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काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ एवं मंगलाचरण

दण्डीरचितः
काव्यादर्शः
'प्रसादिनी' हिन्दी व्याख्या सहित
शिव नारायण शास्त्री

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परिमल संस्कृत-ग्रन्थमाला सङ्ख्या : २७
आचार्यदण्डिरचित
काव्यादर्श
(तृतीय परिच्छेद)
प्रसादिनी
हिन्दी व्याख्या सहित
व्याख्याकार
पण्डित श्रीशिवनारायण शास्त्री
संस्कृत विभाग
किरोड़ीमल महाविद्यालय
दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली-७
परिमल पब्लिकेशन्स
दिल्ली

प्रकाशक :—
परिमल पब्लिकेशन्स
२७/२८ शक्तिनगर
दिल्ली-११०००७
© श्रीशिवनारायणशास्त्रि
प्रथम संस्करण : २०४७ वि०
सन् १६६०
मूल्य : १००-००
मुद्रक : नवीन प्रिन्टर्स
ई-१५० कृष्णविहार,
दिल्ली-११००४१
KĀVYĀDARŚA OF DAṆDIN
Prasādinī Commentary in Hindi
by Sh. Shiv Narain Shastri, First Edn. 1990.

समर्पणम्
गेहिनी सर्व-सौख्यानां मूलं मे सर्व-सम्पदाम् ।
बाल्यादर्द्धाङ्गिनी तारा-देवीत्याख्या मधु-स्मृतिः ॥
विदुषी हस्त-रेखाणां तीर्थ-यात्रा-रुचिः सदा ।
शास्त्राध्ययन-सक्ता सा क्षीणे-प्रारब्ध-कर्मणि ॥
सञ्चितानि स्व-पुण्यानि भोक्तुं लोकाद् दिवं गता ।
सरस्वती-श्रियोर्योगे ममोत्साहेन सङ्गिनी ॥
माधुर्यं जीवने यस्या हेतोर्मे यशसा सह ।
तस्यै समर्प्यते व्याख्याऽऽह्लादि-शास्त्रस्य दण्डिनः ॥
जन्म १ अगस्त १९४२ ई०] [कैलासवास १७ नवंबर १९८४ ई०

मङ्गलम्
सरस्वती श्रीश्च शरीरसम्पदा
गुणाश्च सद्वंश इहोज्ज्वलो महान् ।
सुदुर्लभाः पुण्यततिं विना सदा
न चास्ति सा भागवतीं कृपां विना ॥ १ ॥
सद्योऽधिगन्तुं च समाश्रयेऽम्बिकां
जन्मान्तरे चेन्न ममेह ते समे ।
पराम्बिकेयं न ततोऽस्ति कोमलं
मनस्तु कस्यापि जने समाश्रिते ॥ २ ॥
पुण्यानि मे सन्ति च कान्यपीह यत्
प्रवृत्तिरस्तीह ममांशतः शुभे ।
सुविप्रवृत्तिश्च सुखानि च स्थिता
सरस्वतोपादनिषेवणे मतिः ॥ ३ ॥
विभाति चित्ते च नखच्छटा गिरः
सुदुर्लभा याऽस्ति तपस्विनामपि ।
गिरां प्रदानैश्च सदजर्नैः सदा
प्रकाश्यते ग्रन्थमिषेण चापि यत् ॥ ४ ॥
इतोऽधिका देवगिरोऽभिराधना
भवेत् सुभूयोऽपि ममान्यजन्मनि ।
श्रियस्तु तावत्य इदम्परा मम
गिरोऽभिराद्धिर्न विहन्यते यथा ॥ ५ ॥
शरीरमाद्यं खलु धर्म-साधनं
न साध्यमस्तीति तदर्थना वृथा ।
यथाऽपि साध्यं न विहन्यते तथा
भवेदितिप्रायमिहार्थ्यते मया ॥ ६ ॥
त एव काम्याश्च गुणा अपीह मा-
मवापयेयुर्हि गिरः सुपादयोः ।
त एव दोषा यदि विघ्नतामितास्
तथैव वंशोऽपि च काम्यते मया ॥ ७ ॥

