाकालमें हंसोंका
कलरव नहीं सुनाई देता; वे तो शरदारम्भमें जलाशयोंमें आते हैं; (४) बर्हिगण
(मयूर) शरद् ऋतुमें मदमस्त नहीं होते, अपितु वर्षाकालमें मेघमालाको देखकर
पांखें फैलाकर नाचकर अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते हैं; (५) हेमन्त ऋतुमें
आदित्य शीतजन्य कोहरेसे धुँधला और दक्षिणायनके कारण मन्दद्युति हो
जाता है; (६) शिशिर (टाढे पाले वाली सर्दी) में चन्दन शीतल होनेके
कारण मनको नहीं भाता; वह तो गर्मीमें अच्छा लगता है । इस प्रकार इन
छहों उक्तियोंमें तत्तद् ऋतुओंके विपरीत अनुभव (प्रत्यक्ष) का निरूपण होनेसे
यहाँ ऋतुविरोध स्पष्ट है ॥ १६७-१६८ ॥
कालके उक्त तीनों अङ्गोंके विरोधका स्वरूप इस प्रकार दिखलाया है ।
कालके अन्य अवयवों युगादिका विरोध भी इसी प्रकार समझें । जैसे सत्ययुग
१. वानीरे कविभेदे स्यान्निचुलः स्थलवेतसे । शब्दार्णवकोष
३।१६६-१७० ] ५ दोष : (१० ग) कला-विरोध २०५
(ग) मार्गः कलाविरोधस्य मनागुद्दिश्यते यथा ॥ १६६ ॥
(i) 'वीर-शृङ्गारयोर्भावौ स्थायिनौ क्रोध-विस्मयौ' ।
(ii) 'पूर्णसप्तस्वरः सोऽयं भिन्नमार्गः१ प्रवर्तते' ॥ १७० ॥
(ग) 'कलाविरोध' दोषके मार्ग (प्रकार, स्वरूप) का कथन कुछ (नाम-
मात्र देकर) किया जा रहा है । जैसे—॥ १६६ ॥
(i) 'वीर, शृङ्गार (रसों) के स्थायी भाव क्रोध और विस्मय हैं' ।
(ii) 'वह यह पूरे सातों स्वरों वाला भिन्नमार्ग चल रहा है' ॥ १७० ॥
में कलिकी प्रवृत्तियोंका या कलियुगमें सत्ययुगकी प्रवृत्तियोंका वर्णन काल-
विरोध होगा । ऐसे ही मन्वन्तर विरोधादि भी समझें । युगादिविरोधमें शब्द-
प्रमाण (पुराणादिप्रतिपादित स्वरूप) का उल्लङ्घन होगा । इतिहासविरोध
भी 'कालविरोध' है ।
निर्दोषता : देश-काल-विरोध यदि काव्यमें युक्तियुक्त रूपमें प्रस्तुत किया
जाता है, तो दोष नहीं होगा । जैसे तपोवनमें आश्रमवासी ऋषिकी तपस्याके
प्रभावको निरूपित करनेके लिए कवि यदि सिंह-मृग, अहि-नकुल, गो-व्याघ्रमें
परस्पर प्रीति दिखाता है, या अन्य देश और कालमें स्थित वस्तुकी भी वहाँ
उपस्थितिका वर्णन करता है, तो वह देशविरोध और कालविरोध दोष नहीं
होगा । अतः यह दोष अनित्य है । आगे १८०-१८१ श्लोक देखें ।
(ग) कलाविरोध दोष—त्रिपुरहरभूपालद्वारा उद्धृत भामहके अनुसार
मुख्य कलाएँ चौंसठ हैं और उपकलाएँ ५०४ हैं ।२ सब कलाओंका तो दूर
किसी एक कलामें भी दोषोंका निरूपण क्लिष्ट कार्य है । इस लिये आचार्यने
स्वकृत विरोधप्रदर्शनको 'मनाक्' कहा है ॥ १६६ ॥
(i) नाट्यकलाविरोधका उदाहरण : वीर एवं शृङ्गार क्रमशः अर्थाश्रय
एवं कामाश्नय रस हैं । रसकी अनुभूति सर्वाधिक उत्कृष्ट रूपमें प्रेक्षणीयक
(नाट्य) में होती है । अतः तत्सम्बन्धी उदाहरण दिया है । वीर एवं शृङ्गार
रसोंके स्थायी भाव क्रमशः उत्साह और रति होते हैं । उनकी जगह क्रोध
और विस्मयको उनका स्थायी भाव कहना नाट्यकलाके विरुद्ध है । क्रोध रौद्र
रसका और विस्मय अद्भुतका स्थायी होता है । क्रोध और विस्मय वीर और
१. सरस्वतीकण्ठाभरण १।७४में धृत 'भिन्नग्रामः' पाठ उचित है । टीका
देखें ।
२. कामधेनु १।३।७ : कला नृत्यगीताऽऽदयश्चतुःषष्टिः । उपकलाश्चतुःशतम्;
अत्र कलानामुद्देशः कृतो भामहेन ।
२०६ काव्यादर्श [३।१७०
शृङ्गारके व्यभिचारी अलबत्ता हो सकते हैं । उनके परिहारके लिये 'स्थायिनो'
विशेषण आचार्यने दिया है ।
(ii) सङ्गीत कलाके विरोधका उदाहरण : गान्धर्व शास्त्रमें गान और
वाद्य (तन्त्री) में षड्ज, ऋषभ, गान्धार, पञ्चम, धैवत, निषादवान्, (निषाद)
ये सात स्वर (स, रि, ग, म, प, ध, नि) होते हैं ।१ इनके समूहको 'सप्तक'
