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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

कवितावली ११६
साँचौ सेवकाई हनुमान की सुजानराय,
रिनियाँ कहाए हौ, बिकाने ताके हाथ जू ॥
तुलसी-से खोटे खरे होत ओट नामही कीं,
तेजी माटी मगहू की मृगमद साथ जू ।
बात चलें बातको न मानिबो विलगु, बलि,
काकीं सेवाँ रीझि कै नेवाजो रघुनाथ जू ? ॥१९॥
हे नाथ ! आपने कृपा करके अपने आगे पड़ी शिलको तथा
किरात, भीलनी, सुग्रीव और केवल सिर नवानेसे ही राक्षस
बिभीषणको अपना लिया । हे सुजानशिरोमणि ! सच्ची सेवा तो
आपकी हनुमान्‌जीने की, जो आप उनके ऋणी कहलाये और
उनके हाथ बिक गये । तुलसीके समान दम्भी भी आपके नामकी
ओट लेनेसे ही सच्चे हो जाते हैं, जैसे रास्तेकी मिट्टी कस्तूरीके
संसर्गसे बहुमूल्य हो जाती है । इस प्रसंगपर यदि मैं कोई बात
पूछूँ तो बुरा न मानियेगा । हे रघुनाथजी ! मैं आपकी बलि जाता
हूँ, भला, आपने किसकी सेवासे रीझकर कृपा की है ? [अर्थात्
आपने अपनी कृपालुतासे ही अपने सेवकोंको बढ़ाया है, किसीने
भी ऐसी सेवा नहीं की जिससे आप रीझ सकें ।]
कौसिककी चलत, पषानकी परस पाय,
टूटत धनुष बनि गई है जनककी ।
कोल, पसु, सबरी, बिहंग, भालु, रातिचर,
रतिनके लालचिन त्रापति मनककी ॥
कोटि-कला-कुसल कृपाल नतपाल ! बलि,
बातहू केतिक तिन तुलसी तनककी ।

११७ उत्तरकाण्ड
गय दसरथ के समत्थ राम राजमनि !
तेरें हेरें लोपै लिपि बिधिहू गनककी ॥२०॥
विश्वामित्रजीकी बात (केवल साथ) चल देनेसे, शिला
(बनी हुई अहल्या) की चरणस्पर्शमात्रसे और राजा जनककी धनुष-
के टूटनेसे बन गयी। कोल, पशु (सुग्रीवादि वानर), शबरी, गीध
(जटायु), भालु और (विभीषण आदि) राक्षसोंको रत्तीभरका
लालच था, उनको मनभरकी प्राप्ति हो गयी (अर्थात् जितना
वे चाहते थे उससे बहुत अधिक उन्हें मिल गया)। हे करोड़ों
कलाओंमें कुशल एवं विनीतकी रक्षा करनेवाले दयालो ! आपकी
बलिहारी है; तिनकेके समान तुच्छ इस तुलसीदासकी बात ही
कितनी है। हे महाराज दशरथके समर्थ पुत्र राजशिरोमणि राम !
तुम्हारी दृष्टिमात्रसे ब्रह्मा-जैसे ज्योतिषीकी लिपि भी मिट जाती है।
सिला-श्रापु पापु, गुह-गीधको मिलापु,
सबरीके पास आपु चलि गए हौ, सो सुनी मैं।
सेवक सराहे कपिनायकु विभीषनु
भरतसभा सादर सनेह सुरधुनीमैं॥
आलसी-अभागी-अघी-आरत-अनाथपाल
साहेबु समर्थ एकु, नीकें मन गुनी मैं।
दोष-दुख-दारिद-दलैया दीनबंधु राम !
'तुलसी' न दूसरो दयानिधानु दुनीमैं ॥२१॥
मैंने शिला (बनी हुई अहल्या) के शाप (और व्यभिचार-
रूप) पाप, निषाद तथा गीध (जटायु) से मिलनेकी बात सुनी,
और शबरीके पास स्वयं (बिना बुलाये) चले गये यह सभी मैं

कवितावली ११८
सुन चुका हूँ। आपने स्नेह एवं आदरपूर्वक भरतजीके सामने
सभाके बीच अपने सेवक वानरराज (सुग्रीव) की और विभीषणकी
गङ्गाके समान (पवित्र) कहकर प्रशंसा की। मैने मनमें अच्छी तरह
विचार कर लिया कि आलसी, अभागे, पापी, आर्त और अनाथोंका
पालन करनेवाले समर्थ साहब एक आप ही हैं। तुलसीदासजी कहते
हैं—दोष, दुःख और दरिद्रताका नाश करनेवाले हे दीनबन्धु राम !
आपके समान दयानिधान दुनियामें दूसरा नहीं है।
मीतु बालिबंधु, पूतु दूतू, दसकंधबंधु
सचिव, सराघु कियों सबरी-जटाइको।
लंक जरी जोहैं जियँ सोचुसो विभीषनको,
कहौ ऐसे साहेबकी सेवाँ न खटाइको॥
बड़े एक-एकतें अनेक लोक लोकपाल,
अपने-अपनेको तौ कहैंगो घटाइको।
साँकरेके सेइबे, सराहिवे, सुमिरबेको,
रामु सो न साहेबु न कुमति-कटाइको ॥ २२ ॥
बालिके भाई (सुग्रीव) को अपना मित्र बनाया, उसके
पुत्र (अङ्गद) को दूत बनाया, रावण (जैसे शत्रु) के भाई
(विभीषण) को मन्त्री बनाया, जटायु और शबरीका श्राद्ध किया तथा
लंकाको जली देख चित्तमें विभीषणके लिये चिन्ता-सी हुई,
(कि जली हुई लंका मैंने इन्हें दी।) कहो, भला, ऐसे स्वामीकी
सेवामें कौन नहीं निभ जायगा? अनेकों लोकोंमें वहाँके लोकपाल
एक-से-एक बड़े हैं, अपने-अपने स्वामीको भला कौन घटाकर
कहेगा। परन्तु दुःखमें सेवन करनेको, सराहनेको और स्मरण