भूमिका
गणनायक विघ्नविघातक सुखदायक हे वन्दन मैं करता ।
दूर किये सब विघ्न हैं मेरे ग्रन्थप्रकाश हुआ पुरता ॥
पाठकके कर कमलोंमें पहुँचे हर्ष अमित सबको देवे ।
सेवा मेरी सुरवाणी औ हिन्दीकी जन जनको हरसावे ॥
१. टीका-लेखनमें निमित्त—आश्विन कृष्ण द्वितीया, शनिवार, २०४३
वि० (२० सितम्बर १९८६ ई०) को प्रातः रेवती नक्षत्रमें मनके उत्साहसे
प्रारब्ध प्रसादिनी भाद्रकृष्ण त्रयोदशी शनिवार, २०४४ वि० (२२ अगस्त
१९८७ ई०) को निशीथकी प्रशान्त वेलामें सम्पूर्ण हुई । इसमें निमित्त पूर्व-
पुरुषोंके आशीर्वाद, गुरुजनोंकी कृपा, गृहजनोंका सहयोग, दण्डीके मतिवैभवके
निरन्तर प्रकाशके कारण उनमें निरन्तर वर्धमान भक्ति एवम् इष्टदेवी
पराम्बाके कुटुम्बकी अहैतुकी अनुकम्पा, ये सब रहे ।
२. तृतीय परिच्छेदका नाम—आचार्य दण्डीके 'तस्याः (कला-चतुःषष्टेः)
कला-परिच्छेदे रूपमाविर्भविष्यति ॥' (काव्यादर्श ३।१७१, पृष्ठ २०८)
कथनसे विदित होता है कि काव्यादर्शमें कमसे कम चार परिच्छेद अवश्य थे ।
पर आज ऊपर उल्लिखित चौथा कला-परिच्छेद उपलब्ध नहीं है । केवल तीन
परिच्छेद ही उपलब्ध हैं । इनमें से प्रथम और द्वितीय परिच्छेदोंकी विषय-
वस्तु तथा उससे सम्बद्ध बातोंका विवरण इन परिच्छेदोंकी भूमिकाओंमें किया
जा चुका है । प्रकृत तृतीय परिच्छेदपर कुछ वक्तव्य आगेके पृष्ठोंमें प्रस्तुत है ।
चौथे परिच्छेदका उल्लेख कला-परिच्छेद नामसे करनेसे प्रतीत होता है
कि आचार्य दण्डीने अपने ग्रन्थके अवयव परिच्छेदोंको उनकी विषय वस्तुके
आधारपर नाम दिये थे । वे आज उपलब्ध ग्रन्थके न मुख्य भागमें मिलते हैं
और न हस्तलेखोंमें उसकी पुष्पिकाओंमें । दण्डीने 'काश्चिन्मार्ग-विभागार्थ-
मुक्ताः प्रागप्यलंकियाः' (२।३) में प्रथम परिच्छेदकी विशेषता 'मार्ग-विभाग'
बताई है । प्रथम परिच्छेदकी संज्ञा दण्डीको मार्ग-विभाग परिच्छेद इष्ट थी,
यह सूचित होता है । इसीलिए आचार्य रत्नश्रीज्ञानने उस परिच्छेदकी टीका-
की पुष्पिकामें प्रथम परिच्छेदका उल्लेख 'मार्ग-विभाग परिच्छेद'के नामसे
किया है ।

