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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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कवितावली १६५
अभिमान और सतर्कता है; ( इसलिये ) मूसर बनानेके लिये
कल्पवृक्ष काटने हैं । कलिकालने विचार और आचारको हर
लिया है, इसीसे बुद्धिहीनोंको कुछ नहीं सूझता ।
कीबे कहा, पढ़िबेको कहा फलु, बूझि न वेदको भेदु विचारैं ।
स्वारथको, परमारथको कलि कामद रामको नामु बिसारैं ॥
वाद-विवाद विषादु बढ़ाइकें, छाती पराई औ आपनी जारैं ।
चारिहुको, छहूको, नवको, दस-आठको पाठु कुकाठु ज्यों फारैं १०४
क्या कर्तव्य है और पढ़नेका क्या फल है—यह समझकर
वेदके भेदको नहीं विचारते; [ वेदका सार-तत्त्व और ] कलियुग-
में स्वार्थ एवं परमार्थके एकमात्र कल्पवृक्ष रामनामको बिसार
दिया; ( ज्ञानाभिमानवश व्यर्थके ) वाद-विवादसे विषादको बढ़ाकर
अपनी और दूसरोंकी छाती जलाते हैं और चारों वेद, छहों
शास्त्र, नवों व्याकरण* और अठारहों पुराणोंको पढ़कर कुकाठको
चीरनेके समान व्यर्थ गवाँ देते हैं [ भाव यह है कि उनका
इन सब शास्त्रोंको पढ़ना वैसा ही निष्फल होता है जैसा कुकाठ-
को चीरना ] ।
आगम, वेद, पुरान बखानत मारग कोटिन, जाहिं न जाने ।
जे मुनि ते पुनि आपुहि आपुको ईसु कहावत सिद्ध सयाने ॥
धर्म सबै कलिकाल ग्रसे, जप, जोग, विरागु लै जीव पराने ।
को करि सोचु मरै 'तुलसी', हम जानकी नाथके हाथ बिकाने १०५

  • नौ व्याकरण निम्नलिखित आचार्योंके चलाये हुए और उन्हींके
    नामसे प्रसिद्ध हैं—इन्द्र, चन्द्रमा, काशकृत्स्न, शाकटायन, आपिशलि,
    पाणिनि, अमर, जैनेन्द्र, सरस्वती ।