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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

१५३ उत्तरकाण्ड
तुलसीकी, बलि, बार-बारहीं सँभार कीबी,
जद्यपि कृपानिधानु सदा सावधान है ॥८०॥
मेरे स्वार्थके कामोंमें चतुराई और परमार्थके कामोंमें पाखण्ड
भरा हुआ है । हे रामजी ! तो भी मैं आपका कहलाता हूँ और
सारा संसार भी यही जानता है । हे पिता ! आपने नामके प्रतापसे
आजतक अच्छी निभा दी और हे स्वामिन् ! आगेके लिये भी
प्रभु समर्थ और सर्वज्ञ हैं । हे देव ! कलियुगकी कुचालको दिन-
दिन दूनी बढ़ती देखकर और पहरेदारको भी चोर देखकर मेरा
हृदय दहल गया है । हे कृपानिधान ! यद्यपि आप सदा ही
सावधान हैं तथापि तुलसी बलिहारी जाता है, आप इसकी बार-
बार सँभाल करते रहियेगा ( ताकि इसके मनमें विकार न
आने पावे ) ।
दिन-दिन दूनो देखि दारिदु, दुकालु, दुख,
दुरितु, दुराजु सुख-सुकृत सकोच है ।
मागें पैंत पावत पचारि पातकी प्रचंड,
कालकी करालता, भलेको होत पोच है ॥
आपनें तौ एकु अवलंबु अंब डिंभ ज्यों,
समर्थ सीतानाथ सब संकट त्रिमोच है ।
तुलसीकी साहसी सराहिए कृपाल राम !
नामकें भरोसें परिनामको निसोच है ॥८१॥
दिनोंदिन दरिद्रता, दुष्काल ( दुर्भिक्ष ), दुःख, पाप और
कुराज्यको दूना होता देखकर सुख और सुकृत संकुचित हो रहे
हैं । समय ऐसा भयंकर आ गया है कि बड़े-बड़े पापी तो डाँट-

कवितावली १५४
डपटकर माँगनेसे अपना दाँव पा लेते हैं और भले आदमीका बुरा
हो जाता है । जैसे बालकको एकमात्र माँका ही सहारा होता है
वैसे ही अपने तो एकमात्र सहारा सर्वसंकटोंसे छुड़ानेवाले और
समर्थ श्रीसीतानाथका ही है । हे कृपालु रामजी ! तुलसीके
साहसकी सराहना कीजिये कि वह ( आपके ) नामके भरोसे
परिणामकी ओरसे निश्चिन्त हो गया है ।
मोह-मद मात्यो, रात्यो कुमति-कुनारिसों,
बिसारि वेद-लोक-लाज, आँकरो अचेतु है ।
भावै सो करत, मुहँ आवै सो कहत, कछु
काहूकी सहत नाहिं, सरकस हेतु है ॥
तुलसी अधिक अधमाई हू अजामिलतें,
ताहूमैं सहाय कलि कपटनिकेतु है ।
जैबेको अनेक टेक, एक टेक ह्वैवेकी, जो
पेट-प्रियपूत हित रामनामु लेतु है ॥८२॥
यह मोहरूपी मदसे उन्मत्त हो गया है, कुमतिरूपी कुलटा
स्त्रीमें रत है, लोक और वेदकी लज्जाको त्याग कर बड़ा अचेत
( बेपरवाह ) हो गया है । मनमानी करता है और मुँहमें जो आता
है वही [ बिना विचारे ] कह डालता है और उद्दण्डताके कारण
किसीकी कोई बात सहता नहीं। गोसाईंजी कहते हैं कि इस
प्रकार मुझमें अजामिलसे भी अधिक अधमता है; तिसपर भी
कपटनिधान कलि मेरा सहायक है । बिगड़नेके तो अनेक मार्ग हैं
परन्तु बननेका केवल एक रास्ता है; वह यह है कि यह पेटरूपी
पुत्रके लिये रामनाम लेता है [ भाव यह है कि अधम अजामिल-

१५५ उत्तरकाण्ड
ने पुत्रके मिससे भगवान्‌का नाम लिया था। मैंने भी पेटरूपी
पुत्रके लिये उसीका आश्रय लिया है ]।
कलिवर्णन
जागिए न सोइए, बिगोइए जनमु जायँ,
दुख, रोग रोइए, कलेसु कोह-कामको।
राजा-रंक, रागी और विरागी, भूरिभागी,ये
अभागी जीव जरत, प्रभाउ कलि बामको ॥
तुलसी ! कबंध-कैसो धाइबो,विचारु, अंध !
धंध देखिअत जग, सोचु परिनामको ।
सोइबो जो रामके सनेहकी समाधि-सुखु,
जागिबो जो जीह जपै नीकें रामनामको ॥८३॥
(इस संसारमें) न तो हम जागते हैं, न सोते हैं; जीवनको
व्यर्थ खो रहे हैं। दुःख और रोगके कारण रोते हैं और काम-
क्रोधका क्लेश (मानसिक व्यथा) सहते हैं। राजा-रंक, रागी-
विरागी और महाभाग्यवान् तथा अभागी, सभी जीव जल रहे
हैं; कुटिल कलियुगका ऐसा ही प्रभाव है। गोसाईंजी अपने
लिये कहते हैं कि अरे अंधे ! विचार कर, इस जगत्‌में जितने
धंधे दिखायी देते हैं वे सब कबन्ध (बिना सिरवाले रुण्ड) की
दौड़के समान हैं, जिनका अन्त चिन्ता ही है। श्रीरामप्रेमकी
समाधिका जो सुख है वही सोना है और जिह्वा भलीभाँति
रामनाम जपे—यही जागना है।
बरन-धरमु गयो, आश्रम निवासु तज्यो,
त्रासन चकित सो परावनो परो-सो हैं ।