कहते हैं । संवादी स्वरोंका वह समूह ग्राम है, जिसमें श्रुतियाँ व्यवस्थित रूपमें
विद्यमान हों और जो मूर्च्छना, तान, वर्ण, क्रम, अलङ्कार इत्यादिका आश्रय
हो ।२ प्राचीन कालमें षड्ज, मध्यम, गान्धार नामक तीन ग्राम होते थे । भरत
ने षड्ज और मध्यम दो ही ग्राम माने हैं ।३ गान्धार ग्राममें तार और
मन्द्र सप्तकोंकी (१) अधिकताके कारण और (२) वैस्वर्यके कारण भरतने
उसे नहीं अपनाया है ।४ दूसरे शब्दोंमें, गान्धार ग्राम अपने इन दोषोंके
कारण लोकप्रिय नहीं रह सका, स्वर्ग सिधार गया ।५ इससे स्पष्ट है कि ग्राम
होता ही वह है, जिसमें सातों स्वर पूर्ण हों ।६ किन्तु परवर्ती कुछ आचार्य,
जैसे बृहद्देशीके प्रणेता मतङ्ग (६-७वीं सदी ई०) छह स्वरों वाले 'षाडव'
और 'औडुवित' नामक तानोंको७ भी 'ग्राम' कहने लगे । प्रसिद्ध ग्रामों से भेद
१. षड्जश्च, ऋषभश्चैव, गान्धारो, मध्यमस्तथा ।
पञ्चमो धैवतश्चैव सप्तमोऽथ निषादवान् ॥ नाटच० २८।२१
अमरकोष (१।७।१) में यह क्रम सम्भवतः छन्दोनुरोधसे तोड़ा है :
निषादर्भगान्धारषड्जध्यमधैवताः ।
पञ्चमश्चेत्यमी सप्त तन्त्री-कण्ठोत्थिताः स्वराः ॥
२. भरतका सङ्गीतसिद्धान्त, पृष्ठ ५ । तथा अभिनवभारती १८।५ ।
३. नाट्यशास्त्र २८।२४से पूर्व : अथ द्वौ ग्रामौ— षड्जग्रामो मध्यमग्राम-
श्चेति । अत्राश्रिता द्वाविंशतिः श्रुतयः स्वरमण्डलसाधिकाः* । अभिनव-
भारती : 'अथ द्वौ ग्रामौ' इति गान्धारग्रामं निरस्यति ।
*बड़ौदासंस्करणमें 'साधिता' स्वीकृत है; 'सघिका' (शुद्ध रूप
'साधिकाः') पाठभेद पादटिप्पणीमें दिया है । 'स्वरमण्डलस्य = स्वर-
समूहस्य = सप्तकस्य द्वाविंशत्यैव सिद्धिः' (अभिनवभारती) में 'साधिकाः'
पाठ ही व्याख्यात है ।
४. द्वौ ग्रामौ भरतेनोक्तौ, ग्रामो गान्धारपूर्वकः ।
अतितारातिमन्द्रत्वाद् वैस्वर्यान्नोपदर्शितः ॥ भरतकोश पृष्ठ १८६
५. प्रवर्त्तते स्वर्गलोके ग्रामोऽसौ न महीतले ॥ संगीतदर्पण ८०
६. ग्रामौ पूर्णस्वरौ द्वौ तु, यथा वै षड्जमध्यमौ । नाटचशास्त्र १८।६
७. क्रमयुक्ताः स्वराः सप्त मूर्च्छनेत्यभिसञ्जिताः ।
षट्-पञ्च-स्वरकास्तानाः षाडवौडुदिताश्रयाः ॥ नाट्यशास्त्र २८।३२
२०७ ५. दोष : (१० ग) कला-विरोध [३।१७०
करनेको उन्होंने इन स्वाभिमत ग्रामोंको भिन्नग्राम कहा ।¹ अभिनवगुप्तने कुछ
आचार्योंको अभिमत 'षड्जग्रामराग' और 'मध्यमग्रामराग' के नामसे सम्भवतः
इसी 'भिन्नग्राम' सिद्धान्तका उल्लेख किया है ।² इस प्रकार पूर्ण सातों स्वरों
वाले 'ग्राम' शब्दका प्रयोग 'भिन्नग्राम' में अपूर्ण स्वरोंवाले रागोंके लिये
करना 'मार्ग'³ सङ्गीतकी भरत आदि आचार्यों द्वारा प्रतिपादित गीत (गान)
कलाका विरोध हुआ ।
काव्यादर्शके तीनों प्राचीन टीकाकारोंने यहाँ 'भिन्नमार्ग' पाठकी व्याख्या
की है ।⁴ पर यह उचित नहीं है । क्योंकि गान्धर्व शास्त्रमें 'गीत'के प्रसङ्गमें
'मार्ग'का सम्बन्ध 'ताल'से है, 'स्वर'से नहीं ।⁵ 'ताल' वाला मार्ग 'भिन्न' भी
१. रत्नदर्पण १७४ : भिन्नमार्गेषु* सप्तस्वराणां समवायो नोपनिबद्धः ।
तमङ्गोऽप्याह 'षाडवौडविके जाती भिन्नग्राम् उदाहृतः' । ततश्च
पञ्च वा षड् वा स्वरा भवन्ति भिन्नग्रामे, न तु सप्त ।
'ग्रामेषु', 'मतङ्गो', '०डुविते' पाठ उचित है ।
२. अभिनवभारती १८।६ : जात्याश्रययोजितद्वारेण षाडवौडुवितांशयोगे
न्यूनस्वरताऽप्यस्ति इति षड्जग्रामरागो, मध्यमग्रामरागश्चेह 'ग्राम'-
शब्देन व्यपदिष्ट इति केचित् । तदसत् । इह हि 'ग्राम'-शब्देन जाति-
समुदायाऽभिधीयते । तत्र यद्यप्यंशके न्यूनस्वरताऽपि भवति, तथाऽपि
समुदायस्य पूर्णतायाः का हानिः ?
