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सर्वकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 221, कुल 270 में से

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पृष्ठ 221

१६८ काव्यादर्श [३।१६२
देशादिविरुद्ध दोषके रूपमें निरूपित किया है ।
काव्यके छह प्रमेयोंका स्वरूप आचार्यने निम्नोक्त प्रकारसे बताया है :
(क) देश—प्रत्यक्ष प्रमाणसे ज्ञेय विषयोंमें सर्वप्रथम पदार्थ है सबका
अधिष्ठान देश । काव्यमें देशका वर्णन (अ) पर्वत, (आ) जंगल, नदी, समुद्र,
मरुस्थल, (इ) राष्ट्र (प्रशासनिक इकाई), नगर, ग्राम, घर, बाहर आदिके
रूपमें किया जाता है । अर्थात् भौगोलिक वर्णन देशका विषय है ।
(ख) काल—समयका वर्णन सूर्य या चन्द्रकी गतिके आधारपर कल्पित
लघुतम इकाई 'त्रुटि' अथवा 'क्षण'से लेकर उनके योगसे निष्पन्न प्रातः,
सायम्, रात, दिन, सन्ध्या, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, वर्ष, युग, कल्प आदि
बड़ी मात्राओंके रूपमें किया जाता है । इतिहासभी कालका विषय है ।
(ग) कला—मनुष्यके चार पुरुषार्थों (i) धर्म, (ii) अर्थ, (iii) काम
और (iv) मोक्षमें (iv) मोक्ष निवृत्तिमार्ग होनेसे काव्यका प्रमेय कम ही
होता है । प्रवृत्तिमार्गी तीन पुरुषार्थोंमें (क) धर्म अर्थका साधन है और (ख)
अर्थ कामका है।¹ इन सबका साध्य सुख (आनन्द) है। आनन्दका ही
साधन चौंसठ कलाएँ और १०४ उपकलाएँ हैं । इनमेंसे नाट्य कला आँख
और कान, दो, इन्द्रियोंसे रञ्जनके कारण सर्वाधिक मधुर होती है । नाट्यका
ही अङ्ग है गान्धर्व कला । वह अन्य कलाओंकी प्रतिनिधि है । नाट्याचार्यों
भरत और विशाखिलके अनुसार गान्धर्व विद्याके तीन आश्रय हैं : (i) स्वर
(कण्ठ vocal, तन्त्री instrumental music), (ii) ताल (कर-चरणनिक्षेप)
और (iii) पद (i. शब्दविधान, ii. छन्दोविधान )।² दण्डीने (i, iii) प्रकारके
१. दो पुरुषार्थ धर्म और अर्थ साधन हैं और दो काम और मोक्ष क्रमशः
प्रवृत्ति और निवृत्ति मार्गके साध्य हैं । कामका साधन अर्थ है और अर्थ-
का साधन धर्म है : कामैर्हं स्म वै पुरुषैयः सत्रमासते—'असौ नः कामः ।
स नः समृध्यताम् ।' इति (श० ब्रा० ४।६।६।२३) । निष्काम भावसे
साधित धर्म चित्तशुद्धिकारक होनेसे ज्ञानकी योग्यता उत्पन्न करता है ।
अतः निष्काम धर्म मोक्षका साधन है । द्रष्टव्य गीता-भाष्य-नवाम्बरा,
पृष्ठ ३६ ।
२. गान्धवं त्रिविधं विद्यात् स्वर-ताल-पदात्मकम् । नाटच० २८।११
स्वरा ग्रामावलङ्कारा वर्णाः स्थानानि जातयः ।
साधारणे च शारीर्यां वीणायामेष सङ्ग्रहः ॥ १५
व्यञ्जनानि, स्वरा वर्णाः सन्धयोऽथ विभक्तयः ।