(६) काव्यादर्श [भूमिका

द्वितीय परिच्छेदकी विषय वस्तु स्पष्टतः अर्थालङ्कार हैं । अतः उसका
नाम 'अर्थालङ्कार परिच्छेद' आचार्यको इष्ट है । रत्नश्रीमें भी यही नाम
दिया है ।
तृतीय परिच्छेदकी विषयवस्तु (क) सुकर दुष्कर शब्दालङ्कार (३।१-१२४,
पृष्ठ १-१५१) तथा (ख) दोष (३।१२५-१८६, पृष्ठ १५२-२२०) हैं । अतः
इस परिच्छेदकी क्या संज्ञा दण्डीको इष्ट रही होगी, यह निर्णय करना कठिन
है । 'प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति' (गौण और प्रधानमें से प्रधानके आधारपर
नाम रखे जाते हैं) न्यायसे तो इसका नाम शब्दालङ्कार परिच्छेद उचित है ।
आचार्य रत्नश्रीज्ञानने इसका उल्लेख 'दुष्कर परिच्छेद' नामसे किया है ।
शब्दालङ्कारों (४-१२४) में ४-३७ श्लोकों तक सुकरका निरूपण आचार्यने
किया है । तथा शेष ३८-१२४ श्लोकोंमें दुष्कर अलङ्कारोंका । अतः १८७
श्लोकों वाले परिच्छेदमें ८७ श्लोकोंमें निरूपित दुष्करको प्रधान मानना एक
विषयके निरूपक श्लोकोंकी अधिकतम संख्याके आधारपर तो उचित है, परंतु
समग्र संख्याकी अपेक्षासे उचित नहीं है । अतः प्रसादिनीमें इसे शब्दालङ्कार-
दोष परिच्छेद नाम दिया है । इस नामसे इस परिच्छेदका सम्पूर्ण विषय
प्रकट हो जाता है ।
३. विषय-विवेचन—(क) सिंहावलोकन : काव्यादर्शका विषय काव्य-
लक्षण है । 'लक्षण' शब्द √लक्ष् + ल्युट् (करण) में निष्पन्न है । प्रकृत ग्रन्थ
काव्यको लक्षित करनेका साधन है । लक्ष्यसे तात्पर्य है निरूपित करना, मुख्य
चिह्नोंको बताना । अतः काव्यके स्वरूपके अन्तर्गत मुख्य विशेषताओंको
बताना प्रकृत ग्रन्थका प्रधान विषय है । काव्यके ये लक्षण—मुख्य धर्म—
काव्यकी बाह्य और आन्तरिक संरचनाके मुख्य (स्वरूपाधायक) तत्त्व हैं ।
इनके बिना काव्य काव्य ही नहीं होगा । इन तत्त्वोंको आचार्य दण्डीने सर्व
प्रथम (१।८ में) ग्राह्य (गुण) और हेय (दोष) की दृष्टिसे देखकर पहले
ग्राह्य पदार्थोंका निरूपण दो क्रमोंमें किया है : (क) काव्यकी बाह्य संरचना
अर्थात् काव्य-शरीर (१।१०-३६) तथा (ख) उस काव्यशरीरको शोभा-
युक्त करने वाले तत्त्व अर्थात् अलङ्कार (१।४० से ३।१२४ तक) । (ख)
अलङ्कारका निरूपण आचार्यने (अ) मार्ग-विशेषसे सम्बद्ध और (आ) सर्व-
मार्ग-साधारणके रूपमें किया है । प्रथमको उन्होंने गुण नाम दिया है और
द्वितीयका अलङ्कार नाम ही रहने दिया है (२।३ देखें) । (अ) गुणका निरू-
पण प्रथम परिच्छेदके शेष भागमें किया है तथा (आ) साधारण अलङ्कारका