करमु, उपासना कुबासनाँ बिनास्यो ग्यानु,
बचन-विराग, वेष जगतु हरो-सो है ॥
गोरख जगायो जोगु, भगति भगायो लोगु,
निगम-नियोगतें सो केलि ही छरो-सो है ।
कायँ-मन-बचन सुभायँ तुलसी ! है जाहि
रामनामको भरोसो, ताहिको भरोसो है ॥८४॥
इस कुसमयमें वर्णधर्म चला गया, ब्रह्मचर्यादि आश्रमोंने
अपना स्थान छोड़ दिया । (अधर्मके) त्राससे चकित होकर
भग्गी-सी पड़ी हुई है । कर्म, उपासना और ज्ञानको कुवासना
(विषयभोगकी प्रबल इच्छा) ने नष्ट कर दिया है । वचनमात्रके
वैराग्य और वेषने जगत्को ठग-सा लिया है । गोरखने योग क्या
जगाया, लोगोंको भक्तिसे विमुख कर दिया, और वेदकी आज्ञाने
खेलहीमें संसारको ठग-सा लिया है । गोसाईंजी कहते हैं कि
जिसे शरीर, मन और वचनसे स्वाभाविक ही रामनामका भरोसा
है उसीके सम्बन्धमें भरोसा होता है (कि वह संसारसे तर
जायगा) ।
बेद-पुरान बिहाइ सुपंथु, कुमारग, कोटि कुचालि चली है ।
कालु कराल, नृपाल कृपाल न, राजसमाजु बड़ोई छली है ॥
बर्न-बिभाग न आश्रमधर्म, दुनी दुख-दोष-दरिद्र दली है ।
स्वारथको परमारथको कलि रामको नामप्रतापु बली है ॥८५॥
वेद-पुराणरूप सुमार्गको त्यागकर तरह-तरहकी कुचालें
और करोड़ों कुमार्ग चल गये हैं । समय बड़ा कठिन है, राजा
दयारहित हैं, राजसमाज (मन्त्री, कर्मचारी) बड़ा ही छली है ।

१५७ उत्तरकाण्ड
वर्णविभाग नहीं रहा, न आश्रमधर्म ही रहा है और संसारको
दुःख, दोष और दरिद्रताने दलित कर दिया है। (ऐसे घोर)
कलिकालमें स्वार्थ और परमार्थके लिये रामनामका प्रताप ही
बलवान् है।
न मिटै भवसंकटु, दुर्घट है तप, तीरथ जन्म अनेक अटो।
कलिमें न विरागु, न ग्यानु कहूँ, सबु लागत फोकट झूठ-जटो ॥
नटु ज्यों जनि पेट-कुपेटक कोटिक चेटक-कौतुक-ठाट ठटो ।
तुलसी जो सदा सुखु चाहिअ तौ, रसनाँ निसिबासर रामु रटो८६
इस संसारका संकट मिट नहीं सकता; क्योंकि तप तो
कठिन है; और तीर्थोंमें अनेक जन्मोंतक विचरते रहो, किन्तु
कलियुगमें न कहीं वैराग्य है, न ज्ञान है; सब सारहीन और
असत्यपूरित प्रतीत होता है। नटकी भाँति अपने पेटरूपी कुत्सित
पेटारेसे करोड़ों इन्द्रजालके कौतुकका ठाट मत ठटो। गोसाईंजी
कहते हैं कि जो सदा सुख चाहते हो तो जिह्वासे रात-दिन राम-
नाम रटते रहो।
दमु दुर्गम,दान,दया,मख,कर्म,सुधर्म, अधीन सबै धनको।
तप,तीरथ,साधन,जोग,बिरागसों होइ,नहीं दृढ़ता तनको ॥
कलिकाल करालमें 'राम कृपालु'यहै अवलंबु बड़ो मनको।
'तुलसी'सब संजम हीन सबै, एक नाम-अधारु सदा जनको॥८७॥
दम अर्थात् इन्द्रियनिग्रह कठिन है। दान, दया, यज्ञ, कर्म
और उत्तम धर्म सब धनके अधीन हैं। तप, तीर्थ और योगसाधन
वैराग्यसे होते हैं, किन्तु (मनकी) दृढ़ता तनिक भी नहीं है। इस
कराल कलिकालमें 'राम कृपालु हैं'—यही मनके लिये बड़ा