३. भरतादिप्रणीत शास्त्रीय सङ्गीत 'मार्ग' सङ्गीत कहलाता है । इससे
भिन्न लोकसङ्गीत 'देशी' सङ्गीत कहाता है । आचार्य मतङ्ग देशी
सङ्गीत विधाके प्राचीन आचार्य हैं । उनका ग्रन्थ 'बृहद्देशी' देशी सङ्गीत
का अत्यन्त प्रामाणिक ग्रन्थ है ।
४. रत्नश्री : भिन्नमार्गो गान्धर्वप्रकारः कश्चित् प्रवर्त्तते । वादितीका :
भिन्नमार्गश्चेत् कथं 'पूर्णसप्तस्वरः' ? इति । तरुणटीका : भिन्नमार्गो
नाम पञ्चस्वरनिष्पन्नः । तस्य निषादादि-सप्तस्वरपूर्णत्वं गीतलक्षण-
विरुद्धम् । *'निषादादि' कथनं सम्भवतः अमरकोषकी परम्परापर
आधारित है ।
५. मार्गेस्त्रिभिः प्रयोक्तव्यश्चित्र-वार्तिक-दक्षिणैः । नाट्यशास्त्र २८।१०६
चित्रे द्विमात्रा कर्तव्या, वृत्तौ सा द्विगुणा स्मृता ।। नाट्यशास्त्र ३१।५
चतुर्गुणा दक्षिणे स्यादित्येवं त्रिविधा कला ।
कलाकालप्रमाणेण 'ताल' इत्यभिसञ्ज्ञितः ॥ ६
२०८ काव्यादर्श [३।१७१
इत्थं कलाचतुःषष्टौ विरोधः साधु नीयताम् ।
तस्याः कलापरिच्छेदे रूपमाविर्भविष्यति ॥ १७१ ॥
इस प्रकार चौंसठ कलाओंके विषयमें विरोधका अनुगमन भली भांती
किया जाये । उनका स्वरूप 'कलापरिच्छेद'में प्रकट होगा ॥ १७१ ॥
नहीं होता । तरुणवाचस्पतिने 'भिन्नमार्ग'की जो व्याख्या की है, वह मतङ्गोक्त
'भिन्नग्राम' पर लागू होती है । इसी प्रकार रत्नेश्वरमिश्रने भी 'भिन्नमागोंमें
सातों स्वरोंका समुदाय (जाति) उपनिबद्ध नहीं होता', जो कहा है, वह भी
'भिन्नग्राम' पर ही सही ठहरता है' ॥ १७० ॥
कला-परिच्छेद—'कलाओंका स्वरूप स्पष्ट करनेको लिखा ग्रन्थ या
ग्रन्थांश' कलापरिच्छेदका अर्थ है । रत्नश्रीज्ञानने काव्यादर्शके चौथे परिच्छेद
को कलापरिच्छेद बताकर कहा है कि वह प्रचलित (उपलब्ध) नहीं है ।
लगता है कि उन्हें अपने इस मन्तव्यपर विश्वास नहीं था । अन्यथा उन्होंने
'कलापरिच्छेद'की दूसरी यह व्याख्या न की होती : कलाओंका परिच्छेद
(अभ्यास) होनेपर उनका स्वरूप स्पष्ट होगा । वादीजङ्घालदेवने 'कला-
परिच्छेद' ग्रन्थ बताया है । तरुणवाचस्पतिका कहना है : लोग कहते हैं कि
चौंसठ कलाओंका सङ्क्षेपसे निरूपण करने वाला कोई और भी परिच्छेद
काव्यादर्शका है ।२ इन कथनोंसे सिद्ध होता है कि रत्नश्रीज्ञानसे लेकर तरुण-
वाचस्पति तक सभी टीकाकारोंने इस कथनके स्वरूपको देखकर अन्धेरेमें लाठी
मार्गाः स्युस्तत्र चत्वारो ध्रुवश्चित्रश्च वार्तिकः ।
दक्षिणश्चेति, तत्र स्याद् ध्रुवके मात्रिका कला ॥
शेषेषु द्वे चतस्रोऽष्टौ क्रमान्मात्राः कला भवेत् । सङ्गीतरत्नाकर,
तालाध्याय, ५
१. इस विवेचनमें सहायताके लिये लेखक अपने मित्र डा० शत्रुघ्न शुक्ल,
प्रोफेसर तथा पूर्व अध्यक्ष एवं डीन, सङ्गीतकला निकाय, दिल्लीविश्व-
विद्यालय, का आभारी है ।
२. रत्नश्री : 'कलापरिच्छेदे'—(क) चतुर्थः कलापरिच्छेदोऽस्य दण्डिनोऽस्ति ।
स त्विह न प्रवर्तते । (ख) यद् वा कलानां परिच्छेदेऽभ्यासे सति तस्याः
कलाचतुष्षष्टे रूपमाविर्भविष्यति । तस्मात् कलाऽभ्यासः करणीयो, यतस्
तद्विरोधः सर्वो यथावदवगम्यते । वादिटीका : कलाः परिच्छिद्यन्ते यत्र,
स 'कलापरिच्छेदो' ग्रन्थः । तरुणटीका : कलापरिच्छेदे—चतुष्षष्टिकला-
सङ्ग्रहात्मकः काव्यादर्शस्य कश्चिदन्योऽपि परिच्छेदोऽस्तीत्याहुः । तत्र
कलाचतुष्षष्टिर्द्रष्टव्या ।
३।१७३-१७४] ५ दोष : (१० ङ) न्याय-विरोध २११
(ङ) विरोधो हेतुविद्यासु न्यायाख्यासु निदर्श्यते ॥ १७३ ॥
(अ) सत्यमेवाह सुगतः संस्कारानविनश्वरान् ।
(ङ) 'न्याय' नामक हेतु विद्याओं (दर्शनशास्त्र, आन्वीक्षिकी) के विषय