११९ उत्तरकाण्ड
करनेको, भगवान् रामके समान कुमतिकी निवृत्ति करनेवाला कोई
दूसरा स्वामी नहीं है।
भूमिपाल, व्यालपाल, नाकपाल, लोकपाल
कारन कृपाल, मैं सबैके जीकी थाह ली।
कादरको आदरु काहूकें नाहिं देखिअत,
सबनि सोहात है सेवा-सुजानि टाहली ॥
तुलसी सुभायँ कहै, नाहीं कछु पच्छपातु,
कौनैं ईस किए कीस-भालु खास माहली।
रामही के द्वारे पै बोलाइ सनमानिअत
मोसे दीन दूबरे कपूत क्रूर काहली ॥२३॥
पृथ्वीपति, नागपति, देवलोकोंके स्वामी और लोकपाल
ये सब कारणवश कृपा करते हैं, मैं सभीके जीकी थाह ले चुका
हूँ। कायरोंका आदर किसीके यहाँ देखनेमें नहीं आता; सबको
सेवामें दक्ष सेवक सुहाते हैं । तुलसी सत्यभावसे कहता है, उसे
कोई पक्षपात नहीं है - भला किस स्वामीने रीछ और वानरोंको
अपना खास माहली (रनिवासका सेवक) बनाया है ? श्रीराम-
चन्द्रहीके द्वारपर मेरे समान दीन, दुर्बल, कपूत, कायर और आलसीको
बुलाकर सम्मान किया जाता है।
सेवा अनुरूप फल देत भूप कूप ज्यों,
बिहूने गुन पथिक पिआसे जात पथके ।
लेखें-जोखें चोखें चित 'तुलसी' स्वारथ हित,
नीकें देखे देवता देवैया बने गथके ॥
गीधु मानो गुरु, कपि-भालु माने मीत कै,

पुनीत गीत-साके सब साहेब समत्थके।
और भूप परखि सुलाखि तौलि ताइ लेत,
लसमके खसमु तुहीं पै दसरथके ॥२४॥
राजालोग कूपके समान सेवानुकूल फल देते हैं, बिना गुण
(रस्सी) के पथके पथिक प्यासे चले जाते हैं [ तात्पर्य यह है कि
जैसे बिना गुण (डोरी) के कूपसे जल नहीं आता वैसे ही बिना
गुणके राजालोगोंसे कुछ भी प्राप्त नहीं होता ] । गोसाईंजी कहते
हैं, शुद्ध चित्तसे भलीभाँति हिसाब लगाकर देख लिया कि
स्वार्थके लिये धन देनेवाले देवता तो बहुत-से हैं । परन्तु जिन्होंने
गीधको गुरु (पिता) के समान माना और वानर-भालुओंको
मित्र समझा ऐसे समर्थ स्वामीके सभी गीत और कीर्ति-कथाएँ
पवित्र हैं । और जितने राजा हैं, वे सब तो (अपने सेवकोंको)
अच्छी तरहसे जाँचकर, सूराख करके तौलकर तथा तपाकर
लेते हैं*; परन्तु हे दशरथके राजकुमार ! निकम्मोंके प्रभु
तो, बस आप ही हैं ।
केवल रामहीसे माँगो
रीति महाराजकी, नेवाजिए जो माँगनो, सो
दोष-दुख-दारिद दरिद्र कै-कै छोड़िए ।
नामु जाको कामतरु देत फल चारि, ताहि
'तुलसी' बिहाइ कै बबूर-रेंड़ गोड़िए ॥
जाचै को नरेस, देस-देसको कलेसु करै,
दैहैं तौ प्रसंन ह्वै बड़ी बड़ाई बाँड़िए ।

  • सोनेको परखनेवाले ये सब क्रियाएँ करते हैं ।

कृपा-पाथनाथ लोकनाथ-नाथ सीतानाथ
तजि रघुनाथ हाथ और काहि ओड़िये ॥२५॥
महाराजकी यह रीति है कि जिस याचकको अपनाते हैं
उसके दोष, दुःख और दरिद्रताको दरिद्र ( क्षीण ) करके छोड़ते
हैं । जिनका नामरूप कल्पवृक्ष चारों फलों ( धर्म, अर्थ, काम,
मोक्ष ) का देनेवाला है, गोसाईंजी कहते हैं, उन्हें त्याग कर बबूल
और रेंड कौन रोपे ? राजाओंसे याचना कौन करे ? और देश-
विदेश घूमनेका कष्ट कौन भोगे ? जो प्रसन्न होकर बहुत बढ़कर
देंगे तो एक दमड़ीसे अधिक न देंगे, कृपाके समुद्र, लोकपालोंके
स्वामी सीतानाथ श्रीरामचन्द्रजीको छोड़कर और किसके आगे
हाथ फैलाया जाय ?
जाकें बिलोकत लोकप होत, बिसोक लहैं सुरलोग सुठौरहि ।
सो कमला तजि चंचलता, करि कोटि कला रिझवै सुरमौरहि ॥
ताको कहाइ, कहै तुलसी, तूँ लजाहि न मागत कूकुर-कौरहि ।
जानकी जीवनको जनु है जरि जाउ सो जीह जो जाचत औरहि २६
जिसकी दृष्टिमात्रसे मनुष्य लोकपाल हो जाता है और
देवतालोग सुन्दर शोकरहित स्थानको प्राप्त कर लेते हैं, वह
लक्ष्मी ( अपनी स्वाभाविक ) चञ्चलता त्याग कर करोड़ों उपायों-
से विष्णुरूप श्रीरामचन्द्रजीको रिझाती है; गोसाईंजी कहते हैं
कि तू उनका कहलाकर कुत्तेको दिया जानेवाला टुकड़ा ( तुच्छ
भोग ) माँगनेमें लज्जित नहीं होता । जानकीजीवन ( श्रीरामचन्द्र-
जी ) का सेवक होकर भी जो दूसरेसे माँगता है, उसकी जीभ
जल जाय ।

