काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३।१६६-१७० ] ५ दोष : (१० ग) कला-विरोध २०५
(ग) मार्गः कलाविरोधस्य मनागुद्दिश्यते यथा ॥ १६६ ॥
(i) 'वीर-शृङ्गारयोर्भावौ स्थायिनौ क्रोध-विस्मयौ' ।
(ii) 'पूर्णसप्तस्वरः सोऽयं भिन्नमार्गः१ प्रवर्तते' ॥ १७० ॥
(ग) 'कलाविरोध' दोषके मार्ग (प्रकार, स्वरूप) का कथन कुछ (नाम-
मात्र देकर) किया जा रहा है । जैसे—॥ १६६ ॥
(i) 'वीर, शृङ्गार (रसों) के स्थायी भाव क्रोध और विस्मय हैं' ।
(ii) 'वह यह पूरे सातों स्वरों वाला भिन्नमार्ग चल रहा है' ॥ १७० ॥
में कलिकी प्रवृत्तियोंका या कलियुगमें सत्ययुगकी प्रवृत्तियोंका वर्णन काल-
विरोध होगा । ऐसे ही मन्वन्तर विरोधादि भी समझें । युगादिविरोधमें शब्द-
प्रमाण (पुराणादिप्रतिपादित स्वरूप) का उल्लङ्घन होगा । इतिहासविरोध
भी 'कालविरोध' है ।
निर्दोषता : देश-काल-विरोध यदि काव्यमें युक्तियुक्त रूपमें प्रस्तुत किया
जाता है, तो दोष नहीं होगा । जैसे तपोवनमें आश्रमवासी ऋषिकी तपस्याके
प्रभावको निरूपित करनेके लिए कवि यदि सिंह-मृग, अहि-नकुल, गो-व्याघ्रमें
परस्पर प्रीति दिखाता है, या अन्य देश और कालमें स्थित वस्तुकी भी वहाँ
उपस्थितिका वर्णन करता है, तो वह देशविरोध और कालविरोध दोष नहीं
होगा । अतः यह दोष अनित्य है । आगे १८०-१८१ श्लोक देखें ।
(ग) कलाविरोध दोष—त्रिपुरहरभूपालद्वारा उद्धृत भामहके अनुसार
मुख्य कलाएँ चौंसठ हैं और उपकलाएँ ५०४ हैं ।२ सब कलाओंका तो दूर
किसी एक कलामें भी दोषोंका निरूपण क्लिष्ट कार्य है । इस लिये आचार्यने
स्वकृत विरोधप्रदर्शनको 'मनाक्' कहा है ॥ १६६ ॥
(i) नाट्यकलाविरोधका उदाहरण : वीर एवं शृङ्गार क्रमशः अर्थाश्रय
एवं कामाश्नय रस हैं । रसकी अनुभूति सर्वाधिक उत्कृष्ट रूपमें प्रेक्षणीयक
(नाट्य) में होती है । अतः तत्सम्बन्धी उदाहरण दिया है । वीर एवं शृङ्गार
रसोंके स्थायी भाव क्रमशः उत्साह और रति होते हैं । उनकी जगह क्रोध
और विस्मयको उनका स्थायी भाव कहना नाट्यकलाके विरुद्ध है । क्रोध रौद्र
रसका और विस्मय अद्भुतका स्थायी होता है । क्रोध और विस्मय वीर और
१. सरस्वतीकण्ठाभरण १।७४में धृत 'भिन्नग्रामः' पाठ उचित है । टीका
देखें ।
२. कामधेनु १।३।७ : कला नृत्यगीताऽऽदयश्चतुःषष्टिः । उपकलाश्चतुःशतम्;
अत्र कलानामुद्देशः कृतो भामहेन ।