कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली १६४
गति तुलसीसकी लखै न कोउ, जो करत
पब्बतें छार, छारै पब्बय पलक हीं ।
कासों कीजै रोषु, दोषु दीजै काहि, पाहि, राम!
कियो कलिकाल कुलि खललु खलक हीं ॥९८॥
सब लोग कुल, करनी, ऐश्वर्य, यश, सुन्दर रूप, गुण और
यौवनके ज्वरमें जल रहे हैं ( अर्थात् नष्ट हो रहे हैं ); कहीं भी
कल नहीं मिलता । इस रोगके लिये राजकार्य कुपथ्य है और नाना
प्रकारके भोग इस रोगको बढ़ानेवाली दूषित सामग्री है । और वेदके
जाननेवाले विद्या पाकर विवश हो प्रलाप करने लगते हैं । [ तात्पर्य
यह कि कुल इत्यादिके अभिमानसे तो जलते ही थे, अब राजकार्य-
रूपी कुपथ्य और भोगरूपी कुसमाज तथा वेद, बुद्धि और विद्या
पाकर उन्मत्त हो गये हैं, अतएव कुछ सूझता नहीं । इसी कारण ]
तुलसीदासके स्वामी ( श्रीरामचन्द्र ) की गतिको कोई नहीं जानता,
जो पलमात्रमें पर्वतको खाक और खाकको पर्वत कर देते हैं ।
( ऐसी स्थिति देखकर ) किसपर क्रोध किया जाय और किसको
दोष दिया जाय । कलिकालने सारे संसारमें उपद्रव मचा दिया
है; हे राम ! रक्षा कीजिये ।
बबुर-बहेरेको बनाइ बागु लाइयत,
रूँधिबेको सोई सुरतरु काटियतु है ।
गारी देत नीच हरिचंदहू दधीचिहू को,
आपने चना चबाइ हाथ चाटियतु है ॥
आपु महापातकी, हँसत हरि-हरहू को,
आपु है अभागी, भूरिभागी डाटियतु है ।