कवितावली १२२
जड पंच मिलै जेहि देह करी, करनी लखु धौं धरनीधरकी ।
जनकी, कहु, क्यों करिहै न सँभार, जो सार करै सचराचरकी ॥
तुलसी ! कहु राम समान को आन है, सेवकि जासु रमा घरकी ।
जगमें गति जाहि जगत्पतिकी, परवाह है ताहि कहा नरकी । २७।
भला, उस धरणीधरकी लीला तो देखो, जिसने पाँच जड
तत्त्वोंको मिलाकर यह देह बनायी है । इस प्रकार जो चराचरकी
सँभाल करता है, कहो भला, अपने भक्तोंकी सँभाल वह क्यों
न करेगा । गोसाईंजी अपनेसे ही कहते हैं—हे तुलसीदास !
बतलाओ तो, रामके समान दूसरा कौन है, जिसके घरकी किंकरी
लक्ष्मी हैं; इस संसारमें जिसे उस जगत्पतिका ही भरोसा है,
वह मनुष्यकी क्या परवा करेगा ?
जग जाचिअ कोउ न, जाचिअ जौं, जियँ जाचिअ जानकीजानहि रे।
जेहि जाचत जाचकता जरि जाइ, जो जारति जोर जहानहि रे ॥
गति देखु विचारि बिभीषनकी, अरु आनु हियँ हनुमानहि रे ।
तुलसी ! भजु दारिद-दोष-दवानल, संकट-कोटि-कृपानहि रे २८
संसारमें किसीसे (कुछ) माँगना नहीं चाहिये । यदि
माँगना ही हो तो जानकीनाथ ( श्रीरामचन्द्रजी) से मनहीमें
माँगो, जिनसे माँगते ही याचकता (दरिद्रता, कामना) जल
जाती है जो बरबस जगत्‌को जला रही है। विभीषणकी दशाका
विचार करके देखो और हनुमान्‌जीका भी स्मरण करो । गोसाईं-
जी कहते हैं कि हे तुलसीदास ! दरिद्रतारूपी दोषको जलानेके
लिये दावानलके समान और करोड़ों संकटोंको काटनेके लिये
कृपाणरूप श्रीरामचन्द्रजीको भजो ।

१२३ उत्तरकाण्ड
उद्बोधन
सुनु कान दिएँ, नित नेमु लिएँ रघुनाथहिके गुनगाथहि रे ।
सुखमंदिर सुंदर रूपु सदा उर आनि धरें धनु-भाथहि रे ॥
रसना निसि-बासर सादर सों तुलसी ! जपु जानकीनाथहि रे ।
करु संग सुसील सुसंतन सों, तजि क्रूर, कुपंथ, कुसाथहि रे ।२९।
हे तुलसीदास ! नित्य नियमपूर्वक कान ( ध्यान ) देकर
श्रीरघुनाथजीकी गुणगाथा श्रवण करो । सुखके स्थान, धनुष और
तरकस धारण किये हुए ( श्रीरामचन्द्रजीके ) सुन्दर स्वरूपका
ही सदा स्मरण करो और जिह्वासे रात-दिन आदरपूर्वक श्रीजानकी-
नाथका ही नाम जपो । सुशील और संत पुरुषोंका सङ्ग करो,
एवं कपटी पुरुष, कुपंथ और कुसङ्गको त्याग दो ।
सुत, दार, अगारु, सखा, परिवारु विलोकु महा कुसमाजहि रे ।
सबकी ममता तजि कै, समता सजि, संतसभाँ न विराजहि रे ॥
नरदेह कहा, करि देखु विचारु, बिगारु गँवार न काजहि रे ।
जनि डोलहि लोलुप कूकुरु ज्यों, तुलसी भजु कोसलराजहि रे ३०
पुत्र, कलत्र, घर, मित्र, परिवार—इन सबको महाकुसमाज
समझो; सबकी ममता त्याग कर, समता धारणकर संतोंकी सभामें
नहीं विराजता ? यह नरदेह क्या है, जरा विचारकर देखो ।
तुलसीदासजी ( अपने ही लिये ) कहते हैं—अरे गँवार ! कामको
न बिगाड़ । लालची कुत्तेकी तरह ( इधर-उधर ) न भटक,
कोसलराज ( श्रीरामचन्द्र ) का भजन कर ।
विषया परनारि निसा-तरुनाई सो पाइ परचो अनुरागहिं रे ।
जमके पहरू दुख, रोग, बियोग बिलोकत हू न बिरागहि रे ॥