निरूपण उसे आश्रय (१) अर्थ और (२) शब्दके आधारपर दो विभागोंमें
बाँट कर (१) अर्थालङ्कारोंका प्रतिपादन द्वितीय परिच्छेदमें और (२) शब्दा-
लङ्कारोंका तृतीय परिच्छेदके १-१२४ श्लोकोंमें किया है। इसके अनन्तर हेय
तत्त्व, अर्थात् काव्यनिर्माणमें विविध भङ्गियोंसे आने वाले दोषोंका निरूपण
(३।१२५-१८६ में) किया है।
(ख) तृतीय परिच्छेद : इस परिच्छेदमें आचार्यने काव्यमें ग्राह्य तत्त्वों
१ यमक (१-७७), २ आकार बन्ध (७८-८२) और ३ वर्णनियम (८३-९५)
के भेदसे द्विविध चित्रबन्ध, ४ प्रहेलिकाओं (९६-१२४) इन चार शब्दा-
लङ्कारोंका निरूपण इनके लक्षण, भेद तथा उदाहरण देकर किया है। इसके
बाद (१२४-१८६ में) हेय तत्त्वों दोषोंका निरूपण किया है।
(१) यमक : प्रथम अढ़ाई श्लोकोंमें आचार्यने यमकका (क) लक्षण तथा
(ख) भेदविकल्पनके आधार बताकर इसके भेदोंको 'अत्यन्तबहु' बताया है।
(क) लक्षण : वर्णोंकी विशिष्ट आवृत्ति यमक होता है।
(ख) भेदविकल्पनके आधार : ये आधार आचार्यने तीन प्रकारके बताये
हैं: (अ) आवृत्तिकी (१) निरन्तरता तथा (२) सान्तरताके आधारपर (१)
अव्यपेत, (२) व्यपेत, (३) अव्यपेत-व्यपेत । (आ) आवृत्तिके अधिष्ठानके
आधार पर पादके (१) आदि, (२) मध्य तथा (३) अन्त स्थानों तथा
(इ) आवृत्तिकी व्याप्तिके विषयके आधारपर (१) एक, (२) दो, (३) तीन
तथा (४) चार पादोंमें व्याप्ति । इन दस आधारोंके पर-स्पर संयोजनके
फलस्वरूप यमकके वस्तुतः 'अत्यन्तबहु' हो जाते हैं। हमारी गणनाके अनुसार
(द्रष्टव्य प्रसादिनी पृष्ठ ६) ये ३१५ होते हैं।
इनमें से कुछ भेद सुकर होते हैं, तो कुछ दुष्कर । आचार्यने पहले (४-३७
श्लोकोंमें) सुकर यमक दिये हैं, उसके बाद (३८-७७ श्लोकोंमें) दुष्कर ।
दुष्करता भी क्रमशः वर्धमान रूपमें प्रदर्शित की है। पादाभ्यास यमकका
अन्तिम 'महायमक' भेद (पृष्ठ ८०-८२) तथा प्रतिलोमयमक दुष्करताकी
पराकाष्ठा हैं। यमकके कुशल प्रयोक्ता कवियों भारवि और भट्टिके काव्योंमें
भी इनके उदाहरण इक्के-दुक्के ही मिलते हैं।
(२) आकार चित्र बन्ध : आचार्यने 'चित्र' शब्दका प्रयोग 'आकारप्रदर्शक
चित्र' अर्थमें और 'विचित्र' अर्थमें किया है (द्रष्टव्य पृष्ठ ६५) । अतः 'चित्र
बन्ध' का विषय 'गोमूत्रिका' आदि आकारबन्ध और वर्णनियमवान् प्रयोग
अभिप्रेत हैं।

