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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 166, कुल 228 में से

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पृष्ठ 166

१६३ उत्तरकाण्ड
खेती न किसानको, भिखारीको न भीख, बलि,
बनिकको बनिज, न चाकरको चाकरी ।
जीविका विहीन लोग सीद्यमान सोच बस,
कहैं एक एकन सों 'कहाँ जाई, का करी ?'
वेदहूँ पुरान कही, लोकहूँ बिलोकिअत,
साँकरे सबै पै, राम ! रावरें कृपा करी ।
दारिद-दसानन दबाई दुनी, दीनबंधु !
दुरित-दहन देखि तुलसी हहा करी ॥९७॥
( तुलसीदासजी कहते हैं ) हे राम ! मैं आपकी बलि जाता
हूँ, ( वर्तमान समयमें ) किसानोंकी खेती नहीं होती, भिखारीको
भीख नहीं मिलती, बनियोंका व्यापार नहीं चलता और नौकरी
करनेवालोंको नौकरी नहीं मिलती । ( इस प्रकार ) जीविकामे हीन
होनेके कारण सब लोग दुखी और शोकके वश होकर एक दूसरेसे
कहते हैं कि 'कहाँ जायँ और क्या करें ? ( कुछ सूझ नहीं पड़ता ।)'
वेद और पुराण भी कहते हैं तथा लोकमें भी देखा जाता है कि
सङ्कटमें तो आपहीने सबपर कृपा की है । हे दीनबन्धु ! दारिद्र्य-
रूपी रावणने दुनियाको दबा लिया है, और पापरूपी ज्वालाको
देखकर तुलसीदास हा हा करता है [ अर्थात् अत्यन्त कातर
होकर आपसे सहायताके लिये प्रार्थना करता है ] ।
कुल-करतूति-भूति-कीरति-सुरूप-गुन
जौबन जरत जुर, परै न कल कहीं ।
राजकाजु कुपथु, कुसाजु भोग रोग ही के,
बेद-बुध बिद्या पाइ बिबस बलकहीं ॥