में विरोधका प्रदर्शन किया जा रहा है ॥ १७३ ॥
(अ) 'बुद्धने संस्कारोंको नष्ट नहीं होने वाला ठीक ही कहा है, क्योंकि
भामहने लोकका विभाजन दण्डीके समान स्थावर और जङ्गमके रूपमें
करके उसके व्यवहारको 'लोक' कहा है । लोकव्यवहारका विरोध लोक-
विरोध दोष बताया है । इसके उन्होंने दो उदाहरण दिये हैं : (i) स्थावर
नदीकी प्रवृत्तिका; (ii) जङ्गम सेनाओंके व्यवहारका । दोनों प्रत्यक्षसे
असिद्ध हैं ।¹
(ङ) न्यायविरोध—प्रमाणोंसे पदार्थके स्वरूपकी परीक्षा करना 'न्याय'
होता है ।² इस परीक्षामें हेतु, कारण, तर्क, युक्तिका मुख्यतया उपयोग होने
से इसे हेतुविद्या भी कहते हैं ।³ अश्वघोषने दर्शनोन्मुख पुरुषको 'हेतुबला-
धिक' कहा है ।⁴ इस हेतुविद्या, अपरनाम न्यायविद्या, से दर्शनशास्त्र अभिप्रेत
है, वह चाहे आस्तिक (वेदानुकूल) हो, चाहे नास्तिक (वेदनिन्दक या
ईश्वरका या परलोकका अस्तित्व न मानने वाला) हो । इस प्रकार 'न्याय'
शब्द यहाँ दर्शनकी शाखाविशेषके लिये प्रयुक्त नहीं है, अपितु सामान्यस्वरूप-
परक है ॥ १७३ ॥
(अ) आचार्यने प्रथम उदाहरण नास्तिक (वेदनिन्दक) हेतुविद्याके विरोध
१. स्थास्नु-जङ्गम-भेदेन लोकं तत्त्वविदो विदुः ।
स च तद्व्यवहारोऽत्र, तद्विरोधकरं यथा ॥ काव्याल० ४।३६
(i) तेषां कट-तट-भ्रष्टैर्गजानां मद-बिन्दुभिः ।
प्रावर्तत नदी घोरा हस्त्यश्वरथवाहिना ॥ ३७
(ii) धावतां सैन्यवाहानां फेनवारि मुखच्युतम् ।
चकार जानुदघ्नापान् प्रति दिङ्मुखमध्वनः ॥
२. न्यायसूत्र १।१।१ पर वात्स्यायन : प्रमाणैरर्थपरीक्षणं न्यायः ।
३. ललितविस्तर, अध्याय १२, पृष्ठ १५६, में साङ्ख्य, योग, वैशेषिकके
अतिरिक्त हेतुविद्याका उल्लेख कदाचिद् न्यायविद्या (तर्कशास्त्र) के
लिये किया है । यहाँ सामान्य 'दर्शन शास्त्र' अर्थमें प्रयुक्त हुआ है ।
४. सङ्क्लेशपक्षो द्विविधश्च दृष्टस्तथा द्विकल्पो व्यवदानपक्षः ।
आत्माश्रयो हेतुबलाधिकस्य बाह्याश्रयः प्रत्ययगौरवस्य ॥ सौ० ५।१६
५. विशेषार्थ देखें तर्कसङ्ग्रहतारोदय, भूमिका, पृष्ठ चार-पाँच ।
२१० काव्यादर्श [ ३।१७२-१७३
(घ i) 'आधूतकेसरो हस्ती, (ii) तीक्ष्णशृङ्गस्तुरङ्गमः ।
(iii) गुरुसारोऽयमेरण्डो, (iv) निःसारः खदिरद्रुमः ॥ १७२ ॥
इति लौकिक एषायं विरोधः सर्वगर्हितः ।
(घ) 'हाथी हिलाई हुई सटाओं (अयाल) वाला है। (ii) घोड़ा तीखे
सींगों वाला है। (iii) यह एरण्ड वृक्ष बहुत मजबूत है । (iv) खैरका वृक्ष
निर्बल है ।। १७२ ।। यह लोकमें उपलब्ध विरोध सबके द्वारा निन्दित है ।
ग्रामके शास्त्रोक्त स्वरूपके विपरीत स्वरूपका वर्णन उदाहरणके रूपमें प्रस्तुत
किया है।'
दण्डीका कलाविरोधनिरूपण अधिक सूचनापूर्ण तथा शास्त्रके विकासकी
प्रक्रियाको प्रस्तुत करता है ।। १७१ ।।
(घ) लोकविरुद्ध दोष—आचार्यने इस दोषको स्वतः स्पष्ट चार
उदाहरण देकर स्पष्ट किया है । (i) 'केसर' (अथवा 'केशर') पशुओंमें सिंहों
की या घोड़ोंकी गरदनपर 'अयाल' के नाम से प्रसिद्ध होता है । हाथीके
नहीं होता । हाथीकी विशेषता सूँड (शुण्डा) है, जिसे हाथका काम करनेके
कारण 'कर' या 'हस्त' कहा जाता है। या फिर आगेको निकले दाँत होते हैं ।
इन दोनों विशेषताओंके कारण गजको करी, हस्ती (हाथी) और दन्ती,
दन्तावल कहा जाता है । (i) हाथीके अयाल और (ii) घोड़ेके सीँग लोकमें
प्रत्यक्षविरुद्ध हैं। (iii) इसी प्रकार एरण्ड (रेंडी) वृक्ष बहुत कमजोर तने
और कम गहरी जड़ों वाला होता है। जबकि (iv) खैरका वृक्ष इसके
विपरीत है । इस प्रकार आचार्यने वन्य और ग्राम्य पशुओं और ग्राम्य और
