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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 170, कुल 228 में से

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उत्तरकाण्ड
सामर्थ्यवान् हो । परन्तु हे देव ! मेरी भी यह बहुत बुरी आदत
है कि जानकीनाथ (श्रीराम) के बिना किसी दूसरेके सामने
हाहा नहीं खाता, यानी अपनी रक्षाके लिये प्रार्थना नहीं करता ।
भागीरथीजलु पान करौं, अरु नाम द्वै रामके लेत नितै हौं।
मोको न लेनो, न देनो कछू, कलि! भूलि न रावरी ओर चितैहौं।
जानि कै जोरु करौ, परिनाम तुम्हें पछितैहौं, पै मैं न भितैहौं ।
ब्राह्मन ज्यों उगिल्यो उरगारि, हौं त्यों हीं तिहारें हिएँ न हितैहौं १०२
मैं गङ्गाजल पीता हूँ और नित्य रामके दो नाम लेता हूँ।
हे कलिकाल ! मुझे तुमसे कुछ भी लेना-देना (सरोकार) नहीं
है और मैं भूलकर भी तुम्हारी ओर नहीं देखूँगा । यदि तुम
जान बूझकर मेरे साथ जोर (अत्याचार) करोगे तो परिणाममें
तुम्हीं पछताओगे, मैं नहीं डरूँगा । जिस तरह गरुड़ने ब्राह्मणको
नहीं पचनेके कारण उगल दिया वैसे मैं भी तुम्हारे पेटमें नहीं
पचूँगा* ।
राजमरालके बालक पेलि कै पालत-लालत खूसरको ।
सुचि सुंदर सालि सकेलि, सोवारि कै, बीजु बटोरत ऊसरको ॥
गुन-ग्यान-गुमानु, अँधेरि बड़ी, कल्पद्रुमु काटत मूसरको ।
कलिकाल बिचारु अचारु हरो, नहि सूझै कछू धमधूसरको १०३
लोग राजहंसके बच्चेको ठेलकर उल्लूके बच्चेका लालन-
पालन करते हैं; सुन्दर और पवित्र धानको बटोर और जलाकर
ऊसर भूमिके लिये बीज बटोरते हैं । गुण और ज्ञानका बड़ा

  • गरुड़जी एक समय धोखेसे एक ब्राह्मणको निगल गये । इससे
    उनके पेटमें जलन पैदा हुई । अन्तमें उन्हें उसे अपने पेटमेंसे निकाल देना
    पड़ा ।