कवितावली १२४
ममता बस तैं सब भूलि गयो भयो भोरु, महा भय, भागहि रे ।
जरठाइ-दिसाँ, रविकालु उग्यो, अजहूँ जड़ जीव ! न जागहि रे ३१
तरुणाईरूपी निशा पाकर तू विषयरूपी परस्त्रीकी प्रीतिमें
फँस गया है । यमराजके पहरेदार दुःख, रोग और वियोगको
देखकर भी तुझे वैराग्य नहीं होता । ममतावश तू सब भूल गया ।
अब भोर हो गया है, इस महान् भयसे भाग जा । बुढ़ापारूपी
(पूर्व) दिशामें काल (मृत्यु) रूप सूर्यका उदय हो गया ।
अरे जड़ जीव ! तू अब भी नहीं जागता ।
जनम्यो जेहिं जोनि, अनेक क्रिया सुख लागि करीं, न परैं बरनी ।
जननी-जनकादि हितू भये भूरि, बहोरि भई उरकी जरनी ॥
तुलसी ! अब रामको दासु कहाइ, हिएँ धरु चातककी धरनी ।
करि हंसको बेषु बड़ो सबसों, तजि दे बक-बायसकी करनी । ३२।
तूने जिस योनिमें जन्म लिया, उसीमें सुखके लिये अनेकों
कर्म किये, जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता । माता, पिता
इत्यादि तेरे अनेकों हितैषी हुए और फिर उन्हींसे हृदयमें जलन
होने लगी । गोसाईंजी (अपने लिये) कहते हैं कि अब रामका
दास कहलाकर तो हृदयमें चातककी-सी टेक धारण कर [ अर्थात्
जैसे चातक मेघके सिवा और किसीसे याचना नहीं करता उसी
प्रकार तू भी रामको छोड़कर और किसीके आगे हाथ न पसार ] ।
अब सबसे बड़ा हंसका बेष धारण करके तो बगुला और कौओंकी-
सी करनी छोड़ दे ।
भलि भारतभूमि, भलें कुल जन्मु, समाजु सरीरु भलो लहि कै ।
करषा तजि कै परुषा, बरषा, हिम, मारुत, घाम सदा सहि कै ॥

१२५ उत्तरकाण्ड
जो भजै भगवानु सयान सोई, 'तुलसी' हठ चातकु ज्यों गहि कै।
नतु और सबै बिषबीज बए, हर हाटक कामदुहा नहि कै ॥३३॥
भारतवर्षकी पवित्र भूमि है, उत्तम (आर्य) कुलमें जन्म
हुआ है, समाज और शरीर भी उत्तम मिला है। गोसाईंजी
कहते हैं—ऐसी अवस्थामें जो पुरुष क्रोध और कठोर वचन
त्याग कर वर्षा, जाड़ा, वायु और घामको सहन करते हुए चातक-
के समान हठपूर्वक सर्वदा भगवान्‌को भजता है, वही चतुर है;
अन्यथा और सब तो सुवर्णके हलमें कामधेनुको जोतकर (केवल)
विष-बीज बोते हैं।
सो सुकृती सुचिमंत सुसंत, सुजान सुसीलसिरोमनि स्वै।
सुर-तीरथ तासु मनावत आवत, पावन होत हैं तातनु छ्वै ॥
गुनगेहु सनेहको भाजनु सो, सब ही सों उठाइ कहौं भुज द्वै।
सतिभायँ सदा छल छाडि सबै 'तुलसी' जो रहै रघुबीरको है ॥३४॥
तुलसीदासजी कहते हैं—मैं दोनों भुजाएँ उठाकर सभीसे
कहता हूँ—जो (पुरुष) सब प्रकारके छल छोड़कर सच्चे भावसे
श्रीरघुनाथजीका हो रहता है, वही पुण्यात्मा, पवित्र, साधु,
सुजान और सुशीलशिरोमणि है; देवता और तीर्थ उसके मनाते
ही आ जाते हैं और उसके शरीरका स्पर्श कर स्वयं भी पवित्र हो
जाते हैं तथा वह सभी प्रकारके गुणोंका आकर और सबका
स्नेहभाजन हो जाता है।
विनय
सो जननी, सो पिता, सोइ भाइ, सो भामिनि, सो सुतु, सो हितु मेरो
सोइ सगो, सो सखा, सोइ सेवकु, सो गुरु, सो सुरु, साहेबु, चेरो ॥
सो 'तुलसी' प्रिय प्रानसमान, कहाँ लौं बनाइ कहौं बहुतेरो ।

कवितावली १२६
जो तजि देहको गेहको नेहु, सनेहसों रामको होइ सबेरो ॥३५॥
गोसाईंजी कहते हैं—जो पुरुष शरीर और घरकी ममता-
को त्याग कर जल्दी-से-जल्दी स्नेहपूर्वक भगवान् रामका हो
जाता है, वही मेरी माता है, वही पिता है, वही भाई है, वही स्त्री
है, वही पुत्र है और वही हितैषी है तथा वही मेरा सम्बन्धी,
वही मित्र, वही सेवक, वही गुरु, वही देवता, वही स्वामी और
वही सेवक (अर्थात् वही सब कुछ) है। अधिक कहाँतक
बनाकर कहूँ, वह मुझे प्राणोंके समान प्रिय है।
रामु हैं मातु, पिता, गुरु, बंधु, औ संगी, सखा, सुतु, स्वामि, सनेही
रामकी सौंह, भरोसो है रामको, राम रँग्यो, रुचि राच्यो न केही॥
जीअत रामु, मुएँ पुनि रामु, सदा रघुनाथहि की गति जेही।
सोई जिए जगमें 'तुलसी' नतु डोलत और मुए धरि देही ॥३६॥
श्रीरामचन्द्र ही मेरी माता हैं, वे ही पिता हैं तथा वे ही
गुरु, बन्धु, साथी, सखा, पुत्र, प्रभु और प्रेमी हैं। श्रीरामचन्द्र-
की शपथ है, मुझे तो रामका ही भरोसा है, मैं रामहीके रंगमें
रँगा हुआ हूँ, दूसरेमें रुचिपूर्वक मेरा मन ही नहीं लगता।
गोसाईंजी कहते हैं—जिसे जीते हुए भी रामसे ही स्नेह है
और जो मरनेपर भी रामहीमें मिल जाता है, इस प्रकार सदैव
जिसे रामका ही भरोसा है, वही संसारमें जीता है, नहीं और
सब तो मरे हुए ही देह धारण किये डोलते हैं।
रामप्रेम ही सार है
सियराम-सरूपु अगाध अनूप बिलोचन-मीननको जलु है।
श्रुति रामकथा, मुख रामको नामु, हिएँ पुनि रामहिको थलु है॥