अवलम्बन है। गोसाईंजी कहते हैं कि सब लोग सब प्रकारके
संयमोंसे रहित हैं; भक्तोंको सदैव एक राम-नामका ही आधार है।
पाइ सुदेह त्रिमोह-नदी-तरनी न लही, करनी न कछू की।
रामकथा बरनी न बनाइ, सुनी न कथा प्रहलाद न ध्रूकी ॥
अब जोर जरा जरि गातु गयो, मन मानि गलानि कुबानि न मूकी।
नीकें कै ठीक दई तुलसी, अवलंब बड़ी उर आखर दूकी ॥८८॥
(मनुष्यकी) सुन्दर देह पाकर भी मोहरूपी नदीको पार
करनेके लिये (भक्तिरूपी) नौका प्राप्त नहीं की और न कोई
उत्तम करनी की। श्रीरामकथाको भलीभाँति नहीं गाया और न
प्रह्लाद और ध्रुव (-जैसे भक्तों) की कथा सुनी। अब भरपूर
वृद्धावस्थाके कारण शरीर जर्जर हो गया है, तथापि मनने ग्लानि
मानकर अपनी कुटेव नहीं छोड़ी। इससे तुलसीने अच्छी तरह
विचारकर यह निश्चय कर लिया है कि 'राम' इन दो अक्षरोंका
ही हृदयमें बड़ा अवलम्ब है।
राम-नाम-महिमा
रामु बिहाइ 'मरा' जपतें बिगरी सुधरी कबिकोकिलहू की।
नामहि तें गजकी, गनिकाकी, अजामिलकी चलि गै चलचूकी ॥
नामप्रताप बड़े कुसमाज बजाइ रही पति पांडुबधूकी ।
ताको भलो अजहूँ 'तुलसी' जेहि प्रीति-प्रतीति है आखर दूकी ॥
सीधा रामनाम त्याग कर उलटा 'मरा' 'मरा' जपनेसे
कविकोकिल (श्रीवाल्मीकिजी) की बिगड़ी सुधर गयी। राम-
नामसे ही गजकी और गणिकाकी बन गयी और अजामिलका
धोखा भी चल गया। रामनामहीके प्रतापसे बड़े कुसमाजमें

१५९ उत्तरकाण्ड
अर्थात् दुर्योधनकी सभामें द्रौपदीकी लाज डंकेकी चोट रह गयी ।
गोसाईंजी कहते हैं कि जिसको 'राम' इन दोनों अक्षरोंमें प्रीति
और प्रतीति है उसका अब भी भला ही है ।
नामु अजामिल-से खल तारन, तारन बारन-बारबधूको ।
नाम हरे प्रहलाद-विषाद, पिता-भय-साँसति-सागरु सूखो ॥
नामसों प्रीति-प्रतीति-विहीन गिल्यो कलिकाल कराल, न चूको ।
राखिहैं रामु सो जासु हिएँ तुलसी हुलसै बलु आखर दूको ॥
रामनाम अजामिल-जैसे खलोंको भी तारनेवाला है, गज और
वेश्याका भी निस्तार करनेवाला है । नामहीने प्रह्लादके विषादका
नाश किया और उनके पिता (हिरण्यकशिपु) से होनेवाले भय
और साँसतरूपी समुद्रको सुखा दिया । रामनाममें जिसकी प्रीति
और प्रतीति नहीं है, उसको कराल कलिकाल निगल जानेमें कभी
नहीं चूका अर्थात् निगल ही गया । गोस्वामीजी कहते हैं कि
जिसके हृदयमें 'रा' और 'म'—इन दो अक्षरोंका बल हुलसता
है, उसकी रक्षा श्रीरामजी करेंगे ।
जीव जहानमें जायो जहाँ, सो तहाँ 'तुलसी' तिहुँ दाह दहो है ।
दोसु न काहू, कियो अपनो, सपनेहूँ नहीं सुखलेसु लहो है ॥
रामके नामतें होउ सो होउ, न सोउ हिएँ, रसना हीं कहो है ।
कियो न कछू, करिबोन कछू, कहिबो न कछू, मरिबोइ रहो है ॥
तुलसीदासजी कहते हैं—संसारमें जीव जहाँ भी उत्पन्न
होता है वहीं तीनों तापोंसे जलता रहता है । (इसमें) किसीका
दोष नहीं है, (सब) अपने ही कियेका फल है; इसीसे उसे
स्वप्नमें भी लेशमात्र सुख नहीं मिलता । रामनामके प्रभावसे जो

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कवितावली ११०

कुछ होना हो सो (भले ही) हो, किन्तु उस नामको भी मैं
हृदयसे नहीं लेता, केवल जिह्वासे ही कहता हूँ । इसके अतिरिक्त
मैंने (आजतक) न तो कुछ किया है, न कुछ करना है और न
कुछ कहना ही है । अब तो केवल मरना ही बाकी है।
जीजे न ठाउँ, न आपन गाउँ, सुरालयहू को न संबलु मेरें ।
नामु रटो, जमत्रास क्यों जाउँ, को आइ सकै जमकिंकरु नेरें ॥
तुम्हरो सब भाँति, तुम्हारिअ सौं, तुम्ह ही बलि हौ मोको ठाहरु हेरे
बैरख बाँह बसाइए पै तुलसी-घरु ब्याध-अजामिल खेरें ॥
मेरे पास जीवित रहनेके लिये भी कोई ठिकाना नहीं है। न
तो कोई अपना गाँव है और न देवलोकमें जानेका ही कोई सामान
है। मैंने रामनाम रटा है, इसलिये यमलोक भी कैसे जा सकता
हूँ—(ऐसी दशामें) कौन यमदूत मेरे समीप आ सकता है।
आपकी कसम, अब तो सब प्रकारसे मैं आपका ही हूँ, और
बलिहारी जाऊँ, आपहीका मैंने आश्रय ढूँढ़ा है। अतः अब आप
अपनी भुजारूप पताकाके नीचे व्याध और अजामिलके खेड़ेमें ही
तुलसीदासका भी घर बसा दीजिये ।
का कियो जोगु अजामिलजू, गनिकाँ कबहीं मति पेम पगाई ।
ब्याधको साधुपनो कहिए, अपराध अगाधनि में ही जनाई ॥
करुनाकरकी करुना करुना हित, नाम-सुहेत जो देत दगाई ।
काहेको खीझिअ, रीझिअ पै, तुलसीहु सों है, बलि, सोइ सगाई ॥
अजामिलने कौन-सा योग साधा था और (पिङ्गल)
वेश्याने अपनी बुद्धिको कब प्रभुके प्रेममें पागा था । भला, आप
व्याधकी ही साधुता बतलाइये, वह तो अगाध अपराधोंमें ही
दिखायी देती थी। करुणानिधान (श्रीराम) की जो करुणा है

