काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०८ काव्यादर्श [३।१७१
इत्थं कलाचतुःषष्टौ विरोधः साधु नीयताम् ।
तस्याः कलापरिच्छेदे रूपमाविर्भविष्यति ॥ १७१ ॥
इस प्रकार चौंसठ कलाओंके विषयमें विरोधका अनुगमन भली भांती
किया जाये । उनका स्वरूप 'कलापरिच्छेद'में प्रकट होगा ॥ १७१ ॥
नहीं होता । तरुणवाचस्पतिने 'भिन्नमार्ग'की जो व्याख्या की है, वह मतङ्गोक्त
'भिन्नग्राम' पर लागू होती है । इसी प्रकार रत्नेश्वरमिश्रने भी 'भिन्नमागोंमें
सातों स्वरोंका समुदाय (जाति) उपनिबद्ध नहीं होता', जो कहा है, वह भी
'भिन्नग्राम' पर ही सही ठहरता है' ॥ १७० ॥
कला-परिच्छेद—'कलाओंका स्वरूप स्पष्ट करनेको लिखा ग्रन्थ या
ग्रन्थांश' कलापरिच्छेदका अर्थ है । रत्नश्रीज्ञानने काव्यादर्शके चौथे परिच्छेद
को कलापरिच्छेद बताकर कहा है कि वह प्रचलित (उपलब्ध) नहीं है ।
लगता है कि उन्हें अपने इस मन्तव्यपर विश्वास नहीं था । अन्यथा उन्होंने
'कलापरिच्छेद'की दूसरी यह व्याख्या न की होती : कलाओंका परिच्छेद
(अभ्यास) होनेपर उनका स्वरूप स्पष्ट होगा । वादीजङ्घालदेवने 'कला-
परिच्छेद' ग्रन्थ बताया है । तरुणवाचस्पतिका कहना है : लोग कहते हैं कि
चौंसठ कलाओंका सङ्क्षेपसे निरूपण करने वाला कोई और भी परिच्छेद
काव्यादर्शका है ।२ इन कथनोंसे सिद्ध होता है कि रत्नश्रीज्ञानसे लेकर तरुण-
वाचस्पति तक सभी टीकाकारोंने इस कथनके स्वरूपको देखकर अन्धेरेमें लाठी
मार्गाः स्युस्तत्र चत्वारो ध्रुवश्चित्रश्च वार्तिकः ।
दक्षिणश्चेति, तत्र स्याद् ध्रुवके मात्रिका कला ॥
शेषेषु द्वे चतस्रोऽष्टौ क्रमान्मात्राः कला भवेत् । सङ्गीतरत्नाकर,
तालाध्याय, ५
१. इस विवेचनमें सहायताके लिये लेखक अपने मित्र डा० शत्रुघ्न शुक्ल,
प्रोफेसर तथा पूर्व अध्यक्ष एवं डीन, सङ्गीतकला निकाय, दिल्लीविश्व-
विद्यालय, का आभारी है ।
२. रत्नश्री : 'कलापरिच्छेदे'—(क) चतुर्थः कलापरिच्छेदोऽस्य दण्डिनोऽस्ति ।
स त्विह न प्रवर्तते । (ख) यद् वा कलानां परिच्छेदेऽभ्यासे सति तस्याः
कलाचतुष्षष्टे रूपमाविर्भविष्यति । तस्मात् कलाऽभ्यासः करणीयो, यतस्
तद्विरोधः सर्वो यथावदवगम्यते । वादिटीका : कलाः परिच्छिद्यन्ते यत्र,
स 'कलापरिच्छेदो' ग्रन्थः । तरुणटीका : कलापरिच्छेदे—चतुष्षष्टिकला-
सङ्ग्रहात्मकः काव्यादर्शस्य कश्चिदन्योऽपि परिच्छेदोऽस्तीत्याहुः । तत्र
कलाचतुष्षष्टिर्द्रष्टव्या ।