१२७ उत्तरकाण्ड
मति रामहि सों, गति रामहि सों, रति रामसों, रामहि को बलु है।
सबकी न कहै, तुलसीके मतें इतनो जग जीवनको फलु है ॥३७॥
श्रीराम और जानकीजीका अनुपम सौन्दर्य नेत्ररूपी मछलियों-
के लिये अगाध जल है । कानोंमें श्रीरामकी कथा, मुखसे
रामका नाम और हृदयमें रामजीका ही स्थान है । बुद्धि भी
राममें लगी हुई है, रामहीतक गति है, रामहीसे प्रीति है और
रामहीका बल है । और सबकी बात तो नहीं कहता, परन्तु
तुलसीदासके मतमें तो जगत्में जीनेका फल यही है ।
दसरथके दानिसिरोमनि राम ! पुरानप्रसिद्ध सुन्यो जसु मैं ।
नर नाग सुरासुर जाचक जो, तुमसों मनभावत पायो न कैं ॥
तुलसी कर जोरि करै विनती, जो कृपा करि दीनदयाल सुनैं ।
जैहि देह सनेहु न रावरे सों असि देह धराइ कै जायँ जियैं ॥३८॥
हे दशरथजीके पुत्र दानियोंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी ! मैंने आपका
पुराणोंमें प्रसिद्ध यश सुना है । नर, नाग, सुर तथा असुरोंमें जितने
भी आपके याचक बने, उनमेंसे किसने आपसे अपना मनोवाञ्छित
पदार्थ नहीं पाया ? यदि दीनवत्सल प्रभु राम कृपा करके सुनें तो
तुलसीदास हाथ जोड़कर विनय करता है कि जिस देहसे आपके
प्रति स्नेह न हो ऐसा देह धारण कर जीवित रहना व्यर्थ है ।
झूठो है, झूठो है, झूठो सदा जगु, संत कहंत, जे अंतु लहा है ।
ताको सहै सठ ! संकट कोटिक, काढ़त दंत, करंत हहा है ॥
जानपनीको गुमानु बड़ो, तुलसीके बिचार गँवार महा है ।
जानकीजीवनु जान न जान्यो तौ जान कहावत जान्यो कहा है ३९

कवितावली १२८
तुलसीदासजी अपने लिये कहते हैं कि अरे दुष्ट ! जिन
संतोंने इस संसारकी थाह पा ली है, वे कहते हैं कि संसार झूठा है,
झूठा है, झूठा है; परन्तु तू उसीके लिये करोड़ों संकट सहता है
और दाँत निकालकर हाय-हाय करता है । तुझे अपने ज्ञानीपनेका
बड़ा अभिमान है, परन्तु तुलसीके विचारसे तो तू महागँवार है ।
यदि तूने ज्ञानके द्वारा जानकीजीवन ( श्रीरामचन्द्रजी ) को नहीं
जाना तो तूने ज्ञानी कहलाते हुए भी ( वस्तुतः ) क्या जाना ?
[ अर्थात् कुछ भी नहीं जाना । ]
तिन्ह तें खर, सूकर, स्वान भले, जड़ता बस ते न कहैं कछु वै ।
'तुलसी' जेहि रामसों नेहु नहीं, सो सही पसु पूँछ, बिषान न द्वै ॥
जननी कत भार मुई दस मास, भई किन बाँझ, गई किन च्वै ।
जरि जाउ सो जीवनु, जानकीनाथ ! जियै जगमें तुम्हरो बिनु है ॥
गोसाईंजी कहते हैं कि जिन्हें श्रीरामजीसे स्नेह नहीं है, वे
सचमुच पशु ही हैं, उनके केवल एक पूँछ और दो सींगोंकी कसर
है । उनसे तो गधे और सूअर भी अच्छे हैं, क्योंकि वे बेचारे कुछ
जड़ होनेके कारण कहते तो नहीं । उनकी माँ दस महीनेतक
उनके भारसे क्यों मरी ? बाँझ क्यों नहीं हो गयी ? अथवा उसका
गर्भ ही क्यों नहीं गिर गया ? हे जानकीनाथ ! जो पुरुष संसारमें
तुम्हारा हुए बिना जीता है उसका जीवन जल जाय
( जला देनेके योग्य है ) ।
गज-बाजि-घटा, भले भूरि भटा, बनिता, सुत भौंह तकैं सब वै ।
धरनी, धनु, धाम सरीरु भलो, सुरलोकहु चाहिइहै सुखु स्वै ॥
सब फोकट साटक है तुलसी, अपनो न कछू सपनो दिन द्वै ।
जरि जाउ सो जीवनु जानकीनाथ ! जियै जगमें तुम्हरो बिनु है ४१