१६१ उत्तरकाण्ड
वह तो करुणा करनेके ही लिये है [ अर्थात् वह तो अकारण ही
सबपर रहती है, उसे प्राप्त करनेके लिये किसी गुणकी आवश्यकता
नहीं है ] । जो नामका सुन्दर निमित्त लेकर आपको धोखा देता
है, हे रघुनाथजी ! आप उससे रूठते क्यों हैं, कृपया प्रसन्न
होइये । तुलसीदासके साथ भी आपका वही सम्बन्ध है, वह आपपर
बलिहारी जाता है ।
जे मद-मार-विकार भरे, ते अचार-विचार समीप न जाहीं ।
है अभिमानु तऊ मनमें, जनु मागिहैं दूसरे दीनन पाहीं ? ॥
जौंकछु बात बनाइ कहौं, तुलसी तुम्ह में, तुम्हहू उर माहीं ।
जानकीजीवन ! जानत हौं, हम हैं तुम्हरे, तुम्ह में, सकु नाहीं ॥
जो पुरुष अभिमान और कामविकारसे भरे हैं वे आचार-
विचारके पास भी नहीं फटकते । [ यह तुलसीदास भी ऐसा ही
है ] तथापि इसके मनमें यह अभिमान है कि यह आपके सिवा
किसी और दीन [ देवता या मनुष्य ] से याचना नहीं करेगा ।
तुलसीदासजी कहते हैं—यदि मैं कोई बात बनाकर कहता होऊँ
तो मैं आपके अंदर हूँ और आप भी मेरे हृदयमें विराजमान हैं
[ इसलिये आपसे कोई दुराव नहीं हो सकता ] । हे जानकी-
जीवन ! आप यह जानते हैं कि हम आपके हैं और आपहीके
अंदर रहते हैं —इसमें कोई सन्देह नहीं ।
दानव-देव, अहीस-महीस, महामुनि-तापस, सिद्ध-समाजी ।
जग जाचक, दानि दुतीय नहीं, तुम्ह ही सबकी सब राखत बाजी॥
एते बड़े तुलसीस ! तऊ सबरीके दिए बिनु भूख न भाजी ।
राम गरीबनेवाज ! भए हौ गरीबनेवाज गरीब नेवाजी ॥९५॥
क० ११--

कवितावली १६२
दानव-देवता, शेषादि सर्पोंके राजा तथा पृथ्वीके राजा,
महर्षि, तपस्वी और सिद्धगण—ये सब संसारमें माँगनेवाले ही हैं।
आपके सिवा संसारमें कोई दूसरा दानी नहीं है; आप ही सबकी
सारी बातें बनाते हैं। हे तुलसीश्वर ! आप इतने बड़े हैं, तो भी
शबरीके दिये हुए (जूठे बेर) बिना आपकी भूख नहीं भागी।
हे दीनोंके प्रतिपालक राम ! आप दीनोंकी रक्षा करके ही गरीब-
निवाज हुए हैं (अतः मेरी भी रक्षा कीजिये)।
किसबी, किसान-कुल, बनिक, भिखारी, भाट,
चाकर, चपल नट, चोर, चार, चेटकी ।
पेटको पढ़त, गुन गढ़त, चढ़त गिरि,
अटत गहन-गन अहन अखेटकी ॥
ऊँचे-नीचे करम, धरम-अधरम करि,
पेट ही को पचत, बेचत बेटा-बेटकी ।
'तुलसी' बुझाइ एक राम घनस्याम ही तें,
आगि बड़वागितें बड़ी है आगि पेटकी ॥९६॥
श्रमजीवी, किसान, व्यापारी, भिखारी, भाट, सेवक, चञ्चल
नट, चोर, दूत और बाजीगर, सब पेटहीके लिये पढ़ते, अनेक
उपाय रचते, पर्वतोंपर चढ़ते और मृगयाकी खोजमें दुर्गम
वनोंमें विचरते हैं। सब लोग पेटहीके लिये ऊँचे-नीचे कर्म तथा
धर्म-अधर्म करते हैं, यहाँतक कि अपने बेटा-बेटी तकको बेच देते हैं।
तुलसीदासजी कहते हैं—यह पेटकी आग बड़वाग्निसे भी बड़ी
है; यह तो केवल एक भगवान् रामरूप श्याममेघके द्वारा बुझायी
जा सकती है।