वन्य वृक्षोंके एकेक उदाहरण देकर इस दोषका स्वरूप स्पष्ट किया है ।
१. कला संकलना प्रज्ञा, शिल्पान्यस्याश्च गोचरः ।
विपर्यस्तं तथैवाहुस्तद्विरोधकरं, यथा ॥ काव्यालङ्कार ४।३३
ऋषभात्पञ्चमस्तस्मात् षड्जं धैवतं स्मृतम् ।
अयं हि मध्यमग्रामो मध्यमोत्पीडितर्षभः ॥ ३४
इति साधारितं मोहादन्यथैवावगच्छति ।
अन्यास्वपि कलास्वेवमभिधेया विरोधिता ॥ ३५
षड्ज आदि स्वर पुल्लिंग हैं। भामहने षड्ज और धैवतको
नपुंसक न जाने किस आधारपर दिया है। उदाहरणका भाष्य देवेन्द्रनाथ
शर्माजीके महाभाष्यमें देखें ।
३।१७३-१७४] ५ दोष : (१० ङ) न्याय-विरोध २११
(ङ) विरोधो हेतुविद्यासु न्यायाख्यासु निदर्श्यते ॥ १७३ ॥
(अ) सत्यमेवाह सुगतः संस्कारानविनश्वरान् ।
(ङ) 'न्याय' नामक हेतु विद्याओं (दर्शनशास्त्र, आन्वीक्षिकी) के विषय
में विरोधका प्रदर्शन किया जा रहा है ॥ १७३ ॥
(अ) 'बुद्धने संस्कारोंको नष्ट नहीं होने वाला ठीक ही कहा है, क्योंकि
भामहने लोकका विभाजन दण्डीके समान स्थावर और जङ्गमके रूपमें
करके उसके व्यवहारको 'लोक' कहा है । लोकव्यवहारका विरोध लोक-
विरोध दोष बताया है । इसके उन्होंने दो उदाहरण दिये हैं : (i) स्थावर
नदीकी प्रवृत्तिका; (ii) जङ्गम सेनाओंके व्यवहारका । दोनों प्रत्यक्षसे
असिद्ध हैं ।¹
(ङ) न्यायविरोध—प्रमाणोंसे पदार्थके स्वरूपकी परीक्षा करना 'न्याय'
होता है ।² इस परीक्षामें हेतु, कारण, तर्क, युक्तिका मुख्यतया उपयोग होने
से इसे हेतुविद्या भी कहते हैं ।³ अश्वघोषने दशतोन्मुख पुरुषको 'हेतुबला-
धिक' कहा है ।⁴ इस हेतुविद्या, अपरनाम न्यायविद्या, से दर्शनशास्त्र अभिप्रेत
है, वह चाहे आस्तिक (वेदानुकूल) हो, चाहे नास्तिक (वेदनिन्दक या
ईश्वरका या परलोकका अस्तित्व न मानने वाला) हो । इस प्रकार 'न्याय'
शब्द यहाँ दर्शनकी शाखाविशेषके लिये प्रयुक्त नहीं है, अपितु सामान्यस्वरूप-
परक है⁵ ॥ १७३ ॥
(अ) आचार्यने प्रथम उदाहरण नास्तिक (वेदनिन्दक) हेतुविद्याके विरोध
१. स्थास्नु-जङ्गम-भेदेन लोकं तत्त्वविदो विदुः ।
स च तद्व्यवहारोऽत्र, तद्विरोधकरं यथा ।। काव्याल० ४।३६
(i) तेषां कट-तट-भ्रष्टैर्गजानां मद-बिन्दुभिः ।
प्रावर्तत नदी घोरा हस्त्यश्वरथवाहिना ।। ३७
(ii) धावतां सैन्यवाहानां फेनवारि मुखच्युतम् ।
चकार जानुदघ्नापान् प्रति दिङ्मुखमध्वनः ।।
२. न्यायसूत्र १।१।१ पर वात्स्यायन : प्रमाणैरर्थपरीक्षणं न्यायः ।
३. ललितविस्तर, अध्याय १२, पृष्ठ १५६, में साङ्ख्य, योग, वैशेषिकके
अतिरिक्त हेतुविद्याका उल्लेख कदाचिद् न्यायविद्या (तर्कशास्त्र) के
लिये किया है । यहाँ सामान्य 'दर्शन शास्त्र' अर्थमें प्रयुक्त हुआ है ।
४. सङ्क्लेशपक्षो द्विविधश्च दृष्टस्तथा द्विकल्पो व्यवदानपक्षः ।
आत्माश्रयो हेतुबलाधिकस्य बाह्याश्रयः प्रत्ययगौरवस्य ।। सौ० ५।१६
५. विशेषार्थ देखें तर्कसङ्ग्रहतरङ्गिणी, भूमिका, पृष्ठ चार-पाँच ।
२१० काव्यादर्श [३।१७२-१७३
(घ i) 'आधूतकेसरो हस्ती, (ii) तीक्ष्णशृङ्गस्तुरङ्गमः ।
(iii) गुरुसारोऽयमेरण्डो, (iv) निःसारः खदिरद्रुमः ॥ १७२ ॥
इति लौकिक एवायं विरोधः सर्वगर्हितः ।
(घ) 'हाथी हिलाई हुई सटाओं (अयाल) वाला है। (ii) घोड़ा तीखे
सींगों वाला है । (iii) यह एरण्ड वृक्ष बहुत मजबूत है । (iv) खैरका वृक्ष
निर्बल है ॥ १७२ ॥ यह लोकमें उपलब्ध विरोध सबके द्वारा निन्दित है ।
ग्रामके शास्त्रोक्त स्वरूपके विपरीत स्वरूपका वर्णन उदाहरणके रूपमें प्रस्तुत
किया है।'
दण्डीका कलाविरोधनिरूपण अधिक सूचनापूर्ण तथा शास्त्रके विकासकी