(८) काव्यादर्श [भूमिका

आकारबन्ध अलङ्कारोंमें उन्होंने (१) गोमूत्रिका (७८-७६), (२) अर्ध-
भ्रम (८०-८१), (३) सर्वतोभद्र (८०, ८२) नामक तीन बन्धोंका प्रदर्शन
किया है । ये बन्ध दुष्कर हैं यह स्वतः स्पष्ट है ।
(३) वर्णनियमवान् चित्र बन्ध : इसके आचार्यने तीन भेद किये हैं : (१)
स्वरनियमवान्, (२) उच्चारण-स्थान-नियमवान्, (३) वर्णनियम (व्यञ्जन)
नियमवान् । इस भेदविकल्पनका आधार स्वर-व्यञ्जनके रूपमें वर्णोंकी
द्विविधता तथा उनके उच्चारणस्थान हैं । यह अलङ्कार आचार्यने सुकर और
दुष्कर दोनों प्रकारका बताया है । इन उपादानोंका जितनी कम मात्रा
में शुद्ध या मिश्रित रूपमें प्रयोग होगा, दुष्करता उतनी ही बढ़ती जाएगी ।
यदि तीनों उपादानोंमें मात्रा तथा स्वरूपकी दृष्टिसे एकरूपता कर दी जाए,
तो बन्ध बहुत दुष्कर हो जायेगा । आचार्यने दोनों प्रकारकी दुष्करता उदा-
हरणोंसे प्रदर्शित की है । उनका एकव्यञ्जननियमवान् चित्रबन्ध (६५, पृष्ठ
११८) तो भारविके बन्ध (किरातार्जुनीय १५।१५) से भी दुष्कर है। पृष्ठ
११६ देखें।
(४) प्रहेलिका : प्रहेलिकाओंका प्रयोग क्रीडार्थ अत्यन्त प्राचीनकालसे
होता आया है। ये वैदिक वाङ्मयमें भी मिलती है। दण्डीने उनका स्वरूप
शब्दसे ही प्रकाशित हो जानेके कारण सम्भवतः नहीं बताया है । उनके दो
प्रयोजन तथा उनके उपयोगके अवसर बताकर उनका स्वरूप भी स्पष्ट कर
दिया है। ये प्रयोजन और अवसर हैं गोष्ठियों और मनोविनोदके अवसरों
पर क्रीडाके निमित्त परव्यामोहन (६७, पृष्ठ १२२) । इसके बाद आचार्यने
(६८-१०५ श्लोकों, पृष्ठ १२५-१३२ में) पूर्वाचार्योक्त १६ प्रहेलिकाओंके
लक्षण बताए हैं। उन्होंने पूर्वाचार्योक्त दोषयुक्त १४ प्रहेलिकाओंका निरूपण
उनकी दूषितताके आधार दोष अपरिसङ्ख्येय हैं, इसलिए नहीं किया । अर्थात्
दुष्ट प्रहेलिकाएँ १४ तो क्या, वस्तुत उनकी गिनती करना सम्भव नहीं है ।
अतः जिन प्रहेलिकाओंपर उनके लक्षण अव्याप्ति, अतिव्याप्ति आदि दोषत्व
के प्रयोजकोंके कारण न घट सकें, उन्हें 'दुष्ट प्रहेलिका' समझा जाए । उनको
अलगसे कहनेकी आवश्यकता नहीं है (१०६-१०७, पृष्ठ १३२-१३३) । इसके
बाद (१०८-१२४ श्लोकों, पृष्ठ १३८-१५१ में) उपर्युक्त १६ साधु प्रहे-
लिकाओंके उदाहरण प्रस्तुत किये हैं ।
(५) दोष : इस प्रकार काव्यके आदेय तत्त्वोंको प्रस्तुत करनेके बाद
आचार्य दण्डीने काव्योंमें वर्जनीय दस दोषोंका निरूपण प्रारम्भ किया है ।
सबसे पहले उन्होंने १२५-१२६ श्लोकोंमें उन वर्जनीय दोषोंका परिगणन

भूमिका] विषयविवेचन (६)
किया। फिर उनके समयमें प्रचलित न्यायशास्त्रीय अनुमिति ज्ञानके प्रतिज्ञा,
हेतु और दृष्टान्तमें हीनतापर आधारित एक दोषपर विचारको (१२७ वें
श्लोक) कर्कशप्राय होनेसे अनावश्यक बताकर इस परिगणनको सीमित किया।
वर्गीकरण : आचार्य द्वारा बताए इन १० दोषोंको हम प्रथमतः दो वर्गोंमें
बांट सकते हैं : (क) अपार्थ आदि ९ दोष (१२५ वाँ श्लोक), तथा (ख)
देशादिविरोध रूप १० वाँ दोष (१२६ वाँ श्लोक) ।
(क) अपार्थ आदि ९ दोषोंमें से १ अपार्थ, और २ व्यर्थ विवक्षित अर्थ
को ठीकसे न कह पानेसे सम्बद्ध अर्थदोष हैं। ३ एकार्थ (पौनरुक्त्य) शब्द-गत
और अर्थगत दो प्रकारका है। ४ संशय, ५ अपक्रम काव्यमें वर्णित वस्तुओं
को उक्त (शब्दोपात्त) या औचित्यलब्ध (न्यायोपात्त) क्रमसे न रखनेसे होने
वाला दोष है। शेष चार ६ शब्दहीन, ७ यति-भ्रष्ट, ८ भिन्न-वृत्त और ९
विसन्धिक दोष व्याकरण और छन्दःशास्त्रके नियमोंके उल्लङ्घनसे होने वाले
शास्त्रीय शब्दगत दोष हैं। इन ९ दोषोंमें से ७ यति-भ्रष्ट, ८ भिन्नवृत्त नित्य
दोष हैं, जबकि शेष ७ दोष विशेष परिस्थितियोंमें ग्राह्य भी हो जाते हैं।
अतः अनित्य दोष हैं।
(ख) दूसरे वर्गके देशादिविरोध दोषके छह भेद हैं। दण्डीने दोषोंकी
भरतोक्त सङ्ख्याको बनाए रखनेके लिए ही इस दोषको एक दोषके रूपमें
जोर देकर बताया है। वस्तुतः तो इसके आधार परस्पर बहुत भिन्न हैं। उन्हें
यदि एक नहीं कहा जा सकता, तो उनपर आधारित दोष कैसे एक हो सकते
हैं ? इसलिये इस दोषको एक दोष न कहकर छह दोषोंका एक वर्ग मानना
उचित है। ये दोष कविके वर्ण्य देश, कालचक्र, इतिहास, लोक-वृत्त, सामाजिक
गठन, विभिन्न विद्याओं और वेदादि शास्त्रोंके ज्ञानमें त्रुटि होनेसे—दण्डीके
शब्दोंमें 'कविके प्रमादसे'—आते हैं। इन दोषोंको पकड़ना भी आसान नहीं
है। कवि और सहृदय दोनोंको इनके त्रुटिरहित ज्ञानकी अपेक्षा होती है।
पिछले वर्गके अधिकांश दोषोंके समान ये छहों दोष अनित्य दोष हैं। परि-
स्थितिविशेषमें इनके विषयमें त्रुटियुक्त कथन दोष न रहकर गुण बन जाते हैं।
(क) इस वर्गके दोषोंके वर्णन (श्लोक १२८-१६१) में आचार्यने इनके
लक्षण, उदाहरण देकर दोषता तो बताई ही है, वे परिस्थितियां भी वे साथ-
साथ बताते चले हैं, जिनमें ये दोष न रहकर गुण बन जाते हैं।
(ख) देशादि विरोध दोषका वर्णन उन्होंने (i) इस दोषके आधार देश
आदि छह विषयोंके भेदोंका उपलक्षण (श्लोक १६२-१६३ में) करके (ii)