१२९. उत्तरकाण्ड
हाथी-घोड़ोंके समूह-के-समूह हैं, अनेक अच्छे-अच्छे वीर हैं,
स्त्री-पुरुष सब भौंहें ताकने रहते हैं; पृथ्वी, धन, घर, शरीर—सब
कुछ अच्छे हैं; देवलोकसे भी यह सुख बढ़कर है, किन्तु गोसाईंजी
कहते हैं कि यह सब निरर्थक और निःसार हैं, अपना कुछ नहीं
है। सब दो दिनका स्वप्न है। हे जानकीनाथ ! जो संसारमें
तुम्हारा हुए बिना जीता है, उसका जीवन जल जाय।
सुरराज-सो राज-समाजु, समृद्धि विरंचि, धनाधिप-सो धनु भो।
पवमानु-सो, पावकु-सो, जमु, सोमु-सो, पूषनु-सो, भवभूषनु भो॥
करि जोग, समीरन साधि, समाधि कै धीर बड़ो, बसहू मनु भो।
सब जाय, सुभायँ कहै तुलसी, जो न जानकीजीवनको जनु भो ४२
इन्द्रके समान राजसामग्री हो गयी, ब्रह्माके समान ऐश्वर्य हो
गया और कुबेरके समान धन हो गया तथा वायुके समान
(वेगवान्), अग्निके समान (तेजस्वी), यमराजके समान
दण्डधारी, चन्द्रमाके समान शीतल एवं आह्लादकारी और सूर्यके
समान संसारको प्रकाशित करनेवाला और संसारका भूषण बन गया
हो; वायुको साधकर (प्राणायाम कर) योगाभ्यास करता हुआ
समाधिके द्वारा बड़ा धीर हो गया हो और मन भी वशमें
हो गया हो, तो भी गोसाईंजी सच्चे भावसे कहते हैं—यदि
जानकीनाथका सेवक न हुआ तो सब व्यर्थ है।
कामु-से रूप, प्रताप दिनेसु-से, सोमु-से सील, गनेसु-से मानें।
हरिचंदु-से साँचे, बड़े विधि-से, मघवा-से, महीप विषै-सुख-साने॥
सुक-से मुनि, सारद-से वकता, चिरजीवन लोमस तें अधिकाने।
ऐसे भए तौ कहा 'तुलसी', जो पै राजिवलोचन रामु न जाने।४३।
क० ९-

कवितावली १३०
यदि मनुष्यने कमलनयन भगवान् श्रीरामको नहीं जाना तो
वह रूपमें कामदेव-सा, प्रतापमें सूर्य-सा, शीलमें चन्द्रमाके समान,
मानमें गणेशके सदृश तथा हरिश्चन्द्र-सा सच्चा, ब्रह्मा-जैसा महान्,
विषय-सुखमें आसक्त, इन्द्रके समान राजा, शुकदेव-मुनि-सा महात्मा,
शारदाके सदृश वक्ता और लोमशसे भी अधिक चिरजीवी हो जाय
तो भी ऐसा होनेसे क्या लाभ हुआ ?
झूमत द्वार अनेक मतंग जँजीर-जरे, मद-अंबु चुचाते।
तीखे तुरंग मनोगति-चंचल, पौनके गौनहु तें बढ़ि जाते ॥
भीतर चंद्रमुखी अवलोकति, बाहर भूप खरे न समाते।
ऐसे भए तौ कहा, तुलसी! जो पै जानकीनाथके रंग न राते॥४४॥
द्वारपर जंजीरोंसे जकड़े हुए तथा जिनके गण्डस्थलसे मद चू
रहा है, ऐसे अनेकों हाथी झूमते हों और मनके समान तीव्र
वेगवाले चञ्चल घोड़े हों, जो वायुकी गतिसे भी बढ़ जाते हों,
घरमें चन्द्रमुखी स्त्री देखती हो, बाहर बड़े-बड़े राजा खड़े हों, जो
(बहुत अधिक होनेके कारण) भीतर न समा सकते हों—
गोसाईंजी कहते हैं कि यदि जानकीपति (श्रीरामचन्द्र) के रंगमें
न रँगा तो ऐसा होनेपर भी क्या हुआ ?
राज सुरेस पचासकको बिधिके करको जो पटो लिखि पाए।
पूत सपूत, पुनीत प्रिया, निज सुंदरताँ रतिको मदु नाएँ ॥
संपति-सिद्धि सबै 'तुलसी' मनकी मनसा चितवैं चितु लाएँ।
जानकीजीवनु जाने बिना जग ऐसेउ जीव न जीव कहाए ॥४५॥
पचासों इन्द्रके (राज्यके) समान राज्यका ब्रह्माजीके हाथका
लिखा हुआ पट्टा मिल गया हो, सपूत लड़के हों, पतिव्रता स्त्री
हो, जो अपनी सुन्दरतामें रतिके मदको भी नीचा दिखानेवाली हो,

सब प्रकारकी सम्पत्तियाँ और सिद्धियाँ उसके मनकी रुखको
ध्यानपूर्वक देखती हुई खड़ी हों; किन्तु गोसाईंजी कहते हैं कि यदि
जानकीनाथ (श्रीरामचन्द्र) को न जाना तो ऐसे जीव भी वास्तवमें
जीव कहलानेके योग्य नहीं हैं।

कुसगात ललात जो रोटिनको, घरवात घरैं खुरपा-खरिया ।
तिन्ह सोनेके मेरुसे ढेर लहे, मनु तौ न भरो, घरु पै भरिया ॥
'तुलसी' दुखु दूनो दसा दुहुँ देखि, कियो मुखु दारिदको करिया ।
तजि आस भो दासु रघुप्पतिको, दसरत्थको दानि दया-दरिया४६

