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सर्वकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 226

३।१६७] ५ दोष : (१० ख) काल-विरोध २०३
(ख. अ) पद्मिनी नक्तमुन्निद्रा, (आ) स्फुटत्यह्नि कुमुद्वती ।
(ख. अ) पद्मिनी रातको खिली है । (आ) कुमुदिनी दिनमें चटकती है ।
या तो पल्लवाभ्युदयसे पूर्व था, या नवीं शती ई० में हुआ है । कावेरी-तीर-
भूमिको 'चोल' कहनेसे दण्डीके समय कोई छोटी-मोटी चोल नामलेवा
रियासत बची भी हो, तो उसका उपहास आचार्यने किया है । क्षेमेन्द्र द्वारा
कावेरीको चोल देशमें कहना¹ तो उचित है । किन्तु दण्डीके समय नहीं ।
इस प्रकार उक्तिमें (अ) पर्वतविरोध, (आ) वनविरोध और (इ) राष्ट्र-
विरोधके प्रदर्शनके माध्यमसे (क) देशविरोधी उक्तिका स्वरूप आचार्यने
स्पष्ट किया है । देशके 'आदि'-शब्द-परिगृहीत अन्य अङ्गोंका विरोध इसी
प्रकार स्वयं समझ लेना चाहिये ।
भामहने देशविरोधका स्वरूप यों प्रस्तुत किया है : किसी स्थानमें जो
द्रव्यका होना या नहीं होना कहा जाता है, उसकी विरोधी उक्ति स्वभावके
अनुसार 'देशविरोधी' है । जैसे—गुफाओंके निकट उगे हुए कालागरु वाले
मलय पर्वतपर सुगन्धित फूलोंसे झुके हुए देवदारु वृक्ष शोभा पाते हैं ।² यहाँ
(१) मलयपर चन्दनकी प्रसिद्धिके विपरीत कालागरुवृक्ष कविने बताये हैं ।
(२) देवदार वृक्ष हिमालयमें काफी ऊँचाई पर होते हैं तथा उनके फूल नहीं
होता अपितु ठीठा (cone) होता है । उन्हें कविने धुर दक्षिणमें स्थित
मलयपर्वतपर तथा (३) फूलोंसे झुके बताया है । अतः देशविरोधी होनेसे
यह उक्ति दोषयुक्त है । दक्षिणके निवासी दण्डीने देशविरोधके तीनों
उदाहरणोंमें दक्षिण भारतमें ही नहीं होनेवाले पदार्थोंका वर्णन किया है ।
उत्तर भारतके भी धुर उत्तरमें कश्मीरके निवासी भामहने देवदारका
उदाहरण उचित ही दिया है । मलय पर्वतका वर्णन तो उन्होंने सम्भवतः
दण्डीके उदाहरणकी नकलपर दिया है ॥ १६६ ॥
(ख) कालविरोध—अगले अढ़ाई (१६७-१६८।।) श्लोकोंमें आचार्य
ने कालके उपलक्षणार्थ प्रस्तुत तीनों पदार्थोंके विरोधके उदाहरण प्रस्तुत किये
हैं । प्रथम श्लोकके पूर्वार्धके दो पादोंमें क्रमशः (अ) रात्रि काल और (आ)
दिनके विरोधके उदाहरण दिये हैं । इसके बाद डेढ़ श्लोकमें (इ) ऋतुविरोधके
१. उल्लङ्घ्यमाना कावेरी तेन सम्मर्दकारिणा ।
चोलकेश्वरकीर्तिश्च कालुष्यं ययतुः समम् ।। कथासरित्सागर १६।६५
२. या देशे द्रव्यसम्भूतिरपि वा नोपदिश्यते ।
तत् तद्विरोधि विज्ञेयं स्वभावात् तद् यथोच्यते ।। काव्याल० ४।२६
मलये कन्दरोपान्तरूढकालागरुद्रुमे ।
सुगन्धिकुसुमानम्रा राजन्ते देवदारवः ।। ३०