१६३ उत्तरकाण्ड
खेती न किसानको, भिखारीको न भीख, बलि,
बनिकको बनिज, न चाकरको चाकरी ।
जीविका विहीन लोग सीद्यमान सोच बस,
कहैं एक एकन सों 'कहाँ जाई, का करी ?'
वेदहूँ पुरान कही, लोकहूँ बिलोकिअत,
साँकरे सबै पै, राम ! रावरें कृपा करी ।
दारिद-दसानन दबाई दुनी, दीनबंधु !
दुरित-दहन देखि तुलसी हहा करी ॥९७॥
( तुलसीदासजी कहते हैं ) हे राम ! मैं आपकी बलि जाता
हूँ, ( वर्तमान समयमें ) किसानोंकी खेती नहीं होती, भिखारीको
भीख नहीं मिलती, बनियोंका व्यापार नहीं चलता और नौकरी
करनेवालोंको नौकरी नहीं मिलती । ( इस प्रकार ) जीविकामे हीन
होनेके कारण सब लोग दुखी और शोकके वश होकर एक दूसरेसे
कहते हैं कि 'कहाँ जायँ और क्या करें ? ( कुछ सूझ नहीं पड़ता ।)'
वेद और पुराण भी कहते हैं तथा लोकमें भी देखा जाता है कि
सङ्कटमें तो आपहीने सबपर कृपा की है । हे दीनबन्धु ! दारिद्र्य-
रूपी रावणने दुनियाको दबा लिया है, और पापरूपी ज्वालाको
देखकर तुलसीदास हा हा करता है [ अर्थात् अत्यन्त कातर
होकर आपसे सहायताके लिये प्रार्थना करता है ] ।
कुल-करतूति-भूति-कीरति-सुरूप-गुन
जौबन जरत जुर, परै न कल कहीं ।
राजकाजु कुपथु, कुसाजु भोग रोग ही के,
बेद-बुध बिद्या पाइ बिबस बलकहीं ॥

कवितावली १६४
गति तुलसीसकी लखै न कोउ, जो करत
पब्बतें छार, छारै पब्बय पलक हीं ।
कासों कीजै रोषु, दोषु दीजै काहि, पाहि, राम!
कियो कलिकाल कुलि खललु खलक हीं ॥९८॥
सब लोग कुल, करनी, ऐश्वर्य, यश, सुन्दर रूप, गुण और
यौवनके ज्वरमें जल रहे हैं ( अर्थात् नष्ट हो रहे हैं ); कहीं भी
कल नहीं मिलता । इस रोगके लिये राजकार्य कुपथ्य है और नाना
प्रकारके भोग इस रोगको बढ़ानेवाली दूषित सामग्री है । और वेदके
जाननेवाले विद्या पाकर विवश हो प्रलाप करने लगते हैं । [ तात्पर्य
यह कि कुल इत्यादिके अभिमानसे तो जलते ही थे, अब राजकार्य-
रूपी कुपथ्य और भोगरूपी कुसमाज तथा वेद, बुद्धि और विद्या
पाकर उन्मत्त हो गये हैं, अतएव कुछ सूझता नहीं । इसी कारण ]
तुलसीदासके स्वामी ( श्रीरामचन्द्र ) की गतिको कोई नहीं जानता,
जो पलमात्रमें पर्वतको खाक और खाकको पर्वत कर देते हैं ।
( ऐसी स्थिति देखकर ) किसपर क्रोध किया जाय और किसको
दोष दिया जाय । कलिकालने सारे संसारमें उपद्रव मचा दिया
है; हे राम ! रक्षा कीजिये ।
बबुर-बहेरेको बनाइ बागु लाइयत,
रूँधिबेको सोई सुरतरु काटियतु है ।
गारी देत नीच हरिचंदहू दधीचिहू को,
आपने चना चबाइ हाथ चाटियतु है ॥
आपु महापातकी, हँसत हरि-हरहू को,
आपु है अभागी, भूरिभागी डाटियतु है ।

१४५ उत्तरकाण्ड
कलिको कलुष मन मलिन किए महत,
मसककी पाँसुरीं पयोधि पाटियतु है ॥९९॥
(कलिके वशीभूत होकर लोग ऐसे हो गये हैं कि) बबूर
और बहेड़ेका बाग लगाकर उसकी बाड़ बनानेके लिये कल्पवृक्ष-
को काटकर लाते हैं और ऐसे नीच हो गये हैं कि हरिश्चन्द्र और
दधीचिको भी गाली देते हैं [जिन्होंने परोपकारार्थ शरीरतक
दान कर दिया था] और अपने चने चबाकर भी हाथ चाटते हैं
[कि कहीं कुछ लगा तो नहीं है, अर्थात् परम दरिद्री हैं];
अपने तो महापातकी हैं, परन्तु विष्णुभगवान् और शिवजीतकको
हँसते हैं; स्वयं भाग्यहीन हैं परन्तु बड़े-बड़े भाग्यवानोंको डाँट देते
हैं। कलिके पापोंने सबके मनोंको अत्यन्त मलिन कर दिया है
परन्तु [ऐसी अवस्था में भी ये लोक-परलोक सुधारना चाहते
हैं।] मानो मच्छरकी पसलियोंसे (अपार) समुद्रको पाटना
चाहते हैं।
सुनिए कराल कलिकाल भूमिपाल ! तुम्ह
जाहि घालो चाहिए, कहौं धौं, राखै ताहि को।
हौं तौ दीन दूबरो, बिगारो-ढारो रावरो न,
मैंहू तैंहू ताहिको, सकल जगु जाहिको ॥
कामु, कोहु लाइ कै देखाइयत आँखि मोहि,
एते मान अकसु कीबेको आपु आहि को।
साहेब सुजान, जिन्ह स्वानहू को पच्छु कियो,
रामबोला नामु, हौं गुलामु रामसाहिको ॥१००॥
हे कराल कलिकाल महाराज ! सुनो, जिसको तुम नष्ट