जिनका शरीर अत्यन्त दुबला है, जो रोटीके लिये बिल-
बिलाते फिरते हैं और जिनके घरमें एक खुरपा और घास बाँधनेकी
जाली ही सारी पूँजी है, उन्हें यदि सुमेरु पर्वतके बराबर सोनेके
ढेर भी मिल गये, तो इससे उनका घर तो भर गया, परन्तु मन
नहीं भरा। गोसाईंजी कहते हैं कि मैंने दोनों अवस्थाओंमें दूना
दुःख देखकर दरिद्रताका मुख काला कर दिया और सब आशा
त्यागकर दशरथसुवन श्रीरामचन्द्रका दास हो गया, जो दयाके
मानो दरिया हैं।

को भरिहै हरिकैं रितएँ, रितवै पुनि को, हरि जौ भरिहै ।
उथपै तेहि को, जेहि रामु थपै, थपिहै तेहि को, हरि जौ टरिहै ॥
तुलसी यहु जानि हिएँ अपनें सपनें नहि कालहु तें डरिहै ।
कुमयाँ कछु हानि न औरन कीं, जो पै जानकीनाथु मया करिहै ४७

जिसको भगवान्‌ने खाली कर दिया उसे कौन भर सकता
है और जिसको भगवान् भर देंगे उसे कौन खाली कर सकता
है। जिसे श्रीरामचन्द्रजी स्थापित कर देते हैं उसे कौन उखाड़

कवितावली १३२
सकता है और जिसे वे उखाड़ेंगे उसे कौन स्थापित कर सकता है।
तुलसीदास अपने हृदयमें यह जानकर स्वप्नमें भी कालसे भी नहीं
डरेगा। क्योंकि यदि जानकीनाथ श्रीरामचन्द्र कृपा करेंगे तो औरोंकी
अकृपासे कुछ भी हानि नहीं होगी !
ब्याल कराल, महाविष, पावक, मत्तगयंदहु के रद तोरे।
साँसति संकि चली, डरपे हुते किंकर, ते करनी मुख मोरे ॥
नेकु बिषादु नहीं प्रहलादहि कारन केहरिके बल हो रे।
कौनकी त्रास करै तुलसी जोपै राखिहै रामु, तौ मारिहै को रे ४८
विकराल सर्प, भयंकर विष, अग्नि और मतवाले हाथियोंके
दाँतोंको भी तोड़ डाला। कष्ट भी सशङ्कित होकर भाग गया, जो
सेवक (राजासे) डरते थे; उन्होंने भी (आज्ञापालनस्वरूप) कर्तव्यसे
मुँह मोड़ लिया। तो भी प्रह्लादको कुछ भी विषाद नहीं हुआ;
क्योंकि वह नृसिंह भगवान्‌के बलके आश्रित था। अतः अब
तुलसीदास ही किसका भय करे। यदि रामजी रक्षा करेंगे तो उसे
कौन मार सकता है।
कृपाँ जिनकीं कछु काजु नहीं, न अकाजु कछू जिनके मुख मोरें।
करैं तिनकी परवाहि ते, जो बिनु पूँछ-विषान फिरैं दिन दौरैं ॥
तुलसी जेहिके रघुनाथु से नाथु, समर्थ सुसेवत रीझत थोरें।
कहा भवभीर परी तेहि धौं, बिचरै धरनीं तिनसों तिनु तोरें॥४९॥
जिनकी कृपासे कुछ काम नहीं बनता और न जिनके मुख
मोड़नेसे कुछ हानि ही होती है, उनकी परवा वही लोग करेंगे जो
बिना सींग-पूँछके होकर भी सर्वदा दौड़े फिरते हैं [अर्थात् पशु
न होनेपर भी अपने वास्तविक लक्ष्यको छोड़कर रात-दिन

१३३ उत्तरकाण्ड
पेटकी ही चिन्तामें लगे रहते हैं ] । गोसाईंजी कहते हैं कि जिसके
श्रीरामचन्द्रके समान समर्थ स्वामी हैं, जो थोड़ी-सी सेवा करनेपर ही
रीझ जाते हैं, उसे संसारकी क्या चिन्ता पड़ी है, वह तो ऐसे
लोगोंसे सम्बन्ध तोड़कर पृथ्वीपर विचरता है ।
कानन, भूधर, वारि, बयारि, महाविषु, ब्याधि, दवा-अरि घेरें ।
संकट कोटि जहाँ 'तुलसी', सुत, मातु, पिता, हित, बंधु न नेरे ॥
राखिहैं रामु कृपालु तहाँ, हनुमानु से सेवकु हैं जेहि केरे ।
नाक, रसातल, भूतलमें रघुनायकु एकु सहायकु मेरे ॥५०॥
वनमें, पर्वतपर, जलमें, आँधीमें, महाविष खा लेनेपर, रोगमें,
अग्नि और शत्रुसे घिर जानेपर तथा गोसाईंजी कहते हैं, जहाँ
करोड़ों संकट हों और माता-पिता, पुत्र, मित्र और भाई-बन्धु कोई
समीप न हों, वहाँ भी दयालु भगवान् राम, जिनके हनुमान्-सा-जैसे
सेवक हैं, रक्षा करेंगे । आकाश, पाताल और पृथ्वीमें एक
श्रीरघुनाथजी ही मेरे सहायक हैं ।
जबै जमराज-रजायततें मोहि लै चलिहैं भट बाँधि नटैया ।
तातु न मातु, न स्वामि-सखा, सुत-बंधु बिसाल बिपत्ति-बँटैया ॥
साँसति घोर, पुकारत आरत कौन सुनै, चहुँ ओर डटैया ।
एकु कृपाल तहाँ 'तुलसी' दसरत्थको नंदनु बंदि-कटैया ॥५१॥
जब यमराजकी आज्ञासे मेरे गलेको बाँधकर यमदूत मुझे ले
चलेंगे उस समय वहाँ न बाप, न माँ, न स्वामी, न मित्र, न पुत्र
और न भाई ही उस भारी विपत्तिको बाँटनेवाले होंगे । वहाँ घोर
कष्ट सहना होगा । उस आर्त्त पुकारको सुनेगा भी कौन ? चारों
ओर डाँटनेवाले [ यमदूत ] ही होंगे । गोस्वामीजी कहते हैं कि

