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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 126

१२३ उत्तरकाण्ड
उद्बोधन
सुनु कान दिएँ, नित नेमु लिएँ रघुनाथहिके गुनगाथहि रे ।
सुखमंदिर सुंदर रूपु सदा उर आनि धरें धनु-भाथहि रे ॥
रसना निसि-बासर सादर सों तुलसी ! जपु जानकीनाथहि रे ।
करु संग सुसील सुसंतन सों, तजि क्रूर, कुपंथ, कुसाथहि रे ।२९।
हे तुलसीदास ! नित्य नियमपूर्वक कान ( ध्यान ) देकर
श्रीरघुनाथजीकी गुणगाथा श्रवण करो । सुखके स्थान, धनुष और
तरकस धारण किये हुए ( श्रीरामचन्द्रजीके ) सुन्दर स्वरूपका
ही सदा स्मरण करो और जिह्वासे रात-दिन आदरपूर्वक श्रीजानकी-
नाथका ही नाम जपो । सुशील और संत पुरुषोंका सङ्ग करो,
एवं कपटी पुरुष, कुपंथ और कुसङ्गको त्याग दो ।
सुत, दार, अगारु, सखा, परिवारु विलोकु महा कुसमाजहि रे ।
सबकी ममता तजि कै, समता सजि, संतसभाँ न विराजहि रे ॥
नरदेह कहा, करि देखु विचारु, बिगारु गँवार न काजहि रे ।
जनि डोलहि लोलुप कूकुरु ज्यों, तुलसी भजु कोसलराजहि रे ३०
पुत्र, कलत्र, घर, मित्र, परिवार—इन सबको महाकुसमाज
समझो; सबकी ममता त्याग कर, समता धारणकर संतोंकी सभामें
नहीं विराजता ? यह नरदेह क्या है, जरा विचारकर देखो ।
तुलसीदासजी ( अपने ही लिये ) कहते हैं—अरे गँवार ! कामको
न बिगाड़ । लालची कुत्तेकी तरह ( इधर-उधर ) न भटक,
कोसलराज ( श्रीरामचन्द्र ) का भजन कर ।
विषया परनारि निसा-तरुनाई सो पाइ परचो अनुरागहिं रे ।
जमके पहरू दुख, रोग, बियोग बिलोकत हू न बिरागहि रे ॥