प्रक्रियाको प्रस्तुत करता है ॥ १७१ ॥
(घ) लोकविरुद्ध दोष—आचार्यने इस दोषको स्वतः स्पष्ट चार
उदाहरण देकर स्पष्ट किया है। (i) 'केसर' (अथवा 'केशर') पशुओंमें सिंहों
की या घोड़ोंकी गरदनपर 'अयाल' के नाम से प्रसिद्ध होता है। हाथीके
नहीं होता । हाथीकी विशेषता सूँड (शुण्डा) है, जिसे हाथका काम करनेके
कारण 'कर' या 'हस्त' कहा जाता है। या फिर आगेको निकले दाँत होते हैं।
इन दोनों विशेषताओंके कारण गजको करी, हस्ती (हाथी) और दन्ती,
दन्तावल कहा जाता है। (i) हाथीके अयाल और (ii) घोड़ेके सींग लोकमें
प्रत्यक्षविरुद्ध हैं। (iii) इसी प्रकार एरण्ड (रेंडी) वृक्ष बहुत कमजोर तने
और कम गहरी जड़ों वाला होता है। जबकि (iv) खैरका वृक्ष इसके
विपरीत है। इस प्रकार आचार्यने वन्य और ग्राम्य पशुओं और ग्राम्य और
वन्य वृक्षोंके एकेक उदाहरण देकर इस दोषका स्वरूप स्पष्ट किया है।
१. कला संकलना प्रज्ञा, शिल्पान्यस्याश्च गोचरः ।
विपर्यस्तं तथैवाहुस्तद्विरोधकरं, यथा ॥ काव्यालङ्कार ४।३३
ऋषभात्पञ्चमस्तस्मात् षड्जं धैवतं स्मृतम् ।
अयं हि मध्यमग्रामो मध्यमोत्पीडितर्षभः ॥ ३४
इति साधारितं मोहादन्यथैवावगच्छति ।
अन्यास्वपि कलास्वेवमभिधेया विरोधिता ॥ ३५
षड्ज आदि स्वर पुँल्लिङ्ग हैं। भामहने षड्ज और धैवतको
नपुंसक न जाने किस आधारपर दिया है। उदाहरणका भाष्य देवेन्द्रनाथ
शर्माजीके महाभाष्यमें देखें ।
३।१७८] ५. दोष : (१० च) आगमविरोध २१५
(ii) असावनुपनीतोऽपि वेदानधिजगे गुरोः ।
स्वभावशुद्धः स्फटिको न संस्कारमपेक्षते ॥ १७८ ॥
(ii) उसने उपनयन संस्कारसे रहित होते हुए भी गुरुसे वेदोंका अध्ययन
किया । स्वभावसे शुद्ध (स्वच्छ) स्फटिक मणिको संस्कार (पालिश) की
जरूरत नहीं होती ॥ १७८ ॥
इसे वैश्वानरी इष्टि कहते हैं । इस इष्टिमें अग्निका आधान आवश्यक है ।
ब्राह्मण यजमान और उसकी पत्नी दोनों क्षौम वस्त्र धारण करके वसन्त
ऋतुमें आहवनीय अग्निका आधान करें ।¹ इस प्रकार अग्निका आधान करने
वाले ब्राह्मण दम्पति आहिताग्नि कहलाते हैं । प्रकृत उदाहरणमें अग्न्याधान
नहीं करने वाले विप्रोंको, और वह भी शास्त्रशुद्ध आचरण करने वाले विप्रों
को, वैश्वानरी इष्टिका अनुष्ठान करता बताया है । अतः श्रुतिरूप आगमका
विरोध यहाँ स्पष्ट है ।
इसके अतिरिक्त, इस कथनका एक आशय और हो सकता है : श्रौत
परम्पराके अनुसार विप्रोंको स्नातक होनेके बाद अग्न्याधान करके योग्य
पत्नीका पाणिग्रहण करनेके बाद ही सन्तानोत्पत्ति करनी चाहिए । ये ब्राह्मण
यद्यपि शास्त्रानुसारी शुद्ध आचार वाले हैं, तथापि इन्होंने (१) अग्न्याधान
किये बिना घरमें औरत लाकर (२) उनसे स्वेच्छाचारसे पुत्र प्राप्त कर लिये ।
(३) अब वे लोग वह वैश्वानरी इष्टि कर रहे हैं, जो विधिवद् आहिताग्नि
अजातपुत्र पुरुषके द्वारा पहले सन्तानोत्पत्तिका निमित्त और फिर पुत्र हो जाने
पर की जानी चाहिये । इस प्रकार इस श्लोकमें श्रुतिविरोध नाना प्रकार
से है ।
वितन्वते—वि + √ तन् विस्तारे, कर्तरि लट्, प्र० पु० ब० व० । श्रौत
(आहित) अग्नियोंमें यज्ञकर्म करनेके लिये वि + √ तन्का प्रयोग शास्त्रमें
किया जाता है । इसीलिये श्रौत यज्ञोंको ‘वितान’ कहते हैं² ॥ १७७ ॥
(ii) स्मृतिविरोध—मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्रोंके अनुसार एक उचित
वयस् तक गुरुसे उपनयन संस्कार प्राप्त नहीं करने वाला द्विज न केवल वेदा-
१. तैत्तिरीय ब्राह्मण १।२।६ : वसन्ता ब्राह्मणोऽग्निमादधीत । वसन्तो वै
ब्राह्मणस्यर्तुः । आपस्तम्ब श्रौतसूत्र ५।४।१० : क्षौमे वसानौ जाय-पती
