सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 228 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 175

कवितावली १७२
एवं रोगके सन्तापके कारण जागते हैं । किन्तु तुलसीदास तो एक
रामजीके भरोसे सुखपूर्वक सोता है ।
रामु मातु, पितु, बंधु, सुजनु, गुरु, पूज्य, परमहित ।
साहेबु, सखा, सहाय, नेह-नाते पुनीत चित ॥
देसु, कोसु, कुलु, कर्म, धर्म, धनु, धामु, धरनि, गति ।
जाति-पाँति सब भाँति लागि रामहि हमारि पति ॥
परमारथु, स्वारथ, सुजसु, सुलभ रामतें सकल फल ।
कह तुलसिदासु, अब, जब-कबहूँ एक रामतें मोर भल ॥११०॥
हमारे माता, पिता, बन्धु, आत्मीय, गुरु, पूज्य और परम
हितकारी राम ही हैं । राम ही हमारे स्वामी, सखा और सहायक
हैं तथा पवित्र चित्तसे जितने प्रेमके सम्बन्ध हैं, सब राम ही हैं ।
हमारे देश, कोश, कुल, धर्म-कर्म, धन, धाम और गति भी राम
ही हैं । हमारे जाति-पाँति भी राम ही हैं और हमारी प्रतिष्ठा भी
सब प्रकार श्रीरामहीके पीछे हैं । परमार्थ, स्वार्थ, सुयश, सब
प्रकारके फल हमें रामहीसे सुलभ हैं । गोसाईंजी कहते हैं कि अभी
या जब कभी हो, मेरा भला तो एक रामहीसे होगा ।
रामगुणगान
महाराज, बलि जाउँ, राम ! सेवक-सुखदायक ।
महाराज, बलि जाउँ, राम ! सुंदर, सब लायक ॥
महाराज, बलि जाउँ, राम ! सब संकट मोचन ।
महाराज, बलि जाउँ, राम ! राजीवविलोचन ॥