कवितावली १३४
वहाँ केवल एक दयानिधान दशरथ-कुमार ही बन्धन काटनेवाले होंगे।
जहाँ जमजातना, घोर नदी, भट कोटि जलचर दंत-टेवैंया।
जहँ धार भयंकर, वार न पार, न बोहितु नाव, न नीक खेवैंया॥
'तुलसी' जहँ मातु-पिता न सखा, नहि कोउ कहूँ अवलंब-देवैया।
तहाँ बिनु कारन रामु कृपाल विसाल भुजा गहि काढ़ि लेवैंया ५२
जहाँ यमयातना देनेवाले करोड़ों यमदूत हैं, घोर वैतरणी नदी
है, जिसमें दाँतोंकी धार तेज करनेवाले (काटनेवाले) जलजन्तु हैं,
जिसकी भयङ्कर धारा है, और जिसका कोई वार-पार नहीं है, जिसमें
न जहाज है, न नाव और न सुचतुर नाविक ही है; इसके सिवा
जहाँ माता, पिता, सखा अथवा कोई अवलम्बन देनेवाला भी नहीं
है, वहाँ श्रीगोसाईंजी कहते हैं, बिना ही कारण कृपा करनेवाले
श्रीरामचन्द्रजी ही अपनी विशाल भुजासे पकड़कर निकाल
लेनेवाले हैं।
जहाँ हित स्वामि, न संग सखा, वनिता, सुत, बंधु, न बापु, न मैया।
काय-गिरा-मनके जनके अपराध सबै छल छाड़ि छमैया॥
तुलसी! तेहि काल कृपाल बिना दूजो कौन है दारुन दुःख दमैया।
जहाँ सब संकट, दुर्घट सोचु, तहाँ मेरो साहेबु राखै रखैया ॥५३॥
श्रीगोसाईंजी कहते हैं कि जहाँ कोई हितैषी स्वामी नहीं
है और न साथमें मित्र, स्त्री, पुत्र, भाई, बाप या माँ ही है वहाँ
कृपालु श्रीरामचन्द्रके बिना अपने जनके शरीर, मन और वचनद्वारा
किये हुए समस्त अपराधोंको छल छोड़कर क्षमा करनेवाला तथा
उस दारुण दुःखका नाश करनेवाला दूसरा कौन हो सकता है ?
जहाँ ऐसे-ऐसे सब प्रकारके संकट और दुर्घट सोच हैं वहाँ मेरे

१३५ उत्तरकाण्ड
स्वामी जगत्में रमण करनेवाले श्रीरामचन्द्र ही मेरी रक्षा करते हैं।
तापसको बरदायक देव, सबै पुनि बैरु बढ़ावत बाढ़ैं ।
थोरेंहि कोपु, कृपा पुनि थोरेंहि, बैठि कै जोरत, तोरत ठाढ़ें ॥
ठोंकि-बजाइ लखे गजराज, कहाँ लौं कहौं केहि सों रद काढें ।
आरतके हित,नाथु अनाथके रामु सहाय सही दिन गाढ़ें ॥५४॥
देवतालोग तपस्वियोंको वर देनेवाले हैं, किन्तु बढ़नेपर वे सब
वैर बढ़ाते हैं । थोड़ेहीमें कोप और थोड़ेहीमें कृपा करते हैं । वे
बैठकर प्रीति जोड़ते और खड़े होते ही उसे तोड़ देते हैं ( अर्थात्
उनकी प्रीति बहुत थोड़ी देर टिकनेवाली होती है ) । हम किस-
किससे और कहाँतक दाँत निकालकर कहें ? गजराजने सबको
ठोंक-बजाकर देख लिया, दुखियोंके मित्र, अनाथोंके नाथ तथा
विपत्तिके दिनोंमें सच्चे सहायक श्रीरामचन्द्र ही हैं ।
जप, जोग, बिराग, महामख-साधन, दान, दया, दम कोटि करै ।
मुनि-सिद्ध, सुरेसु, गनेसु, महेसु-से सेवत जन्म अनेक मरै ॥
निगमागम-ग्यान, पुरान पढ़े, तपसानलमें जुगपुंज जरै ।
मनसों पनु रोपि कहै तुलसी, रघुनाथ विना दुख कौन हरै ॥
चाहे कोई जप, योग, वैराग्य बड़े-बड़े यज्ञानुष्ठान, दान, दया,
इन्द्रिय-निग्रह आदि करोड़ों उपाय करे; मुनि, सिद्ध, सुरेश (इन्द्र),
गणेश और महेश-जैसे देवताओंका अनेकों जन्मतक सेवन करते-
करते मर जाय, वेद-शास्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करे और पुराणोंका
अध्ययन करे, अनेकों युगोंतक तपस्याकी अग्निमें जलता रहे; परन्तु
तुलसी मनसे प्रण रोपकर कहता है कि श्रीरामचन्द्रके बिना कौन
दुःख दूर कर सकता है ?