अग्निमादधीयाताम् ।
२. अमरकोष ३।३।१९३ : क्रतुविस्तारयोरस्त्री, वितानं त्रिषु तुच्छके ॥
२१४ काव्यादर्श [३।१७६-१७७
(च) अथागमविरोधस्य प्रस्थानं दर्शयिष्यते ॥ १७६ ॥
(i) ‘अनाहिताग्नयोऽप्येते जातपुत्रा वितन्वते ।
विप्रा वैश्वानरीमिष्टमक्लिष्टाचारभूषणाः’ ॥ १७७ ॥
(च) अब आगमविरोधका स्वरूप (उदाहरणोंसे) प्रदर्शित किया
जायेगा ॥ १७६ ॥
(i) ‘अग्न्याधान नहीं करने वाले भी उत्पन्न हुए पुत्रों वाले, सरल, शुद्ध
आचरण रूपी अलङ्कारों वाले ये ब्राह्मण वैश्वानरीया इष्टि (श्रौत याग) का
अनुष्ठान कर रहे हैं ॥ १७७ ॥
अन्तर्गत भी उन्होंने धर्मशास्त्रों और उनके द्वारा विहित लोकमर्यादाको लिया
है । आन्वीक्षिकीकी कहीं चर्चा नहीं है ।¹ (३) वस्तुतः धर्मशास्त्रकी गणना
त्रिवर्गोक्तिरूप शास्त्र अर्थात् न्यायके रूपमें की ही जा चुकी है । अतः आगम-
विरोधी (धर्मशास्त्र और तत्कृत लोकमर्यादाओंका विरोध करना) दोषका
पृथक्से उल्लेख स्ववचनविरोध है । इस प्रकार भामहका इन दोषोंका निरूपण
शिथिल है, युक्तिसङ्गत नहीं है । दण्डनीतिका सम्बन्ध केवल धर्म या अर्थसे
है । कामपुरुषार्थसे सम्बन्ध है कामशास्त्रका । तत्सम्बन्धी दोष कलाविरोधमें
या आगमविरोधमें समाहित हो जायेगा । तब, यहाँ उसके पुनः कथनकी
आवश्यकता ही नहीं है ।
(च) आगमविरोध—दण्डीने ‘आगम’के अन्तर्गत मनुष्यके लिये व्यक्तिगत
और सामाजिक आचारकी विधायक (i) श्रुति और (ii) स्मृतिको लिया
है, यह पीछे ‘आगम’के लक्षणमें देख चुके हैं । यहाँ इन दोनोंके एकेक उदा-
हरण आचार्यने अगले दो श्लोकोंमें प्रस्तुत किये हैं :
(i) श्रुतिविरोध : तैत्तिरीय संहिताके अनुसार शास्त्रानुसार प्रजोत्पादनके
योग्य (शास्त्रीय पद्धतिसे अग्न्याधान करके दारकर्म कर चुके) पुरुषको सन्तान
नहीं है और सन्तानकी इच्छा है, तो वह अग्न्याधान करके वैश्वानर देवताके
निमित्त द्वादश कपालोंपर संस्कृत पुरोडाशका निर्वाप (आहुति दे) । और
फिर पुत्र होनेपर वैश्वानरके निमित्त द्वादशकपाल पुरोडाशकी आहुति दे ।²
१. आगमो धर्मशास्त्राणि लोकसीमा च तत्कृता ।
तद्विरोधि तदाचारव्यतिक्रमणतो, यथा ॥ काव्याल० ४।४८
२. तैत्तिरीय संहिता २।२।५।१-३ : वैश्वानरं द्वादशकपालं निर्वपेत् ।...
एतामेव निर्वपेत् प्रजाकामः ।...योऽलं प्रजायै सन् प्रजां न विन्दते । यद्
वैश्वानरो द्वादशकपालो भवति ।...विन्दते प्रजाम् । वैश्वानरं द्वादश-
कपालं निर्वपेत्...पुत्रे जाते ।
३।१७८] ५. दोष : (१० च) आगमविरोध २१५
(ii) असावनुपनीतोऽपि वेदानधिजगे गुरोः ।
स्वभावशुद्धः स्फटिको न संस्कारमपेक्षते ॥ १७८ ॥
(ii) उसने उपनयन संस्कारसे रहित होते हुए भी गुरुसे वेदोंका अध्ययन
किया । स्वभावसे शुद्ध (स्वच्छ) स्फटिक मणिको संस्कार (पालिश) की
जरूरत नहीं होती ॥ १७८ ॥
इसे वैश्वानरी इष्टि कहते हैं । इस इष्टिमें अग्निका आधान आवश्यक है ।
ब्राह्मण यजमान और उसकी पत्नी दोनों क्षौम वस्त्र धारण करके वसन्त
ऋतुमें आहवनीय अग्निका आधान करें । १ इस प्रकार अग्निका आधान करने
वाले ब्राह्मण दम्पति आहिताग्नि कहलाते हैं । प्रकृत उदाहरणमें अग्न्याधान
नहीं करने वाले विप्रोंको, और वह भी शास्त्रशुद्ध आचरण करने वाले विप्रों
को, वैश्वानरी इष्टिका अनुष्ठान करता बताया है । अतः श्रुतिरूप आगमका
विरोध यहाँ स्पष्ट है ।
इसके अतिरिक्त, इस कथनका एक आशय और हो सकता है : श्रौत
परम्पराके अनुसार विप्रोंको स्नातक होनेके बाद अग्न्याधान करके योग्य
पत्नीका पाणिग्रहण करनेके बाद ही सन्तानोत्पत्ति करनी चाहिए । ये ब्राह्मण