कवितावली १६६
करना चाहो उसकी रक्षा, भला, कौन कर सकता है। मैं तो दीन-
दुर्बल हूँ, और आपका कुछ भी बिगाड़ा-गिराया नहीं। मैं भी और
तुम भी उसी (ईश्वर) के हैं जिसका यह सारा संसार है। तुम
जो काम-क्रोधको मेरे पीछे लगाकर मुझे आँखें दिखलाते हो सो
तुम इतना विरोध करनेवाले कौन हो ? मेरे स्वामी (श्रीरामचन्द्रजी)
बड़े विज्ञ हैं अर्थात् वे सब जानते हैं; उन्होंने श्वानका भी पक्ष
किया था* । मैं तो रामशाहका गुलाम हूँ और रामबोला मेरा
नाम है। [फिर वे मेरा पक्ष क्यों न करेंगे ?]
साँची कहौ, कलिकाल कराल ! मैं ढारो-बिगारो तिहारो कहा है।
कामको, कोहको, लोभको, मोहको मोहिसों आनि प्रपंचु रहा है ॥
हौ जगनायकु लायक आजु, पै मेरिऔ टेव कुटेव महा है।
जानकीनाथ बिना 'तुलसी' जग दूसरेसों करिहौं न हहा है १०१
हे कराल कलिकाल ! सच कहो, मैंने तुम्हारा क्या ढाला
या बिगाड़ा है ? क्या यह काम, क्रोध, लोभ और मोहका जाल
रच मुझीपर फैलाना था । तुम आज जगत्‌के स्वामी और बड़े

  • एक दिन श्रीरामजीके राजदरबारमें एक कुत्ता आया और रोता
    हुआ कहने लगा—'महाराज ! तीर्थसिद्धि नामक ब्राह्मणने बिना ही अपराध
    लाठीसे मेरा सिर फोड़ दिया, आप मेरा न्याय कर दीजिये ।' भगवान्‌ने
    ब्राह्मणको बुलाया और उससे पूछा कि 'तुमने निरपराध कुत्तेके सिरमें क्यों
    लाठी मारी ?' ब्राह्मणने कहा कि 'मैं भीख माँगता फिरता था, इसे मैंने
    रास्तेसे हटाया; जब यह न हटा, तब मैंने लकड़ी मार दी ।' ब्राह्मणको
    अदण्डनीय समझकर भगवान् विचार करने लगे । इतनेमें कुत्तेने कहा कि
    'भगवन् ! आप इसे कालंजरका महंत बना दीजिये । मैं भी पूर्वजन्ममें
    एक महंत था। भक्ष्याभक्ष्य खानेसे मुझे कुत्ता होना पड़ा; महंती बहुत बुरी
    है।' कुत्तेके कहनेपर भगवान्‌ने उसे कालंजरका महंत बना दिया ।

१६७
उत्तरकाण्ड
सामर्थ्यवान् हो । परन्तु हे देव ! मेरी भी यह बहुत बुरी आदत
है कि जानकीनाथ (श्रीराम) के बिना किसी दूसरेके सामने
हाहा नहीं खाता, यानी अपनी रक्षाके लिये प्रार्थना नहीं करता ।
भागीरथीजलु पान करौं, अरु नाम द्वै रामके लेत नितै हौं।
मोको न लेनो, न देनो कछू, कलि! भूलि न रावरी ओर चितैहौं।
जानि कै जोरु करौ, परिनाम तुम्हें पछितैहौं, पै मैं न भितैहौं ।
ब्राह्मन ज्यों उगिल्यो उरगारि, हौं त्यों हीं तिहारें हिएँ न हितैहौं १०२
मैं गङ्गाजल पीता हूँ और नित्य रामके दो नाम लेता हूँ।
हे कलिकाल ! मुझे तुमसे कुछ भी लेना-देना (सरोकार) नहीं
है और मैं भूलकर भी तुम्हारी ओर नहीं देखूँगा । यदि तुम
जान बूझकर मेरे साथ जोर (अत्याचार) करोगे तो परिणाममें
तुम्हीं पछताओगे, मैं नहीं डरूँगा । जिस तरह गरुड़ने ब्राह्मणको
नहीं पचनेके कारण उगल दिया वैसे मैं भी तुम्हारे पेटमें नहीं
पचूँगा* ।
राजमरालके बालक पेलि कै पालत-लालत खूसरको ।
सुचि सुंदर सालि सकेलि, सोवारि कै, बीजु बटोरत ऊसरको ॥
गुन-ग्यान-गुमानु, अँधेरि बड़ी, कल्पद्रुमु काटत मूसरको ।
कलिकाल बिचारु अचारु हरो, नहि सूझै कछू धमधूसरको १०३
लोग राजहंसके बच्चेको ठेलकर उल्लूके बच्चेका लालन-
पालन करते हैं; सुन्दर और पवित्र धानको बटोर और जलाकर
ऊसर भूमिके लिये बीज बटोरते हैं । गुण और ज्ञानका बड़ा

