सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 223, कुल 270 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 223

२०० काव्यादर्श [३।१६४
तेषु तेष्वयथारूढं यदि किञ्चित् प्रवर्तते ।
कवेः प्रमादाद् देशादिविरोधीत्येतदुच्यते ॥ १६४ ॥
उन-उन (देशादि) विषयोंमें कविके प्रमादसे यदि प्रसिद्धिके विपरीत कुछ
(काव्यमें) होता है, तो वह (१०) देशादिविरोधी कहा जाता है ॥ १६४ ॥
(ङ) न्याय — 'हेतुविद्या' शब्द 'आन्वीक्षिकी'का पर्याय है, जो स्वयं
'दर्शनशास्त्र'का पर्याय है । कार्य-कारण सम्बन्धके विवेचनसे समस्त जगत्का
अन्वीक्षण करनेसे यह विद्या 'कारणविद्या', 'हेतुविद्या', 'तर्कशास्त्र', 'अन्वी-
क्षण', 'दर्शन' आदि शब्दोंसे अभिहित होती है ।¹ लोककी प्रवृत्ति तथा उसके
प्रयोजनको सूक्ष्मतासे समझनेके लिये हेतुविद्याकी परम उपयोगिता है । अतः
आचार्यने (घ) लोकके बाद तथा उससे पृथक् इसका निरूपण किया है । यह
अन्य इसी प्रकारकी विद्याओंका उपलक्षक है ।
(च) आगम — विद्यास्वरूप होते हुए भी श्रुति और उसकी अविरोधी या
विरोधी परम्परा (स्मृति) सदासे हेतुविद्यासे पृथक् एक प्रमाणके रूपमें मान्य
रही है । यह उपलक्षक है इतिहास, पुराण तथा विभिन्न देशों, कालोंमें
विभिन्न समाजोंमें विकसित सामाजिक शास्त्रोंका ॥ १६३ ॥
काव्यके इस षड्‌विध वर्ण्य विषयके यथार्थ, प्रमाणसिद्ध स्वरूपके विरुद्ध
जो कुछ अपनी अशक्तिसे, या प्रमादसे कवि प्रतिपादित करता है, वह सब
जिस-जिस विषयका विरोध उसमें होता है, उस-उसका विरोधी कहलाता है ।
सहृदय जनको उद्वेजक होनेसे यह दोष है ।
भामहने दण्डी जैसा विस्तार तो नहीं किया है, पर छहों भेदोंका निरूपण
प्रायः दण्डीकी दिशामें ही किया है । वामनने सम्भवतः भरतके अधिक अनु-
कूल होनेकी चेष्टामें (क) देश, काल और स्वभावसे विरोधीको देशविरोधी
दोष बताया है । और (ख i) कलाशास्त्रों, तथा (ii) चतुर्वर्ग (धर्मार्थकाम-
मोक्ष सम्बन्धी) शास्त्रोंसे विरोधीको 'विद्याविरुद्ध' नामक दोष बताया है ।²
इस वर्णनमें वामनके (क) देश, काल एवं स्वभाव दण्डीके देश, काल एवं
लोकप्रवृत्ति हैं ! (ख i) कलाशास्त्र दण्डीकी कला है । (ii) चतुर्वर्गशास्त्रमें
दण्डीके न्याय और आगम समाहित हैं । १६४ ॥
१. तर्कसङ्ग्रह तारोदय, भूमिका, पृष्ठ चार देखें ।
२. काव्याल० सूत्र २।२।२३-२४ : (क) देशकालस्वभावविरुद्धार्थानि लोक-
विरुद्धानि । (ख) कला-चतुर्वर्गशास्त्र-विरुद्धार्थानि विद्याविरुद्धानि ।