सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 232, कुल 270 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 232

३।१७३-१७४] ५ दोष : (१० ङ) न्याय-विरोध २११
(ङ) विरोधो हेतुविद्यासु न्यायाख्यासु निदर्श्यते ॥ १७३ ॥
(अ) सत्यमेवाह सुगतः संस्कारानविनश्वरान् ।
(ङ) 'न्याय' नामक हेतु विद्याओं (दर्शनशास्त्र, आन्वीक्षिकी) के विषय
में विरोधका प्रदर्शन किया जा रहा है ॥ १७३ ॥
(अ) 'बुद्धने संस्कारोंको नष्ट नहीं होने वाला ठीक ही कहा है, क्योंकि
भामहने लोकका विभाजन दण्डीके समान स्थावर और जङ्गमके रूपमें
करके उसके व्यवहारको 'लोक' कहा है । लोकव्यवहारका विरोध लोक-
विरोध दोष बताया है । इसके उन्होंने दो उदाहरण दिये हैं : (i) स्थावर
नदीकी प्रवृत्तिका; (ii) जङ्गम सेनाओंके व्यवहारका । दोनों प्रत्यक्षसे
असिद्ध हैं ।¹
(ङ) न्यायविरोध—प्रमाणोंसे पदार्थके स्वरूपकी परीक्षा करना 'न्याय'
होता है ।² इस परीक्षामें हेतु, कारण, तर्क, युक्तिका मुख्यतया उपयोग होने
से इसे हेतुविद्या भी कहते हैं ।³ अश्वघोषने दर्शनोन्मुख पुरुषको 'हेतुबला-
धिक' कहा है ।⁴ इस हेतुविद्या, अपरनाम न्यायविद्या, से दर्शनशास्त्र अभिप्रेत
है, वह चाहे आस्तिक (वेदानुकूल) हो, चाहे नास्तिक (वेदनिन्दक या
ईश्वरका या परलोकका अस्तित्व न मानने वाला) हो । इस प्रकार 'न्याय'
शब्द यहाँ दर्शनकी शाखाविशेषके लिये प्रयुक्त नहीं है, अपितु सामान्यस्वरूप-
परक है ॥ १७३ ॥
(अ) आचार्यने प्रथम उदाहरण नास्तिक (वेदनिन्दक) हेतुविद्याके विरोध
१. स्थास्नु-जङ्गम-भेदेन लोकं तत्त्वविदो विदुः ।
स च तद्व्यवहारोऽत्र, तद्विरोधकरं यथा ॥ काव्याल० ४।३६
(i) तेषां कट-तट-भ्रष्टैर्गजानां मद-बिन्दुभिः ।
प्रावर्तत नदी घोरा हस्त्यश्वरथवाहिना ॥ ३७
(ii) धावतां सैन्यवाहानां फेनवारि मुखच्युतम् ।
चकार जानुदघ्नापान् प्रति दिङ्मुखमध्वनः ॥
२. न्यायसूत्र १।१।१ पर वात्स्यायन : प्रमाणैरर्थपरीक्षणं न्यायः ।
३. ललितविस्तर, अध्याय १२, पृष्ठ १५६, में साङ्ख्य, योग, वैशेषिकके
अतिरिक्त हेतुविद्याका उल्लेख कदाचिद् न्यायविद्या (तर्कशास्त्र) के
लिये किया है । यहाँ सामान्य 'दर्शन शास्त्र' अर्थमें प्रयुक्त हुआ है ।
४. सङ्क्लेशपक्षो द्विविधश्च दृष्टस्तथा द्विकल्पो व्यवदानपक्षः ।
आत्माश्रयो हेतुबलाधिकस्य बाह्याश्रयः प्रत्ययगौरवस्य ॥ सौ० ५।१६
५. विशेषार्थ देखें तर्कसङ्ग्रहतारोदय, भूमिका, पृष्ठ चार-पाँच ।