(१०) काव्यादर्श [भूमिका
उसका लक्षण (१६४ में) बताकर फिर (iii) प्रत्येक भेदके अवान्तर भेदोंके
उदाहरण (१६५-१७८ श्लोकोंमें) देकर किया है ।
देशादिके विषयमें प्रमादसे प्रसिद्धिविपरीत कथन देशादिविरोध दोष
होता है । किंतु कविके द्वारा कौशलसे जानबूझकर किया इस प्रकारका
कथन ‘दोष’ न कहलाकर ‘गुण’ कहलाता है (१७६) । अगले छह (१८०-
१८५) श्लोकोंमें आचार्यने देशादिविरोधी कथनोंकी गुणताके छह उदाहरण
प्रस्तुत करके अपने कथनको पुष्ट किया है ।
उसके बाद एक (१८६ वें) श्लोकमें आचार्य दण्डीने तृतीय परिच्छेदके
वर्ण्य विषयोंका परिगणन करके अपने विस्तीर्ण निरूपणको 'संक्षेपसे दिखलाना'
बताकर अपना विनय और शास्त्रकी अनन्तता सूचित की है ।
इसके अनन्तर (१८७वें श्लोकमें) उन्होंने पूर्व परिच्छेदोंके समान इस
परिच्छेदका भी उपसंहार इस परिच्छेदके विशेष कथ्य दोषता और गुणताका
महत्त्व एक कमनीय कल्पनासे करके परिच्छेदकी समाप्ति की है ।
समाप्तिपद्यमें 'दोष-गुण' को विशेष महत्त्व देकर आचार्य कदाचिद् यह
सूचित करना चाहते हैं कि यदि परिस्थितिविशेषमें कोई दोष गुण बन जाता
है, तो परिस्थितिविशेषमें कोई गुण भी दोष बन सकता है, यह इस विवेचनसे
व्युत्पन्न बुद्धि वाले कवि और सहृदयको समझ लेना चाहिए ।
इस श्लोकमें अनुपद उक्त दोषोंकी दोषता और गुणतामात्रके उल्लेखसे
यह भी सूचित होता है कि यह श्लोक काव्यादर्शका अन्तिम श्लोक नहीं है ।
आचार्य इसे तृतीय परिच्छेदकी फलश्रुतिके कथनके रूपमें ही दे रहे हैं । यदि
यह ग्रन्थका अन्तिम श्लोक होता, तो आचार्य पिछले विषयसङ्ग्रह श्लोकमें
तथा यहाँ भी समूचे काव्यादर्शसे सम्बद्ध कुछ बातें कहते । कला-परिच्छेदकी
वक्ष्यमाणताके उनके कथनको देखते हुए भी इस परिच्छेदकी समाप्तिपर
काव्यादर्शकी समाप्ति सिद्ध नहीं होती ।
भगवती भवितव्यतासे प्रार्थना है कि वे अपने आंचलमें छुपे इस अंशको
प्रकाशित करें और उसकी व्याख्या करनेका अवसर तथा शक्ति मुझे, इस जन्म
में तो उन विषयोंका ज्ञान सम्भव नहीं अतः, जन्मान्तरमें प्रदान करे । बहुत
अच्छा हो, मेरा जन्म भी काञ्चीकी उस पावन भूमिमें ही हो, जो आचार्य
दण्डीके चरणोंसे पवित्र हुई है ।
४. प्रसादिनीके बारेमें कुछ—आचार्य भरतका नाट्यके बारेमें यह कथन
काव्यपर भी पूरी तरहसे लागू होता है कि न ऐसा कोई ज्ञान है, न ऐसा

