कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली १२४
ममता बस तैं सब भूलि गयो भयो भोरु, महा भय, भागहि रे ।
जरठाइ-दिसाँ, रविकालु उग्यो, अजहूँ जड़ जीव ! न जागहि रे ३१
तरुणाईरूपी निशा पाकर तू विषयरूपी परस्त्रीकी प्रीतिमें
फँस गया है । यमराजके पहरेदार दुःख, रोग और वियोगको
देखकर भी तुझे वैराग्य नहीं होता । ममतावश तू सब भूल गया ।
अब भोर हो गया है, इस महान् भयसे भाग जा । बुढ़ापारूपी
(पूर्व) दिशामें काल (मृत्यु) रूप सूर्यका उदय हो गया ।
अरे जड़ जीव ! तू अब भी नहीं जागता ।
जनम्यो जेहिं जोनि, अनेक क्रिया सुख लागि करीं, न परैं बरनी ।
जननी-जनकादि हितू भये भूरि, बहोरि भई उरकी जरनी ॥
तुलसी ! अब रामको दासु कहाइ, हिएँ धरु चातककी धरनी ।
करि हंसको बेषु बड़ो सबसों, तजि दे बक-बायसकी करनी । ३२।
तूने जिस योनिमें जन्म लिया, उसीमें सुखके लिये अनेकों
कर्म किये, जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता । माता, पिता
इत्यादि तेरे अनेकों हितैषी हुए और फिर उन्हींसे हृदयमें जलन
होने लगी । गोसाईंजी (अपने लिये) कहते हैं कि अब रामका
दास कहलाकर तो हृदयमें चातककी-सी टेक धारण कर [ अर्थात्
जैसे चातक मेघके सिवा और किसीसे याचना नहीं करता उसी
प्रकार तू भी रामको छोड़कर और किसीके आगे हाथ न पसार ] ।
अब सबसे बड़ा हंसका बेष धारण करके तो बगुला और कौओंकी-
सी करनी छोड़ दे ।
भलि भारतभूमि, भलें कुल जन्मु, समाजु सरीरु भलो लहि कै ।
करषा तजि कै परुषा, बरषा, हिम, मारुत, घाम सदा सहि कै ॥