यद्यपि शास्त्रानुसारी शुद्ध आचार वाले हैं, तथापि इन्होंने (१) अग्न्याधान
किये बिना घरमें औरत लाकर (२) उनसे स्वेच्छाचारसे पुत्र प्राप्त कर लिये ।
(३) अब वे लोग वह वैश्वानरी इष्टि कर रहे हैं, जो विधिवद् आहिताग्नि
अजातपुत्र पुरुषके द्वारा पहले सन्तानोत्पत्तिका निमित्त और फिर पुत्र हो जाने
पर की जानी चाहिये । इस प्रकार इस श्लोकमें श्रुतिविरोध नाना प्रकार
से है ।
वितन्वते—वि + √ तन् विस्तारे, कर्तरि लट्, प्र० पु० ब० व० । श्रौत
(आहित) अग्नियोंमें यज्ञकर्म करनेके लिये वि + √ तन्का प्रयोग शास्त्रमें
किया जाता है । इसीलिये श्रौत यज्ञोंको ‘वितान’ कहते हैं२ ॥ १७७ ॥
(ii) स्मृतिविरोध—मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्रोंके अनुसार एक उचित
वयस् तक गुरुसे उपनयन संस्कार प्राप्त नहीं करने वाला द्विज न केवल वेदा-
१. तैत्तिरीय ब्राह्मण १।२।६ : वसन्ता ब्राह्मणोऽग्निमादधीत । वसन्तो वै
ब्राह्मणस्यर्तुः । आपस्तम्ब श्रौतसूत्र ५।४।१० : क्षौमे वसानौ जाय-पती
अग्निमादधीयाताम् ।
२. अमरकोष ३।३।११३ : क्रतुविस्तारयोरस्त्री, वितानं त्रिषु तुच्छके ॥
२१४ काव्यादर्श [३।१७६-१७७
(च) अथागमविरोधस्य प्रस्थानं दर्शयिष्यते ॥ १७६ ॥
(i) 'अनाहिताग्नयोऽप्येते जातपुत्रा वितन्वते ।
विप्रा वैश्वानरीमिष्टमक्लिष्टाचारभूषणाः' ॥ १७७ ॥
(च) अब आगमविरोधका स्वरूप (उदाहरणोंसे) प्रदर्शित किया
जायेगा ॥ १७६ ॥
(i) 'अग्न्याधान नहीं करने वाले भी उत्पन्न हुए पुत्रों वाले, सरल, शुद्ध
आचरण रूपी अलङ्कारों वाले ये ब्राह्मण वैश्वानरीया इष्टि (श्रौत याग) का
अनुष्ठान कर रहे हैं ॥ १७७ ॥
अन्तर्गत भी उन्होंने धर्मशास्त्रों और उनके द्वारा विहित लोकमर्यादाको लिया
है । आन्वीक्षिकीकी कहीं चर्चा नहीं है ।१ (३) वस्तुतः धर्मशास्त्रकी गणना
त्रिवर्गोक्तिरूप शास्त्र अर्थात् न्यायके रूपमें की ही जा चुकी है। अतः आगम-
विरोधी (धर्मशास्त्र और तत्कृत लोकमर्यादाओंका विरोध करना) दोषका
पृथक्से उल्लेख स्ववचनविरोध है । इस प्रकार भामहका इन दोषोंका निरूपण
शिथिल है, युक्तिसङ्गत नहीं है। दण्डनीतिका सम्बन्ध केवल धर्म या अर्थसे
है । कामपुरुषार्थसे सम्बन्ध है कामशास्त्रका । तत्सम्बन्धी दोष कलाविरोधमें
या आगमविरोधमें समाहित हो जायेगा। तब, यहाँ उसके पुनः कथनकी
आवश्यकता ही नहीं है ।
(च) आगमविरोध—दण्डीने 'आगम'के अन्तर्गत मनुष्यके लिये व्यक्तिगत
और सामाजिक आचारकी विधायक (i) श्रुति और (ii) स्मृतिको लिया
है, यह पीछे 'आगम'के लक्षणमें देख चुके हैं। यहाँ इन दोनोंके एकेक उदा-
हरण आचार्यने अगले दो श्लोकोंमें प्रस्तुत किये हैं :
(i) श्रुतिविरोध : तैत्तिरीय संहिताके अनुसार शास्त्रानुसार प्रजोत्पादनके
योग्य (शास्त्रीय पद्धतिसे अग्न्याधान करके दारकर्म कर चुके) पुरुषको सन्तान
नहीं है और सन्तानकी इच्छा है, तो वह अग्न्याधान करके वैश्वानर देवताके
निमित्त द्वादश कपालोंपर संस्कृत पुरोडाशका निर् वाप (आहुति दे) । और
फिर पुत्र होनेपर वैश्वानरके निमित्त द्वादशकपाल पुरोडाशकी आहुति दे ।२
१. आगमो धर्मशास्त्राणि लोकसीमा च तत्कृता ।
तद्विरोधि तदाचारव्यतिक्रमणतो, यथा ॥ काव्याल० ४।४८
२. तैत्तिरीय संहिता २।२।५।१-३ : वैश्वानरं द्वादशकपालं निर्वपेत् ।···
एतामेव निर्वपेत् प्रजाकामः ।···योऽलं प्रजायै सन् प्रजां न विन्दते । यद्
वैश्वानरो द्वादशकपालो भवति ।···विन्दते प्रजाम् । वैश्वानरं द्वादश-
कपालं निर्वपेत्···पुत्रे जाते ।