भूमिका] विषयविवेचन (११)

कोई शिल्प है, न ऐसी कोई विद्या है, न ऐसी कोई कला है, न ऐसा कोई योग
है, न ऐसा कोई कर्म है, जो नाट्यमें नहीं दिखलाई देती, उपयोगी नहीं
होती।¹ बड़े लोगोंकी बड़ी बात। बड़े कवियोंके काव्य, बड़े आचार्योंके शास्त्र
इतने अधिक व्यापक होते हैं कि उन्हें हृदयंगम कर पाना बहुत कठिन होता
है। तब उन्हें औरोंको समझाना तो और भी कठिन कार्य है। एक शास्त्र
अपने अनुकूल प्रतिकूल बहुतसे शास्त्रोंसे गहराईसे जुड़ा होता है। फिर सबसे
ऊपर अत्यन्त दुरूह लोकवृत्त, जिसे वे कभी भी आँखसे ओझल नहीं करते।
आचार्य दण्डीका काव्यादर्श तो शास्त्र भी है और काव्य भी। अतः इसकी
विषय वस्तुकी व्यापकताको परिसीमित कर पाना अत्यन्त कठिन कार्य। मेरे
जैसे साधारण बुद्धि, साधारणतर ज्ञान और साधारणतम शक्ति वाले ब्राह्मण
वटुका उसकी व्याख्या करके उसके प्रसादनका प्रयास महासाहसका कार्य या,
दुःसाहसिक अभियान !
मैं अपने इस लक्ष्यमें कहाँ तक सफल हुआ हूँ, यह तो विज्ञ जन जानेंगे।
मैंने तो अपनी शक्तिभर श्रम करके काव्यादर्शके दुरूह मर्म तक पहुँचनेकी
चेष्टा करके अपना जन्म कृतार्थ मान लिया है। जिन दिनों यह कार्य चल
रहा था, उन दिनों में नित्य गङ्गास्नानकी पावनता अनुभव करता था।
प्रसादिनीके तीनों परिच्छेदोंके अन्तमें संलग्न सन्दर्भग्रन्थसूचीसे पाठकोंको
यह समझना कठिन नहीं होगा कि काव्यादर्शके मर्मोद्घाटनमें संहिता, ब्राह्मण,
आरण्यक, उपनिषद्, शिक्षा (प्रातिशाख्य), कल्प (श्रौत सूत्र), छन्द, निरुक्त,
व्याकरण, कोष, दर्शनशास्त्रकी आस्तिक नास्तिक कई शाखाओं, पुराण, इति-
हास (महाभारत), कामसूत्र, गद्य-पद्य-नाटक काव्य, काव्यशास्त्रकी भरतसे
प्रारब्ध शोभाकर मित्रान्त लम्बी परम्परा तथा बादके भी कई आचार्यों, इनके
टीकाकारों, आधुनिक लेखकों, इतिहास ग्रन्थों, भू-भौतिकी, सङ्गीतशास्त्र
आदि ज्ञानकी नाना शाखा-प्रशाखाओंका सहारा लेना आवश्यक हुआ है।
अपनी तरफसे कोई कोशिश छोड़ी नहीं है।
ग्रन्थका मुद्रण शुद्ध हो, इसका यथासम्भव प्रयास किया है। तथापि
मानवसुलभ त्रुटियों, अकेले लेखन, प्रूफशोधन आदि समस्त कार्यभारके वहन
की व्यस्तता-व्यग्रता, प्रेसके प्रमाद आदि विविध कारणोंसे यत्रतत्र अशुद्धियाँ
रह गई हैं। कृपालु पाठकोंको सुबोध होनेसे उनके शुद्धिपत्रकी आवश्यकता
नहीं समझी है।