  • गरुड़जी एक समय धोखेसे एक ब्राह्मणको निगल गये । इससे
    उनके पेटमें जलन पैदा हुई । अन्तमें उन्हें उसे अपने पेटमेंसे निकाल देना
    पड़ा ।

कवितावली १६५
अभिमान और सतर्कता है; ( इसलिये ) मूसर बनानेके लिये
कल्पवृक्ष काटने हैं । कलिकालने विचार और आचारको हर
लिया है, इसीसे बुद्धिहीनोंको कुछ नहीं सूझता ।
कीबे कहा, पढ़िबेको कहा फलु, बूझि न वेदको भेदु विचारैं ।
स्वारथको, परमारथको कलि कामद रामको नामु बिसारैं ॥
वाद-विवाद विषादु बढ़ाइकें, छाती पराई औ आपनी जारैं ।
चारिहुको, छहूको, नवको, दस-आठको पाठु कुकाठु ज्यों फारैं १०४
क्या कर्तव्य है और पढ़नेका क्या फल है—यह समझकर
वेदके भेदको नहीं विचारते; [ वेदका सार-तत्त्व और ] कलियुग-
में स्वार्थ एवं परमार्थके एकमात्र कल्पवृक्ष रामनामको बिसार
दिया; ( ज्ञानाभिमानवश व्यर्थके ) वाद-विवादसे विषादको बढ़ाकर
अपनी और दूसरोंकी छाती जलाते हैं और चारों वेद, छहों
शास्त्र, नवों व्याकरण* और अठारहों पुराणोंको पढ़कर कुकाठको
चीरनेके समान व्यर्थ गवाँ देते हैं [ भाव यह है कि उनका
इन सब शास्त्रोंको पढ़ना वैसा ही निष्फल होता है जैसा कुकाठ-
को चीरना ] ।
आगम, वेद, पुरान बखानत मारग कोटिन, जाहिं न जाने ।
जे मुनि ते पुनि आपुहि आपुको ईसु कहावत सिद्ध सयाने ॥
धर्म सबै कलिकाल ग्रसे, जप, जोग, विरागु लै जीव पराने ।
को करि सोचु मरै 'तुलसी', हम जानकी नाथके हाथ बिकाने १०५

  • नौ व्याकरण निम्नलिखित आचार्योंके चलाये हुए और उन्हींके
    नामसे प्रसिद्ध हैं—इन्द्र, चन्द्रमा, काशकृत्स्न, शाकटायन, आपिशलि,
    पाणिनि, अमर, जैनेन्द्र, सरस्वती ।

१६९ उत्तरकाण्ड
वेद, शास्त्र और पुराण करोड़ों मार्गोंका वर्णन करते हैं, परन्तु
वे समझमें नहीं आते और जो मुनिलोग हैं वे अपने आपको ही
ईश्वर, सिद्ध और चतुर कहलावाने हैं। जितने धर्म थे उन सबको
कलियुग लील गया है तथा जप, योग और वैराग्यादि अपनी-अपनी
जान लेकर भाग गये हैं। गोसाईंजी कहते हैं कि इनका सोच
करके कौन मरे ? हम तो जानकीनाथ श्रीरामचन्द्रके हाथ बिक
गये हैं।
धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूत कहौ, जोलहा कहौ कोऊ।
काहूकी बेटी सों, बेटा न ब्याहब, काहूकी जाति बिगार न सोऊ॥
तुलसी सरनाम गुलामु है रामको, जाको रुचै सो कहै कछु ओऊ ॥
माँगि कै खैबो, मसीतको सोइबो, लैबेको एकु न दैवे को दोऊ १०६
चाहे कोई धूर्त कहे, अथवा परमहंस कहे, राजपूत कहे या
जुलाहा कहे, मुझे किसीकी बेटीसे तो बेटेका ब्याह करना नहीं है;
न मैं किसीसे सम्पर्क रखकर उसकी जाति ही बिगाडूंगा। तुलसीदास
तो श्रीरामचन्द्रका प्रसिद्ध गुलाम है, जिसको जो रुचे सो कहो।
मुझको तो माँगके खाना और मसजिद (देवालय) में सोना है;
न किसीसे एक लेना है, न दो देना है।
मेरो जाति-पाँति न चहौं काहूकी जाति-पाँति,
मेरो कोऊ कामको न हौं काहूके कामको।
लोकु परलोकु रघुनाथही के हाथ सब,
भारी है भरोसो तुलसीकें एक नामको ॥
अति ही अयाने उपखानो नहिं बूझैं लोग,
'साह ही को गोतु गोतु होत है गुलामको।'