१. न तज्ज्ञानं, न तच्छिल्पं, न सा विद्या, न सा कला।
नासौ योगो, न तत् कर्म नाट्यॆऽस्मिन् यन्न दृश्यते ॥ नाट्यशास्त्र १।११६

(१२) काव्यादर्श [भूमिका
५. आभार—अन्तमें में अपने कार्यमें सब कृपालु उपकारक प्रिय मित्रों
डॉ० सत्यदेव चौधरी, डॉ० रविशङ्कर नागर, डॉ० योगेश दत्त शास्त्री, डॉ०
शत्रुघ्न शुक्ल, डॉ० जगदीशचन्द्र मूना (निदेशक, हिन्दी माध्यम कार्यान्वयन
निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, माडल टाउन), दिवङ्गत विभूति डॉ०
भोलानाथ तिवारी तथा अपने किरोड़ीमल महाविद्यालयमें विषयान्तरके
सहयोगियों श्री गुम्मा जानकीरामराव, तथा डॉ० गिरीशचन्द्रका अत्यन्त
आभारी हूँ ।
प्रिय सहधर्मिणी श्रीमती कुसुम शर्माके मौन किन्तु सर्वाधिक उपयोगी
सहयोगका तो आभार प्रकट कर पाना सम्भव ही नहीं है।
परिमल पब्लिकेशंस् २७/२८, शक्तिनगर, दिल्ली, के स्वामी आयुष्मान्
श्री कन्हैयालाल जोशीका तथा मुद्रक नवीन प्रिन्टर्स, ई-१५०, कृष्णविहार
दिल्ली, के स्वामी श्रीभगवान्दास यादवका भी अत्यन्त कृतज्ञ हूँ ।
(निवेदन)
वृषं जिगमिषावर्के सोमवारे निशामुखे ।
ऋष्याश्रमखनेत्राख्ये २०४७ सुभानौ वैक्रमेऽब्दके ॥
ज्येष्ठे कृष्णे चतुर्थ्यां च मईदिने चतुर्दशे ।
नभोऽङ्काङ्कभूवर्षे १९९० ईसवीयेऽक्षि-बाणके ॥
गतेऽब्दे वयसः प्रीत्या गुरूणां कृपया मयि ।
पूर्वेषामाशिषां राश्या पुण्यैः समुदितैर्मम ॥
शाब्द्येषा ग्रथिता स्रग्वै दण्डि-हार्द-प्रसादिनी ।
सम्पूर्णाऽर्थच्छटाशुभ्रा शास्त्र-चर्चा-सुगन्धिनी ॥
ध्यात्वा पादयुगे गौर्यास्तदङ्क-भूषि-तुन्दिनः ।
अर्प्यते श्रद्धया तत्र विधाय मौलिनाऽञ्जलिम् ॥
शिवनारायणः शास्त्री समभ्यर्थयते बुधान् ।
अशेष-स्नेहतः शेषा कण्ठे यत् क्रियतामियम् ॥
अलं प्रार्थनया वाऽस्तु गुणगृह्या विपश्चितः ।
गुणानस्यां लभेरंश्चेत् स्वयं कुर्युहि मस्तके ॥
दूराद् गन्धमुपाघ्राय वने क्षुप-समावृतम् ।
अपि पुष्पं स्तुवन्तो वै चञ्चरीका मधु-व्रताः ॥
ई ४/२५, माडल टाउन, —शिवनारायणः शास्त्री ।
दिल्ली—११०००६ ।