कवितावली १७०
साधु कै असाधु, कै भलो कै पोच, सोचु कहा,
का काहूके द्वार परों, जो हौं सो हौं रामको ॥१०७॥
मेरी कोई जाति-पाँति नहीं है और न मैं किसीकी जाति-पाँति
चाहता हूँ। कोई मेरे कामका नहीं है और न मैं किसीके कामका
हूँ। मेरा लोक-परलोक सब श्रीरामचन्द्रके हाथ है। तुलसीको तो
एकमात्र रामनामका ही बहुत बड़ा भरोसा है। लोग अत्यन्त गँवार
हैं—कहावत भी नहीं समझते कि जो गोत्र स्वामीका होता है वही
सेवकका होता है। साधु हूँ अथवा असाधु, भला हूँ अथवा बुरा, इसकी
मुझे कोई परवा नहीं है। मैं जैसा कुछ भी हूँ, श्रीरामचन्द्रका हूँ।
क्या मैं किसीके दरवाजेपर पड़ा हूँ ?
कोऊ कहै, करत कुसाज, दगाबाज बड़ो,
कोऊ कहै, रामको गुलामु खरो खूब है।
साधु जानै महासाधु, खल जानै महाखल,
बानी झूठी-साँची कोटि उठत हबूब है॥
चहत न काहूसों न कहत काहूकी कछु,
सबकी सहत, उर अंतर न ऊब है।
तुलसीको भलो पोच हाथ रघुनाथ ही के,
रामकी भगति-भूमि मेरी मति दूब है ॥१०८॥
कोई कहता है कि (यह तुलसी) कुसाज अर्थात् छल, कपट
आदि करता है, कोई कहता है कि यह बड़ा दगाबाज है और कोई
कहता है कि यह श्रीरामचन्द्रका खूब सच्चा सेवक है। साधु मुझे
परम साधु जानते हैं और दुष्ट महादुष्ट समझते हैं। झूठी-सच्ची करोड़ों
प्रकारकी बातोंकी लहरें उठा करती हैं। मैं तो किसीसे कुछ चाहता

१७४ उत्तरकाण्ड
नहीं, न किसीके विषयमें कुछ कहता हूँ; सबकी सहता हूँ, चित्तमें
कोई घबराहट नहीं है। तुलसीका बुरा-भला तो रघुनाथजीके ही
हाथ है; मेरी बुद्धि रामभक्तिरूप भूमिमें दूबके समान है, अर्थात् मेरी
बुद्धिका परम आश्रय रामभक्ति ही है।
जागैं जोगी-जंगम, जती-जमाती ध्यान धरैं,
डरैं उर भारी लोभ, मोह, कोह, कामके।
जागैं राजा राजकाज, सेवक-समाज, साज,
सोचैं सुनि समाचार बड़े वैरी बामके॥
जागैं बुध विद्या हित पंडित चकित चित,
जागैं लोभी लालच धरनि, धन, धामके।
जागैं भोगी भोग हीं, वियोगी, रोगी सोगबस,
सोवैं सुख तुलसी भरोसे एक रामके ॥१०९॥
योगी, जंगम (परिव्राजक अथवा लिंगायत साधु), संन्यासी
और मण्डली बनाकर रहनेवाले साधु इसलिये जागते हैं कि (एक
ओर तो वे परमेश्वरका) ध्यान करते हैं और (दूसरी ओर)
उनके मनमें काम, क्रोध, मोह, लोभका बड़ा भारी डर बना रहता
है। राजालोग राजकाज, सेवकमण्डल तथा अनेकों प्रकारकी
सामग्रीके पीछे जागते रहते हैं और बड़े-बड़े प्रतिकूल शत्रुओंके
समाचारको सुनकर सोचग्रस्त रहते हैं। बुद्धिमान् पण्डितलोग
विद्याके लिये; लोभी पुरुष पृथ्वी, धन और घरके लोभमें जागते
हैं; भोगी लोग भोगके लिये और वियोगी और रोगी लोग [विरह

कवितावली १७२
एवं रोगके सन्तापके कारण जागते हैं । किन्तु तुलसीदास तो एक
रामजीके भरोसे सुखपूर्वक सोता है ।
रामु मातु, पितु, बंधु, सुजनु, गुरु, पूज्य, परमहित ।
साहेबु, सखा, सहाय, नेह-नाते पुनीत चित ॥
देसु, कोसु, कुलु, कर्म, धर्म, धनु, धामु, धरनि, गति ।
जाति-पाँति सब भाँति लागि रामहि हमारि पति ॥
परमारथु, स्वारथ, सुजसु, सुलभ रामतें सकल फल ।
कह तुलसिदासु, अब, जब-कबहूँ एक रामतें मोर भल ॥११०॥
हमारे माता, पिता, बन्धु, आत्मीय, गुरु, पूज्य और परम
हितकारी राम ही हैं । राम ही हमारे स्वामी, सखा और सहायक
हैं तथा पवित्र चित्तसे जितने प्रेमके सम्बन्ध हैं, सब राम ही हैं ।
हमारे देश, कोश, कुल, धर्म-कर्म, धन, धाम और गति भी राम
ही हैं । हमारे जाति-पाँति भी राम ही हैं और हमारी प्रतिष्ठा भी
सब प्रकार श्रीरामहीके पीछे हैं । परमार्थ, स्वार्थ, सुयश, सब
प्रकारके फल हमें रामहीसे सुलभ हैं । गोसाईंजी कहते हैं कि अभी
या जब कभी हो, मेरा भला तो एक रामहीसे होगा ।
रामगुणगान
महाराज, बलि जाउँ, राम ! सेवक-सुखदायक ।
महाराज, बलि जाउँ, राम ! सुंदर, सब लायक ॥
महाराज, बलि जाउँ, राम ! सब संकट मोचन ।
महाराज, बलि जाउँ, राम ! राजीवविलोचन ॥